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Wednesday, February 5, 2020

नवगीत: ●नापो प्रिये ! गगन की सीमा●◆संजय कौशिक 'विज्ञात' ◆



नवगीत: ●नापो प्रिये ! गगन की सीमा●
संजय कौशिक 'विज्ञात' ◆

मुखड़ा/पूरक पंक्ति~16/14
अंतरा~16/16

नापो प्रिये ! गगन की सीमा,
मैं आकाश सम्हालूँगा।

1
संबल बनकर साथ चलो तुम,
बाकी काम हमारा है।
बनकर रहो हृदय में धड़कन,
जैसी हमें गवारा है।

खोलो प्रिये ! पटल तारों का,
मैं वो चाँद उठा लूँगा।
नापो प्रिये ! गगन की सीमा,
मैं आकाश सम्हालूँगा।

2
होगा मार्ग प्रशस्त भरोसा,
मन में सुदृढ़ बनाना है।
मंजिल तुम बनकर रहना बस,
रिश्ता हमें निभाना है।

बोलो प्रिये ! हृदय की बातें,
मैं अहसास चुरा लूँगा।
नापो प्रिये ! गगन की सीमा,
मैं आकाश सम्हालूँगा।

3
चिंतित सी मुद्रा को त्यागो,
आगे बढ़ते जाना है।
नेक विचार नियति हो निश्छल,
हिम्मत करके आना है।

जागो प्रिये ! हवा को रोको,
मैं तूफान उड़ा लूँगा।
नापो प्रिये ! गगन की सीमा,
मैं आकाश सम्हालूँगा।

प्रीत पर्व का साक्षी बनकर,
हर्षोल्लास मनाना है।
संस्कार तथा उत्तम संस्कृति,
नैतिक मूल्य बचाना है।

बनकर प्रिये ! रहो गलमाला,
मैं संसार बसा लूँगा। 
नापो प्रिये ! गगन की सीमा,
मैं आकाश सम्हालूँगा।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

@vigyatkikalam

5 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर । क्या अभिव्यक्ति है । नमन आपको ।

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  2. वाह वाह बहुत सुंदर मैं अहसास चुरा लुंगा
    क्या कहने

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  3. आपकी लेखनी कमाल कर रही है।
    हार्दिक शुभ कामनाएं

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  4. बहुत ही भावपूर्ण रचना ...प्रेम,विश्वास और समर्पण सब कुछ है...अप्रतिम भाव और सटीक शब्द चयन ....बहुत सारी शुभकामनाएं 💐💐💐💐

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  5. वाह बहुत खूब 👏👏👏👏👍👍👍👍

    अल्फजौ मेंं भाव भरा हैं
    सुन्दर शब्दो का गुन्थन
    प्रीत पर्व का साक्षी बन कर
    अजर अमर सा हों लेखन ॥
    डॉ़ इन्दिरा गुप्ता यथार्थ

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