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Wednesday, February 5, 2020

नवगीत: प्रीत अवगुंठन हटाकर● संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत: प्रीत अवगुंठन हटाकर 
◆ संजय कौशिक 'विज्ञात' ◆

मुखड़ा/पूरक पंक्ति~16/16
अंतरा~16/14

दिव्य ज्योति प्रभा परी सी,
जगमगाई रात भर।
प्रीत अवगुंठन हटा कर,
खिलखिलाई रात भर।

बैठ तरुवर ज्यों चकोरी,
चाँदनी बिखरी छटा में।
शाख-पल्लव-ओट में थी,
उमड़ती काली घटा में।
एकटक नैना निहारें,
रश्मियों की घन लटा में।

चाँदनी छनकर द्रुमों से,
झिलमिलाई रात भर।
प्रीत अवगुंठन हटा कर,
खिलखिलाई रात भर।

भाव की ठंडी बयारें,
कुछ तरंगें छोड़ती-सी।
ओढ़नी को ओढ़ कर वो,
यूँ झरोखे मोड़ती-सी।
आह निकली एक मुख से,
और साँसें तोड़ती-सी।

कोकिला अवरुद्ध स्वर से,
तिलमिलाई रात भर।
प्रीत अवगुंठन हटा कर,
खिलखिलाई रात भर।

झींगुरों की घंटियों से,
तेज धड़कन हो रही कुछ।
सनसनाहट मौन पसरा,
प्रीत की धारा बही कुछ।
दीप की वो गुनगुनाहट,
सुन सही बाती रही कुछ।

ले पतंगा लौ जली फिर,
कसमसाई रात भर।
प्रीत अवगुंठन हटा कर,
खिलखिलाई रात भर।

मोहिनी नाजुक अदाएँ,
देखता सब वक्त छुपके।
प्रीति की मधु रागिनी को,
सुन रहे दिग्पाल चुपके।
हर भ्रमर कहता कली से,
प्रीत मधुरस खूब टपके।

उर्मि,सागर-सीप क्रीड़ा,
लहलहाई रात भर।
प्रीत अवगुंठन हटा कर,
खिलखिलाई रात भर।

संजय कौशिक 'विज्ञात'  

@vigyatkikalam

35 comments:

  1. अतिसुंदर वर्णन, बाकी मैं बहुत अदना हूं इस रचना की तारीफ़ करने के लिए, आप तो बहुत ज्ञानी हैं, ,मैं तो अज्ञानी हूं, काश मुझको भी छंद, वर्ण और भाषा का इतना ज्ञान होता

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    1. आपका आभार जो इतनी सुंदर रचना हमें पढ़ने को मिली

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  2. भावों की तूलिका चली
    सुंदर शब्दों का आधार
    कोई तारा पथ छोड़ आया
    करने कविता का श्रृंगार ।

    विलक्षण "वियोग शृंगार" का सरस सृजन, अनुपम शब्द संयोजन ,
    भाव गहराई तक उतरते
    अलंकारों का यथोचित गतिमय प्रवाह
    अभिनव गीत प्रस्तुति,छाया वाद का सुंदर छंद सृजन।
    कुसुम कोठारी।

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    1. आत्मीय आभार कुसुम जी
      इतने सुंदर सुंदर शब्दों से प्रोत्साहना के लिए पुनः आभार

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  3. अद्वितीय नवगीत आ.सर जी🙏🏻

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  4. बहुत सुन्दर सर जी बधाई हो

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  5. बहुत सुंदर नवगीत आपकी रचना आदरणीय बहुत प्यारी

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ....... ,.8 जनवरी 2020 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद

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  7. बहुत ही सुंदर रचना 👌👌👌 इस रचना में प्रेम की अभिव्यक्ति के साथ विरह की वेदना भी है ....प्रीत का मानवीकरण बहुत सुंदर लगा 👏👏👏 शब्द चयन इतना लाजवाब है कि हर दृश्य स्पष्ट उभर रहा है ...आप के शानदार नवगीतों की माला में एक अनमोल मोती और जुड़ा ...बहुत बहुत बधाई 💐💐💐💐

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    1. आत्मीय आभार नीतू जी
      खुले शब्दों में प्रेरित करती टिप्पणी के लिए पुनः आभार

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  8. बहुत सुन्दर नवगीत आदरणीय

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  9. विज्ञात जी प्रणाम, आपके ब्लॉग पर प्रथम बार मेरा आगमन है परन्तु प्रथम दृष्टया ही आपके ब्लॉग के सबसे ऊपर लिखे शब्द छंदबद्ध कविता  जो कि आज के परिदृश्य से सार्थक सन्देश दे रहा है। सत्य कहूँ तो यही चमत्कार एक कवि को आमजन से पृथक करता है और शेष आपकी रचना से स्वतः ही ज्ञात हो रहा है ! आपकी रचना काव्य के प्रत्येक आयाम को स्पर्श करती है।  और क्या कहूँ, मेरे शब्दकोष में शब्द ही शेष नहीं रहे इस रचना की सराहना हेतु ! सादर 'एकलव्य'   

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    1. आपने तो गागर में सागर भर दिया। पूरे ब्लॉग की इतनी सुंदर और सटीक समीक्षा दी है। आपके ये सुंदर शब्द सदैव मेरा पथ प्रदर्शक बन प्रेरित करते रहेंगे।आपका आत्मीय आभार।

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  10. अनिता सैनी जी आपके सहयोग भाव और रचना को असंख्य पाठकों तक पहुंचाने के इस प्रशंसनीय कार्य को नमन करते हुए बधाई सहित शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ आप इस कार्य में अवश्य सफल सिद्ध हों
    आपके प्रयास से हमारे ब्लाग पर भी पाठकों की संख्या दिन प्रतिदि बढ़ रही है। आपका आत्मीय आभार
    बहुत अच्छे अच्छे पाठकों का परिवार बन रहा है। पुनः आत्मीय आभार

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  11. निशब्द,भावों.की गहराई असीम है।पाखी

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  12. निशब्द,भावों.की गहराई असीम है।पाखी

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