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Tuesday, March 30, 2021

गीत : मैं साधारण शान्त प्रिये : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
मैं साधारण शान्त प्रिये
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी~16/14

क्लिष्ट छंद से भाव तुम्हारे
मैं कविता अतुकान्त प्रिये
अलंकार सी चमक तुम्हारी
मैं साधारण शान्त प्रिये।।


हिरण वनों की स्वर्णिम आभा
सृष्टि रचेता भ्रमित करे
दस-दस सिर भी मुग्ध हुए से
ठोस हुए को द्रवित करे
आकर्षण का केंद्र कहीं पर
कहीं चंद्र को बहकाया
शिक्षा के इस तेज पुंज से 
काली को भी चमकाया
विस्तृत क्षेत्र सौरमण्डल तुम
मैं पिछड़ा सा प्रान्त प्रिये।।

और अप्सरा भरती पानी
रूप अनूप रहे अनुपम 
स्वर्गलोक से झांक झरोखे
देव यथेष्ट कहे अनुपम
भ्रांति भ्रांति सौंदर्य निखरते
नखरों के छाए बादल
महक सदा ही लज्जित होती
विस्मित चकित कमल के दल
अन्य असीमित द्रव्य सँजोती
मैं मापक दृष्टांत प्रिये।।

नेत्र कटारी कोमल हिय के
बिम्ब चमकते मुख मण्डल
मोहन पाश निशाने साधे
जिनके भरे पड़े बण्डल
अधरों पर कुछ वाद्य यंत्र सुर
सम्मोहन के काज करें
कोयल मोर पपीहे लज्जित
टेर भरी आवाज करें 
श्रेष्ठ निरक्षक तुम्हीं बनो अब
मैं बालक हूँ भ्रांत प्रिये।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : स्वप्न नाव झोले खाए : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
स्वप्न नाव झोले खाए 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~16/14 

मात्र यथेष्ट नहीं ये आँसू
एक बाढ़ सी ले आए
नेत्र नदी के शुष्क कोर तट
स्वप्न नाव झोले खाए।।

एक विरह बन दहकी ज्वाला
तन-मन फूँके राख करे
और प्रयत्न करे नित सम्बल
गिनो भले ही लाख करे
अग्नि अदृश्य अलौकिक रहती
भाव मर्म के पिघलाए।।

शून्य बनी आभास समाहित 
हृदय नगर की सम धड़कन 
पतझड़ की बगिया में चुभती
शुष्क फूल की इक रड़कन
फड़कन बामे अंग व्यथामय
त्रस्त अशुभ से गुण गाए।।

धैर्यमयी धरणी सी विचलित
आज तपस्या टूट रही
व्याधि समस्या और आपदा
हर्ष विषय को लूट रही
कम्पित देह समझ पर पानी
चिंता बनकर ढुलकाए।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, March 29, 2021

भजन : साँवरे की चिट्ठियों में : संजय कौशिक 'विज्ञात'


भजन 
साँवरे की चिट्ठियों में
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

साँवरे की चिट्ठियों में 
इक पता मेरा लिखादे 
आज लीले बात सुनले 
शाम से मुझको मिला दे।।

बोलना सेवक प्रतीक्षित
भावना के ज्वार उठते
सागरों की ये लहर से
देख सौ सौ बार उठते
आज पतझड़ एक जीवन
इक कमल इसमें खिला दे।।

अब विकट छाई समस्या 
खोजना क्या हल यहाँ पर 
भक्त है बेहाल व्याकुल
पूछता वे है कहाँ पर
लग नहीं पाता कहीं मन 
ये पिपासा तू मिटा दे।।

वेदना की शूल से यूँ 
छुट चलें कब प्राण जानें
चोट कितनी सह चुका है
मूर्ति का पाषाण जानें
शक्ति स्वाहा आत्म बल की
अब मिटा या तू बढ़ा दे।।

आज संजय है भँवर में
कष्ट का भूचाल आया
बंध तन के काटने हैं 
काल का सिर देख साया
चार कांधों से गिराकर 
मोक्ष की पदवी चढ़ा दे।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : महुआ तड़पता : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
महुआ तड़पता
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/12

अधखिली कलियाँ बिलखती 
छोड़ उपवन बाग को।
देख कर महुआ तड़पता
मूक गुंजित राग को।।

वो कली ये सोचती है
जो भ्रमर आया यहाँ
देख अनुपस्थित मुझे फिर
दौड़ जाएगा कहाँ
ये व्यथा हिय को रुलाती
पोंछती मुख झाग को।।

तोड़ बंधन प्रीत पागल
यूँ मचलती रात दिन
फिर मिलन की आस झूठी
नित्य मरती बात बिन 
भस्म करने देह अपनी
ढूँढती जो आग को।।

हिय पलायन मानता कब
पीर कलियों को अधिक
सब विफल क्षमता जली सी
श्वास पर अटकी तनिक
भूल डाली रीत जाने
बोलती उस काग को।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, March 25, 2021

नवगीत : नूण रोटी का दुख : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
नूण रोटी का दुख 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~14/12 

रोटियों की सिसकियों का
आह क्रंदन देश में
अग्नि चूल्हे की तड़पती
भूख के परिवेश में।।

इस उदर की पीर फफके
शूल पीड़ित वेग से
आँत चीखे शुष्क पिसती 
जो निभाती नेग से
आह भरती कट रही हैं 
नग्न सी इक तेग से
गूँजते स्वर फूटते है 
रिक्त जो उस देग से 
ये प्रताड़ित भूख शोषित 
नत पड़ी परमेश में।।

रेत से अन्तस् दहकते
पूछ किसको चाव है
और भूभल से जले अब
टीकड़ों पर घाव है
गाँजती खिचड़ी यहाँ पर 
दिख रहा कुछ ताव है 
रिक्त जल घट भी पिपासित
देखता जब नाव है 
पेट पूरा पर अधूरा
व्यंजना तोयेश में।।

प्याज चटनी दूर से ही 
बस्तियों को ताकती
मिर्च तीखापन भुलाकर
आँसुओं को माँजती
नूण रोटी से कहे दुख
क्यों नहीं घर झाँकती 
लूट कर खुशियाँ घरों की
रोटियाँ अब भागती
दास्यता की बाँध बेड़ी
झोंकती है क्लेश में।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

उल्लाला छंद / चंद्रमणि छंद शिल्प विधान : संजय कौशिक


उल्लाला छंद / चंद्रमणि छंद - उल्लाला छंद के प्रायः दो भेद होते हैं 2 पंक्ति 4 चरणों में दोहे की तरह दूह कर लिखा जाने वाला यह छंद अपने आकर्षण के चलते सर्वत्र विख्यात है इस छंद का प्रथम भेद 
दोहे के विषम चरण की 13 मात्राओं के मात्रा भार और शिल्प का अनुकरण करते हुए इसी एक चरण के शिल्प को लगातार 4 चरणों में लिखने से उल्लाला छंद का प्रथम भेद निर्मित होता है जो कवियों द्वारा लेखन में अत्याधिक प्रचलित रहा है।

इसी प्रकार इसका द्वितीय भेद प्रचलन में कम रहा है तदापि इसकी उत्तम लय आकर्षण का केंद्र रही है इसका शिल्प भी दोहे के विषम चरण की 13 मात्राओं के शिल्प में 2 मात्राएं और जोड़ देने के पश्चात विषम चरण 15 मात्राओं का तथा सम चरण दोहे के विषम चरण 13 मात्राओं में दोहे के विषम चरण के शिल्प का अनुकरण करना होता है। इस प्रकार से उल्लाला के द्वितीय भेद के शिल्प में  4 चरणों का मात्रा भार  15-13 और 15-13 रहता है।

उल्लाला छंद का द्वितीय भेद जिसका मात्रा भार 15,13 और 15,13 रहता इस छंद के शिल्प में विशेष ध्यान में रखने वाली बात ये है कि इसके प्रारम्भ में चौकल अनिवार्य है परन्तु जगण वर्जित है। इस छंद की लय गाल-लगा के प्रयोग सी गुथी हुई होती है। अपनी उत्तम लय के कारण इसकी गेयता का आनंद चरम पर होता है। श्रोता भी इसकी उत्तम लय के विशेष आकर्षण के चलते आनंद प्राप्त कर झूम उठते हैं। तुकबंदी सम चरण द्वितीय और चतुर्थ चरण की मिलाई जाती है। आइये उदाहरण के माध्यम से समझते हैं । 


कलन के माध्यम से समझते है  विशेष सुधार शतकवीर कार्यक्रम में 4 अप्रैल को ..... 

चौकल से प्रारम्भ 
जैसे आपने अंतिम रचना 
उड़ना (4 मात्रा के शब्द समूह का चयन किया है) 
इसी चरण की अंतिम 5 मात्रा 212 👈 ऐसे लिखनी हैं
15 मात्रा में से 4  और अंत की 5 मात्रा निर्धारित है कुल मात्रा 9 हो गई 
अब इन 9 मात्रा के मध्य बची 6 मात्रा इनमें यदि 3+3 के जोड़े गाल+लगा अर्थात 21+12 अर्थात गुरुलघु और गुरु लघु लिखेंगे तो भाव अवश्य बिखर जाएंगे । कई बार शिल्प में वो सब कथन छूट जाता जो हम अतुकांत में कह देते हैं 
ऐसे में बची हुई इन मात्राओं को भी चौकल और द्विकल के अर्थात 4+2 या 2+4 के माध्यम से सरलता से कह सकते हैं। 

ये एक चरण हुआ। 
सभी चरणों की अंत की 5 मात्रा पहले ही निर्धारित है 212 अर्थात गुरु लघु गुरु ( इसमें गुरु को 2 लघु के माध्यम से लिख सकते हैं जबकि लघु को लघु लिखना अनिवार्य है।

उल्लाला छन्द का एक और नाम 'चंद्रमणि' भी कहा जाता है। प्रस्तुत पदों को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि प्रत्येक विषम चरण के प्रारम्भ में एक 'गुरु' या दो 'लघु' को ध्यान से उच्चारण करेंगे तो, इसके बाद का शाब्दिक विन्यास दोहे की तेरह मात्राओं की तरह ही रहता है। उसी अनुरूप पाठ का प्रवाह भी रहता है। इस कारण विषम चरण में पहले दो मात्राओं के बाद स्वयं एक यति सी बन जाती है जिसके बाद आगे का चरण दोहा के विषम चरण की तरह ही लय में बंधता चला जाता है।
संजय कौशिक 'विज्ञात'

उदाहरण: 

1
गणपति गिरजा के नंद पर, मोहित सारी रिद्धियाँ।
शंकर के आशीर्वाद से, नत रहती नित सिद्धियां।।
2
वंदन माँ वीणापाणि का, जिन कंठो से गान हो।
विद्या के भण्डारे भरे, उत्तम सी पहचान हो।।
3
उपवन की है उत्तम महक, अब उत्तम खुशबू सुनो। 
ये खुशबू दे साहित्य नित, सब इसके गुण को गुनो।।
4
पहली गुरुवर की वंदना, दूजी गणपति ईश की।
पांचों की सब पूजा करें, ब्रह्मा हरि जगदीश की।।
5
परिचय की जब चर्चा उठे, क्या बोले विज्ञात कुछ।
खालीपन के इस शून्य की, कौन सुनेगा बात कुछ।।
6
मानव जितना इतिहास है, उतना ही विज्ञान है।
कष्टों की है अपनी परख, देती वह पहचान है।।
7
बंधन हिय के जो मानते, वे मानव सबके बने।
सुख-दुख में मिलते हैं सदा, हर्षित रहते सब जने।।
8
होली पर जलती होलिका, फूँके सारा देश ये।
अपनेपन के षड्यंत्र से, दम्भित थे परिवेश ये।।
9
पावन निर्मल गङ्गा बहे, ब्रह्मा का अभिशाप ले।
व्याकुल अन्तस् की वेदना, पूर्ण धरा का पाप ले।।
10
करुणा के आभूषण सदा, रखती हैं भण्डार में।
भारत की उत्तम नारियाँ, शिक्षित हैं संस्कार में।।
11
अनुपम कविता की कल्पना, अनुपम धारा धारती।
फिर भारत की जय बोलती, करती वंदन आरती।।
12
बाबुल की प्यारी बेटियाँ, पावन इनके कार्य हैं।
हर आँगन में इनकी चहक, खुशियाँ सी अनिवार्य हैं।।
13
बाती करती निश्चित सदा, इन रातों की आयु को।
दीपक से जलती झाँकती, चलती शीतल वायु को।।
14
कलकल से बहते राग में, नदिया का संदेश ये।
मत ठहरो अब चलते चलो, लहरों के परिवेश ये।।
15
उड़ना सोचे मछली मगर, सर्पों के भी पंख हों।
सागर अम्बर की सैर पर, मंखों से कुछ शंख हों।।

मंख का अर्थ - राजाओं आदि के यश और कीर्ति का वर्णन करनेवाला व्यक्ति या (भाट)
16
भारत का ये गौरव अडिग, जग का झुकता भाल है।
हिन्दी की तूती बोलती, संस्कृत जिसकी ढाल है।।
17
राहें वैज्ञानिक खोजते, सारी जनता जानती।
इसरो के नित डंके बजे, सत्ता अपने मानती।।
18
त्रुटि बनकर कण्टक सी चुभे, आहत रहते पग सदा।
चालें बदली दुख दे बहुत, बोझा भी जब तन लदा।।
19
चलना वे सिक्के जानते, खोटा कहते सब जिन्हें।
कड़की में रत्नों से बड़े, कहते ज्ञानी जन इन्हें।।
20 
बोली अपनी ही बोलिये, जो तुमको पहचान दे।
चालों में बगुले हंस की, भूले निज नित ज्ञान दे।। 
21
आशा अभिलाषा कब मिटे, मिट जाता ये गात है।
संकट तनकर सिर पर खड़ा, करता दिन को रात है।।
22
कहते पूजन की विधि सरल, श्रद्धा उत्तम भाव हों।
भावों की नित हो साधना, भूलें सब हिय घाव हो।।
23
बीमारी तन की देखते, मन की देखे कौन है।
वैद्यों का लालच मारता, ये बीमारी मौन है।।
24
मिलकर रहते वो एकता, सब जन ही ये जानते।
आपस के झगड़े मेट कर, सबको अपना मानते।।
25
सपने आभूषण रात के, कब पहनें दिन में भला।
जिसने दिन में पहने कभी, उसका ही सिक्का चला।।
26
शीतल को जो मैं गुण कहूँ, तो मटके को जानता।
अन्तस् में है ज्वालामुखी, इसको कब पहचानता।।
27
आपस की बातें फूटती, तब लगते आघात है।
आघातों की इस घात में, झूठों की ही जात है।।
28
तुलसी औषधि है जानिए, समझो मत बिरवा कभी।
बीमारी ज्वर में तीव्र से, राहत देती ये तभी।।
29
परिभाषा चाहे व्याकरण, इसके ढेरों भेद हैं।
नौका तो वो ही डूबती, जिसके तल में छेद है।।
30
धरती के अन्तस् वेदना, नित तड़पे क्रंदन करे।
नभ में मेघों का मौन ये, व्याकुलता नित हिय भरे।।
31
ये नदिया बहती पूछती, लहरों के क्या काम हैं।
नौका ये बहती बोलती, लहरें मेरे धाम हैं।।
32
निर्धनता ये अभिशाप है, भोगें निर्धन लोग हैं। 
सरकारों की यह चाल या, विधना के संयोग हैं।।
33
ये नदिया बहती बोलती, लहरों ठहरो आप मत।
तिर पाएगी फिर नाव ये, करलो श्रम हो आज नत।।
34
बातों बातों में लेखनी, भावों को आकार दे।
सुंदर गढ़ना हो शिल्प को, छंदों की बौछार दे।।
35
उल्लाला का लेखन सदा, मन पुलकित हर्षित करे।
पाठक श्रोता को बाँधता, भावों की नौका भरे।।
36
लोहे का सरिया डूबता, पुख्ता कवि के भाव हों
लकड़ी नौका ज्यूँ  तैरती, यूँ कविता की नाव हों।।
37
कंचन वर्णी सी लेखनी, कुंदन जैसे भाव हैं।
कविता सुंदर सी अप्सरा, व्यंग्यात्मक से घाव हैं।।
38
ईश्वर भी बच पाते कहाँ, हिय के इस संताप से।
सम्भव हो तो बचिए सदा, पश्चातापी भाप से।।
39
कितनों की है ये प्रेरणा, कितनों का विश्वास है।
इस जीवन में कविता बनी, टूटे हिय की आस है।।
40
काँटे बाँटे किसने यहाँ, खुशियों की इस राह पर।
सब हँसते ही रहते सदा, औरों की हिय आह पर।।
41
चूड़ी चातक की चातकी, चंद्र चिकित्सक एक है।
छनके-खनके खद्योत सी, प्रीतम पाना टेक है।।
42
पहनी पायल पुलकित प्रिये, पावन सा आभास दे।
प्रीतम पोषक परदेस प्रिय, बैठे हिय विश्वास दे।।
43
वेणी केणी सी साजती, महकी कटि शृंगार से।
अस्त्रों शस्त्रों सा तेज ले, धनुषी बाण प्रहार से।।
44
माला के आभूषण कहें, अंतिम यात्रा की चमक।
जन जमघट ये विज्ञात का, बोले अपनी ही रमक।।
45
काजल के डोरे खींचती, नेत्रों के इस द्वार पर।
अति मन मोहक सी अप्सरा, मोहक छवि विस्तार पर।।
46
सुनकर हरियाली तीज पर, लिखता कविता भाव से।
पिछले वर्षों में जब लिखा, क्यों बौराये चाव से।।
47
कविवर तेरा ये धर्म है, करना अब स्वीकार यूँ।
इन बातों पर तुम मत लिखो, काव्य कभी हर बार यूँ।।
48
अबके करवा यूँ बोलता, देता है संदेश ये।
मत करना अब नूतन सृजन, छोड़ो हिय आवेश ये।।
49
भावी पीढ़ी शिक्षित बने, शिक्षामय संस्कार से।
लाये उत्तम सी योजना, विनती ये सरकार से।।
50
गढ़ना रचना का शिल्प अब, शिल्पी सा यह कार्य हो।
छंदों को उत्तम गति मिले, हर कवि को अनिवार्य हो।।
51
थाती ऐसी हो छंद की, गर्व करे साहित्य भी।
रचना जब उज्ज्वल सी दिखे, वंदन दे आदित्य भी।।
52
माणिक रत्नों की लालसा, कब आती किस कार्य है।
भूखों के कब घर को भरें, वश लालच के आर्य है।।
53
पारस खोता निज रूप कब, लोहा भी सोना बने।
चंदन सर्पों के मध्य में, बिन विष के वो नित तने।।
54
लिखकर चिट्ठी भेजे धरा, प्रिय मेघों के नाम पर।
शब्दों में जलती वेदना, करुणा कर निज धाम पर।।
55
अब पाठक मन उलझा हुआ, नूतन कुछ दिखता नहीं।
पढ़ना चाहे जिस गीत को, पुस्तक खोई वो कहीं।।
56
पाठक पल-पल पढ़ प्रीत पय, पावन पारस पीत का।
पुलकित पाठक प्रिय पंक्ति पर, पाचक पय पानीत का।।
57
वैदिक विद्या विस्तृत विनय, वाणी वर्षा ज्ञान से। 
वादनवत वीणापाणि वर, वैदिक व्याख्या ध्यान से।।
58
गुरुकुल सी शिक्षा नीतियाँ, गुरुजन के गुणगान की।
पाए भारत सर्वोच्च पद, इच्छा यूँ विज्ञान की।।
59
रिमझिम रिमझिम बूंदे पड़े, बूंदों से हर्षित धरा।
सावन भादों सी ये झड़ी, अनुपम सा पानी झरा।।
60
नदिया बहती लहरें लिए, अद्भुत सा संगीत दे।
सागर से मिलने जा रही, उत्तम संस्कृति रीत दे।।
61
नदिया जीवन संदेश सी, उत्तम सा व्यवहार है।
प्रीतम से मिलने दूर तक, जाना यूँ स्वीकार है।।
62
छालों का भी अपना कथन, अपने ही कुछ भाव हैं।
उठते दुख के आभास ले, कहती दुनिया ताव हैं।।
63
पाहन के अपने भाग्य हैं, ठोकर दर-दर की मिले।
पैनी छेनी की चोट से, बनकर वो मूरत खिले।।
64
रक्षक कांटो सा चाहिए, फूलों को हरबार यूँ ।
जो कोमलता को चीर दे, उस पर मारे मार यूँ।।
65
बातों की जब खिचड़ी बने, बिगड़े तब उद्गार हैं।
प्रश्नों के फिर उत्तर कहाँ, देती ये सरकार हैं।।
66
काटो तब है कटता कहाँ, इस नदिया का नीर ये।
वीरों के आभूषण सदा, खिलते रहते धीर ये।।
67
बातें बनती रहती सदा, बातों का ये रूप हैं।
नदिया सागर में जा गिरे, जल के गहरे कूप हैं।।
68
नित पढ़ कर जब पाठक बने, कविता पाती मान है।
फिर लेखन रमता कंठ में, वो कविता का ज्ञान है।।
69
जब कोयल कूके बाग में, पंचम सुर की टेर वो।
आकर्षक सी प्यारी लगे, हिय उतरे बिन देर वो।।
70
संकट झंझट मति चाटते, ले जाते 'भ्रम' देश में।
छिड़ती फिर ढेरों व्याधियाँ, संशय के परिवेश में।।
71
मकड़ी का जाला तोड़ दें, मच्छर ये बलवान कब। 
उलझी गुत्थी सुलझे नहीं, सुलझन की पहचान कब।।
72
काँटो को लेकर ये सुमन, इठलाते नित जोर पर।
साहस के फिर बजते बिगुल, देखो आँखें कोर पर।।
73
चंचल हिरणी के राज में, केशी घोड़े तुल्य है।
इस कलयुग में सँभले चलो, कुतिया का बाहुल्य है।।
74
विपदा का दुष्कर काल ये, कोरोना के नाम का।
पूछे सबसे फिर आज ये, मानव तू किस काम का।।
75
कंजल या फिर अंजन कहो, आँखे नित सुंदर बने।
नेत्रों के रोगों को हरे, औषधि ये उत्तम बने।।
76
गोदी प्यारी ममता भरी, लगती सुखमय हर्ष सा।
माँ के चरणों की वंदना, खींचे अद्भुत कर्ष सा।।
77
दोनों ही सम से चाहिए, तुलना के व्यवहार में।
डूबे या तैरे पूछलो, मतलब के संसार में।।
78
कीचड़ में पत्थर फेंकते, अपने पर ही छींट हो।
उत्तर पत्थर के तब भले, सम्मुख कोई ईंट हो।।
79
लीला रचते काले सदा, नित ज्योत्स्ना के साथ में।
यमुना तट पर लिपटे लता, फिर तरुवर के हाथ मे।।
80
बचपन कह अड़चन मत अटक, पल-पल कर अनबन झटक।
अटकन पर पटकन तक लटक, उभरन तक रख उर चटक।।
81
भरती सैनिक होते रहे, चाही जब स्वाधीनता।
आजादी दूँगा खून दो, नारों में थी भिन्नता।।
82
चाकर आकर छाकर करे, अपने सारे कार्य जब।
उनका भत्ता अतिरिक्त हो, मालिक को अनिवार्य तब।।
83
निर्झर स्वर में वह दौड़ता, और उनींदा सा चले।
झरना बहता कहता यही, चलने से अब क्यों टले।।
84
कहता जिसको संसार ये, उत्तम पालन हार वो।
इस जगती पर सब पल रहे, देती है आहार वो।।
85
चाकर करता सेवा सदा, रखकर हिय आनंद सा।
सेठों के परमानंद का, चाकर शीतल चंद सा।।
86
उपवन में नित जो कूकती, मोहित करती राग से।
गुंजन करते आते वहाँ, जाँचो अलि सुर भाग से।।
87
औषधि कहते कुछ वैद्य हैं, संस्कारों में लिख रहे।
अब पालक के कुछ भाव यूँ, उत्तम होते दिख रहे।
88
चाकर चाहे बस चाकरी, कब राज्यों की लालसा।
उसकी रोटी फँसती दिखे, फेंके सत्ता जाल सा।।
89
सरकारी बिल्ली छींकती, अब भरती के नाम पर।
संचित सी थाती जा चुकी, कोरोना के काम पर।।
90
बचपन अपना अनभिज्ञ था, माया के हर शोर से।
माया ने अब बाँधा यहाँ, कसके रस्सी जोर से।।
91
जगती हरियाली चाहती, रोपो तरुवर मिल सभी।
चमकेगा ये पर्यावरण, खुशियाँ छाएगी तभी।।
92
झरना बहता संदेश दे, ऊँचे से भी जब गिरे।
शीतलता का गुण धारलो, क्रोधी जो होते फिरे।।
93
पानी जीवन में बहुमूल्य है, पानी बिन कैसा नमक।
पानी आभूषण कंठ का, जिससे निखरे नित चमक।।
94
वाणी मीठी कड़वी कही, सबके अपने कर्म से।
कड़वी लोगों को काटती, मीठी जोड़े धर्म से।।
95
माया खिलती बन चाँदनी, जो रातों को जागती।
तम से भटकों को मार्ग दे, नित परहित में लागती।।
96
अन्तस् धधके ज्वालामुखी, ज्वाला का अवतार है।
जलता रहता जिससे हृदय, ये ही पालनहार है।।
97
पनपे नित बहकी व्यंजना, कब जाने किस छंद को।
मात्रा गिनते जाता दिवस, क्या कहने मति मंद को।।
98
कण्टक कहता है नित समय, कण्टक ढूँढे छंद में।
ये कविता का कण्टक बना, कण्टक दिखता चंद में।।
कण्टक - घड़ियाल, काँटा, दोष 
99
कंकण से भरके हाथ को, कंकण हिय पर धारती।
प्रीतम के हिय बसती वधू, यह शादी की आरती।।
कंकण - कंगन और मंगलसूत्र
100
ढोंगों के बजते ढोल नित, उत्तम ये व्यवहार से।
कितनों को कितने सीख दें, छोटे जो आकार से।।
101
कड़वी बोली नित घाव दे, दुर्जन का व्यवहार ये।
खीरा के जैसे काट दो, उत्तम है उपचार ये।।
102
कलियुग द्वापर त्रेता सभी, तीनों युग का कष्ट है।
गंगा की समझे वेदना, अपने वे सब नष्ट है।।
103
कलियुग से पाकर कष्ट हिय, गङ्गा नित क्रंदन करे।
गङ्गा तन अम्लों से जला, कैसे फिर धीरज धरे।।
104
मारक सा एकादश दिवस, खिचड़ी क्रंदन में बनी।
पीहर वाले जब थे दुखी, उनकी इस सुख से ठनी।।
105
ये औषधि है हर रोग की, मीठी वाणी बोल नित।
सब अपने से बनकर रहें, देखें सब अचरज चकित।।
106
संकट का झंझट दिख रहा, ज्योतिष जब व्याख्यान दे।
जेष्ठा घातक नक्षत्र की, पूजा को सम्मान दे।।
107
कंकड़ नित ठोकर में रहे, रस्ते सहलाते कहाँ।
इनका दुख रोता सा दिखे, चोटों में दब कर यहाँ।।
108
साबुन जैसे ये झाग दे, करता तन को शुद्ध है।
ऐसे ही कर रगड़े सहन, जन जीते निज युद्ध है।।
109
मुखिया घर में नित एक हो, ज्यों जंगल नृप शेर हैं।
सब के सब जो मुखिया बनें, कदली झड़ते बेर हैं।।
110
तरुवर ये ओछा कब भला, ऊँचे के फल दूर हों।
फल नीचे तरुवर पर लदे, गुण उत्तम भरपूर हों।।
111
कविता की चुनरी छंद की, लगती मोहक सी दिखे।
अनुपम सरिता बनकर बहे, भावों को उत्तम लिखे।।
112
मारुति भगवन हनुमान के, जन्मोत्सव का हर्ष है।
भक्तों की ये आराधना, मिलता हिय उत्कर्ष है।।
113
काँसा भिक्षा ले जब चला, चमके काँसा रूप है।
काँसा बीहड़ में ही खिला, सहकर जलती धूप है।।
114
पनघट उजड़े से दिख रहे, व्याकुल पक्षी शोर से।
क्रंदन पूछे फिर मौन की, प्यासी सी इस भोर से।।
115
आँचल ये आकर्षक लगे, ममता का है सार ये।
सबके हिय को मोहित करे, माँ का उत्तम प्यार ये।।
116
मधुबन की हरियाली महक, जो देती फल फूल है।
चलती है फिर आरी सदा, ये मानव की भूल है।।
117
सविता के भीतर अग्नि जो, वो उज्ज्वल संसार है।
संध्या का ये विश्राम स्थल, देता तम का सार है।।
118
कविता कहने से बन गई, भावों का आकार ले।
हिय स्पंदन की हर टीस में, कविता इक आधार ले।।
119
सरिता की लहरें यूँ खड़ी, झूलें नभ की झूल पर।
अम्बर का दिखता बिम्ब है, इठलाती वो भूल पर।।
120
सागर के आँगन में पले, रत्नों का संसार ये।
सबके भाग्यों को ले परख, उनका है आधार ये।।
121
जननी माता सबसे बड़ी, धरणी सा व्यवहार है।
दोनों माता को कर नमन, इनसे ही संसार है।।
122
शुभदा पग दुल्हन के पड़े, बढ़ता वैभव यश दिखा।
हाथों की रेखा जब पढ़ी, ज्योतिष कहता सुख लिखा।।
123
गहरी सी अपनी पीर है, कहते अपने घाव ये।
अपनो से ही आहत हुए, अपनो के ही दाव ये।।
124
भाषा उत्तम है मौन की, लाखों हल रखती सदा।
सम्भव हो तो सब बोलिये, ये सुर गूँजे सर्वदा।।
125
मंगल शुभ मंगलसूत्र ये, बाँधे प्रीतम नेह से।
सातों जन्मों के ये वचन, निभते गंगा मेह से।।
126
साबुन महके विश्वास का, रखते जन उपवास है
उनका ओरा नित दे चमक, ज्यूँ रवि का आभास है।।
127
काँटे की टक्कर हो रही, तीनों दल तैयार हैं।
शोधन उल्लाला छंद का, करते बन परिवार हैं।।
128
उत्तम से उत्तम लिख रहे, अब ये रचनाकार हैं।
सबके लेखन सुंदर लगें, छंदों के आधार हैं।।
129
जैसे सोना कुंदन बने, पाकर हिय में ताप को।
वैसे लेखन सुंदर बने, सहयोगी पा आप को।।
130
सबको हार्दिक शुभकामना, करते जो सहयोग हो।
उत्तम लिख उत्तम कवि बनो, पावनता उद्योग हो।।
131
यमुना के तट पर चातकी, देखे शशि की ओर है।
लहरें दर्पण सी गा रही, रागों जैसा शोर है।।
132
रोचक सी अनुपम ये कथा, सुनते हरि अवतार की।
मंगल कारी चौबीस की, जन-जन के आधार की।।
133
अम्बर है धरती के तले, या अम्बर तल ये धरा।
पूछा ये किसने यत्न से, सोचें क्यों उत्तर खरा।।
134
रेखा ये सबके भाग्य की, होती है इन हाथ में।
कर्मों से आती है चमक, धर्मों के रह साथ में।।
135
तीर्थो का जल पावन अमृत, रोगों की औषधि यही।
वेदों की वाणी गूँजती, श्लोकों के माध्यम कही।।
136
मुखिया अपने घर ग्राम के, होते लाखों लोग हैं।
पर बनते कुछ ही मुख्य हैं, हिय बसते संयोग हैं।।
137
कविता कवियों की कल्पना, कल्पित कोरे भाव हैं।
सागर अम्बर में नित उड़ें, बादल में भी नाव हैं।।
138
रचना रचते में शिल्प फिर, तोड़े इच्छित भाव जब
झुँझलाहट तड़पे काव्य की, फँसता शिल्पी पाव जब।।
139
जननी माता तो जन्म दे, पाले धरणी माँ सदा।
दोनों में हो आस्था जहाँ, ईश्वर रहते सर्वदा।।
140
गुड़िया सी बासंती लगे, लगता प्यारा रूप है।
मनहारी सा वातावरण, मनहारी सी धूप है।।
141
सविता नित आये पूर्व से, दक्षिण करता स्पर्श है।
उत्तर तो केवल कल्पना, जीवन ऊँचा अर्श है।।
142
शोणित के पौधे रोपकर, उपवन के निर्माण हों।
सीखें उनसे सब वीरता, लड़ना जब तक प्राण हों।।
143
साधक उल्लाला छंद के, लिखने को तैयार हैं।
नूतन रचना रचते रहें, उत्तम छंदाकार हैं।।
144
नीलम की जब ज्योतिष कहे, धारण करना ध्यान से।
इसके भी दुष्परिणाम हैं, पहनो निज पहचान से।।
145
सीखो गुण नवधा भक्ति से, विनयी बनते लोग हैं।
ईश्वर के आशीर्वाद से, बनते शुभ संयोग हैं।।
146
काली पुतली मसि रूप में, शृंगारी मसिपात्र है।
आँखों की बनती लेखनी, पढ़ते लिखते छात्र हैं।।
147
नूतन रचना की कल्पना, अल्पित लगता छंद है।
लिखना-पढ़ना आता नहीं, मेरी मति भी मंद है।।
148
पीपल के तरुवर काट कर, रोपे जन तरु नाश के।
हरियाली नित मिटती रही, बंधन लालच पाश के।।
149
मंदिर का घण्टा गूँजता, गूँजे उत्तम शंख हैं।
चहके पक्षी नित भोर में, खोले उड़ते पंख हैं।।
150
काली से भी काली लगे, क्यों पूनम की रात ये।
विश्वासों की है घातिनी, क्या सच्ची है बात ये।।
151
बातों की भी क्या बात है, बातें तो हैं लाख ये
शोलों से तो ऊर्जा मिले, क्या करती है राख ये।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, March 22, 2021

नवगीत : काँच की चूड़ी : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
काँच की चूड़ी 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/12 

एक विद्युत सी कड़कती
सब प्रथाएँ ढह गई
काँच की चूड़ी चटकती 
आह भरके रह गई।।

कंगनों का साथ छूटा
खनखनाहट मर गई
सोच फिर एकांत खाता
वो अचानक डर गई
मूक स्वर अवरुद्ध घट से 
पीर हिय से कह गई।।

काट दे वैधव्यता को
प्रेरणा सौभाग्य दे
बिन खनक जीवन सजीला 
और फिर वैराग्य दे
सादगी भी सीख दे यूँ 
फिर दृगों से बह गई।।

हस्त का शृंगार अनुपम 
चूड़ियाँ इतना बिलखती
खण्ड खण्डित सी दशा पर 
खिन्न हिय से वो किलकती
घाव पर ले एक आहट 
घाट बन कर सह गई।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, March 21, 2021

गीत : भाव प्रसव की पीर : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
भाव प्रसव की पीर
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 16/14

चित्रित बिम्बित दृश्य दिखाती 
सृजित हुई है ये कविता
काव्य अनूठा नव्य कहाए
बहे भाव की जब सरिता।।

भाव प्रसव की पीर उतरती
जहाँ पृष्ठ दिखते कोरे
केंद्र बिंदु के इर्दगिर्द ही
दिखते आकर्षक डोरे
विरह करुण शृंगार वीरता
सभी रसों के हैं पोरे 
व्याकुल सी मसि रहे स्पर्श को 
ह्रदय लेखनी का चोरे
छिपते चंद्र चाँदनी चातक 
प्रकट हुए हैं जब सविता।।

शिल्प अलंकृत भाव भंगिमा
सदा सराहा जाता वो
गर्भवती जनती जो बालक 
नूतन ही कहलाता वो
जो चोरी के बालक पाले 
निम्न सृजन की माता वो
दोष पिता छक्काधारी का
मिथ्या रखता नाता वो
सृजन बीज खण्डित सा रोपा
जय ही जय चाहे भविता।।

कविता सम्मानित करने की
कैसी रीत चलाई है
सच्चे कवियों की चोरों ने 
अबके नींद उड़ाई है
कब्जा कर औरों की धरती
अपनी फसल उगाई है
बढ़ा लटा ली सरदारों सी
करनी भूल कटाई है
और उघाई भी कब देते
बना मंच ली अब हरिता।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : सूखा आँसू : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
सूखा आँसू
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 16/12 

धुआँ व्यथित सा ढूँढे अम्बर 
रोता चिता जलाकर
सूखा आँसू  दृग पर हँसता 
झरना एक बहाकर।।

और लड़े दुर्भिक्ष वहाँ पर 
दावानल फैलाता
खड़े असक्षम हाथ बाँध कर 
उनको कौन खिलाता 
चक्की क्रंदन पाट घिसाता
एक नहीं दाना पाकर।।

ठिठुरन मांगे एक रिजाई
खोल देख चिल्लाता
यत्न सभी फिर कम्पित गरजे
जबड़ा साथ निभाता
रुई कातनी चरखा भूला 
क्षण वो श्रेष्ठ गँवाकर।।

निर्मित करती ये हार प्रकृति 
फूल सुगंधित तरसे
डरती खुशबू के पर काटे
कलियों पर भी बरसे
पुष्प गए तब फफके उपवन 
कण्टक लेख लिखाकर।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : महायोद्धा : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
महायोद्धा 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~14 / 14

अड़ गये हिय अश्व जैसे
और वो रथ हाँकता है
टूट कर दोनों थके से 
धैर्य सीमा लाँघता है।।

जो स्वयं से युद्ध लड़ते
वो महायोद्धा बने हैं
वन भटकते पांडवों से
कष्ट ने तोड़े घने हैं 
धूप तपती भाग्य रेखा 
सह रहे पीपल तने हैं 
अश्व आत्मिक शक्ति बनता
चेतना हिय दो जने हैं
जब शिथिल दोनों पड़े फिर
कौन दुख को बाँटता है।।

लेखनी बन व्यास तड़पे
मसि महाभारत खड़े हैं
पार्थ लरजा भाव बिलखे
सारथी वो बन अड़े हैं
उठ नही पाये कभी वो
मोह के पर्दे पड़े हैं
वो नदी कब तैर पाये
लोभ के डूबे घड़े हैं
सुन सके वे नाद कैसी
ओम अनहद गाँजता है।।

नीच के सिर ताज सजते
डूबते परमार्थ कैसे
शक्ति का करके विसर्जन
जीत जाते पार्थ कैसे
सत्य फूँके रोग मिटते
बच गए फिर स्वार्थ कैसे
भाव सोते ही रहें तो
मूर्ति हो चरितार्थ कैसे
ये विचारों का भँवर ही
नाव को फिर टाँगता है।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, March 20, 2021

नवगीत : मृत्यु का ढोल : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
मृत्यु का ढोल
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/12 

खाट की फिर पांत रोई 
टूट कर उल्टी पड़ी
दे गया है मेढ़ घर का
कष्ट क्रंदन की घड़ी।।

श्वास की लौ बुझ गई जब
शेष दीपक खोल था
अस्थिपंजर सा दिखा बस
कालिमा का झोल था
अंत का संस्कार फैला
बहु जनों का बोल था
रुंधती सी चीख फूटी
मृत्यु का ये ढोल था
काल की ये चाल निर्मम
आपदा की दी झड़ी।।

टूट बिखरी चूड़ियों की
कुछ लरजती आह थी
नीतियों की पीर सिसकी
रो चली सब राह थी
प्राण चट का दोष नजरें
या किसी की डाह थी
पत्थरों को चीर देती
तीव्र इतनी दाह थी
राम का सत बोलती है
मुक्त श्वासों की लड़ी।।

सांग की जय बुल चुकी थी
रागनी थी तंत की
पुष्प सी उकरी कथा ये
देख जीवन अंत की
कार्य से परमार्थ करते
मेघ जैसे संत की
बोलती अद्भुत व्यथा है 
सभ्यता के पंत की
जोड़ती उत्तम कही है 
हर विधा अपनी कड़ी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, March 19, 2021

नवगीत : पृथक : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
पृथक
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~ 16/14 

देख बिलखता खण्डित चूल्हा 
आग पेट की फिर लहकी
शोर मचाती भीतें रोई
कुछ मुंडेर लगी बहकी।।

पृथकवाद का दृश्य खटकता
कुणबा प्यारा तोड़ गया
नीम करेले से भी मीठी
कुछ हिय में स्मृति छोड़ गया 
जब संयुक्त रहे सब मुद्दे
कारण क्या सब फोड़ गया 
आँखों की नदिया भी सूखी
सूख गाँव का झोड़ गया
निजता की पहचान अनूठी
उग्र शिखा की लौ दहकी।।

छाज छालनी वाचन गुंजित
आज क्षमा चाहे घाटी
कच्चे घर के छप्पर बाँटे
और बँटी दिखती टाटी
गिनकर खाट भरी की रस्सी 
न्यूनाधिक देखी काटी
चाव पृथक होने का टेढ़ा 
लगा आंट पर फिर आटी 
बंधन मन पर नूतनता का
धड़कन पर आहट चहकी।।

इक गंडासे के दो फरसे
उन दोनों को खोल दिया
कष्ट प्रताड़ित पृथकवाद से
कण-कण ने दुख बोल दिया
प्रीत विनय के उन गहनों पर
स्वार्थ द्रव्य का घोल दिया 
कड़वी बोली तीर चलाकर
कोमल अन्तस् छोल दिया
अन्य मिले जब कंठ लगे तो
चोट खटकती सी महकी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, March 18, 2021

गीत : गुलकंद : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
गुलकंद 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

बैठ मौसम के भरोसे
पतझडों की टांग तोड़ी
कंटकों से फूल लूटे
जुड़ गई गुलकंद थोड़ी।।

वृद्धता की इस दवा ने
रोग भी कुछ हर लिये
आयु को लम्बा किया फिर
श्वास भी कुछ भर दिये
भेद जीवन के सिखाकर
और संचित शक्ति जोड़ी।।

नेह अपने से निभाकर 
दानवी ये मार मारी
कर प्रकृति विद्रोह प्राणी
भूलता है बात सारी
रेल ने ईंजन चलाकर
उस धुएँ से आँख फोड़ी।।

खिन्न दिव्यांगी प्रकृति ये
मांगती है इक सहारा
रोग का करती हरण है
पर दवा कारण पुकारा
कौन है दिव्यांग ढूँढो
मानवों ने जात छोड़ी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, March 17, 2021

नवगीत : यूँ समर्पण झील का : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
यूँ समर्पण झील का
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~14/12

सौर मण्डल भी पिपासित
यूँ समर्पण झील का
चांद आँचल से निहारे
देख दर्पण झील का।।

सूर्य की उन रश्मियों ने
सांध्य का वंदन किया
राज्य अपना वार के फिर
चंद्रमा को दे दिया
साँझ का शृंगार अद्भुत
प्रेम अर्पण झील का।।

भेंट में तारे सजाकर
थाल पूरा भर दिया
दिख रहे नक्षत्र मोहक
यूँ  निशा को घर दिया 
बिम्ब बन प्रतिबिम्ब महके
भाग्य सर्पण झील का।।

खोल अम्बर नेत्र देखे
दृश्य अनुपम वश्य का
शुक्लपक्षी मंत्रमुग्धी
चित्र वो परिदृश्य का
साधता है लक्ष्य अपने
दोष तर्पण झील का।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : इंद्रधनुषी सा अबीरी : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
इंद्रधनुषी सा अबीरी 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

इक महोत्सव रूप धरके
पर्व होली यूँ दमकता
इंद्रधनुषी सा अबीरी
रंग फागुन का चमकता।।

हिय पुलक पुलकित पलों का
आज तन्द्रित योग खिलता
ढंग आकर्षण वहाँ पर
प्राप्य रूपक नित्य झिलता
फिर भ्रमर का गान गुंजित
बाग उपवन में गमकता।।

पंख यौवन के खुले जब
खोल कर वे बाँह उड़ते
मस्त गलियों में लहरते
दृश्य मोहक तीव्र मुड़ते
मन मचलता तितलियों का
नेह लाये जो रमकता।।

प्रेम का त्यौहार अनुपम
हर हृदय को मान देता 
पर्व अपना हर कलुषता 
छालनी बन छान देता
एक इतराहट दिखाकर 
माह फाल्गुन ये छमकता।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, March 16, 2021

नवगीत : उज्ज्वल नेत्र : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
उज्ज्वल नेत्र 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14


साँवरे से नेत्र उज्ज्वल
गा रहे हैं गीत अनुपम 
उन पलक की धुन निराली 
नित बजे संगीत अनुपम।।

योग निद्राशील वीणा
लालिमा दे श्वेत अम्बर 
कुछ धूमिल से राग छेड़े
यूँ उड़ाकर रेत अम्बर 
थम पलक आलाप गुंजित
सरगमों की रीत अनुपम।।

ज्योति की लौ व्याप्त जग में
सप्त सुरमय ज्ञान बनकर
पुतलियों की छलनियों से
प्राप्त है ये गान छनकर 
इंद्र धनुषी सी छटामय
चित्र बतियाँ चीत अनुपम।।

ये नयन जल बूंद से ही 
सागरों को भी लजाते
पाश आकर्षण मयी ले
कोर को अंजन सजाते
कथ्य सम्मोहित मधुर से
सुन कहें सब जीत अनुपम।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : द्रोपदी सी व्यंजनाएँ : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
द्रोपदी सी व्यंजनाएँ
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

द्रोपदी सी व्यंजनाएँ
वर्जनाएं तोड़ सहमी
साक्ष्य मिथकों से खड़े जो
वो समर्पण जोड़ सहमी।।

केश कोमल पर्श उलझे
स्वप्न नींदों से जगाते
और वो अपनत्व लूटे
नित्य कुणबा जो लुभाते
वेदनाएं मर मिटी फिर
जो भरोसे छोड़ सहमी।।

प्राप्य दुष्कर साथ छूटे
जंगलों की खाक पाई
भूख की व्याकुल तड़पना
तब उदर ने भूख खाई
व्यंजनों को रोष ये था 
दिव्य भोजन मोड़ सहमी।

पंच रत्नों को लुटाया 
कोख रोती तिलमिलाई
जब गया अभिमन्यु प्यारा
आँख मरुथल ढूँढ लाई
भीम की सौगंध भी तो 
खप्परों को फोड़ सहमी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : ज्ञान का गुरुकुल : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
ज्ञान का गुरुकुल 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~ 14/14 

सूर्य शशि शिक्षित करें नित
दीप सबके हिय जलाकर
हर रहे अज्ञान का तम
ज्ञान का गुरुकुल बनाकर।।

सीख नूतन कर प्रसारित
नव्य सा आभास देते
संतुलित रखते धरा को
प्राणियों को वास देते
मेघ जल का शोध बनते
वाष्प से लें जल उड़ाकर।।

बन खड़ी है श्रेष्ठ शिक्षक 
ये प्रकृति दिन रात देकर 
शीलता गुण तरु प्रदाता
पत्थरों की घात लेकर 
वायु देती ज्ञान सुख-दुख
शीत लू दोनों चलाकर।।

केंद्र शिक्षा देख कर ये
पढ़ रहे हैं कौन अक्षर
गूँजते बहते चलें ये
तो कहीं पर मौन अक्षर 
और लहरों ने पढ़ाया
पढ़ रहे हैं नित सुधाकर।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : पत्थरों के पुष्प : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
पत्थरों के पुष्प 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

पुष्प बनकर पत्थरों ने
घाव पैरों को दिये हैं
रक्त सूखा पीर उगले
दाँव ही उल्टे जिये हैं।।

हर घड़ी ले सिसकियाँ अब
मोम जैसी हैं पिघलती
पाश नागिन से जकड़ कर
हर खुशी को हैं निगलती
विष नहीं तन पर चढ़ा है
पर सदा मूर्छित किये हैं।।

आंसुओं ने कष्ट रोये
पथ गले अवरुद्ध करके
वेग वो ठहरा नहीं यूँ 
बुध्दि तन को शुद्ध करके
पूर्ण थे संकल्प उसके
और ताजा भी लिये हैं।।

पुतलियों की तीव्र इच्छा
नेत्र अपने दोष पूछें
कोर किसने की प्रभावित 
और किसका रोष पूछें
आज मन को मारते से
पेय आँखों ने पिये हैं।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'