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Saturday, March 20, 2021

नवगीत : मृत्यु का ढोल : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
मृत्यु का ढोल
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/12 

खाट की फिर पांत रोई 
टूट कर उल्टी पड़ी
दे गया है मेढ़ घर का
कष्ट क्रंदन की घड़ी।।

श्वास की लौ बुझ गई जब
शेष दीपक खोल था
अस्थिपंजर सा दिखा बस
कालिमा का झोल था
अंत का संस्कार फैला
बहु जनों का बोल था
रुंधती सी चीख फूटी
मृत्यु का ये ढोल था
काल की ये चाल निर्मम
आपदा की दी झड़ी।।

टूट बिखरी चूड़ियों की
कुछ लरजती आह थी
नीतियों की पीर सिसकी
रो चली सब राह थी
प्राण चट का दोष नजरें
या किसी की डाह थी
पत्थरों को चीर देती
तीव्र इतनी दाह थी
राम का सत बोलती है
मुक्त श्वासों की लड़ी।।

सांग की जय बुल चुकी थी
रागनी थी तंत की
पुष्प सी उकरी कथा ये
देख जीवन अंत की
कार्य से परमार्थ करते
मेघ जैसे संत की
बोलती अद्भुत व्यथा है 
सभ्यता के पंत की
जोड़ती उत्तम कही है 
हर विधा अपनी कड़ी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

3 comments:

  1. बहुत ही सुंदर हृदयस्पर्शी नवगीत जिसका हर बिम्ब यथार्थ का अनुभव कराता जीवंत होकर आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। आपके बेहतरीन नवगीतों में से एक नवगीत है यह जो बार बार पढ़ने का मन करे क्योंकि इसे पढ़कर एक अजीब सी शांति का अनुभव होता है जो शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। नमन आपकी लेखनी को गुरुदेव 🙏

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  2. जितनी प्रशंसा की जाए कम.है...बहुत सुंदर...

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  3. यथार्थ सत्य के दर्शन कराती प्रस्तुति

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