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Tuesday, March 31, 2020

गीत : मुरलिया : संजय कौशिक 'विज्ञात'




गीत
मुरलिया
संजय कौशिक 'विज्ञात'

बोल कहाँ हैं तान सुरीली
बोल मुरलिया बोल बता।
विस्मित कृष्ण अचंभित कहते,
व्याकुल हिय मत और सता।

1
बाँसुरिया अवरुद्ध पड़ी है,
राधा जब से बिछड़ गई।
रूठा रूठा हर स्वर देखा,
सरगम तबसे पिछड़ गई।
गीत वृक्ष सब भूल गये से,
भूल गई धुन आज लता।
विस्मित कृष्ण अचंभित कहते,
व्याकुल हिय मत और सता।

2
शुष्क नदी की अविरल धारा,
मेघ वहाँ से जल भरते।
चंदन से कुछ ब्याल लिपट कर,
फिर आहट से भी डरते।
पूछ रहे फिर प्रश्न अनेको,
उठते से फण आज पता।
विस्मित कृष्ण अचंभित कहते,
व्याकुल हिय मत और सता।


संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : टूटी कलम : संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
टूटी कलम 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 14/14 

तोड़ दी ये लेखनी क्यों, 
गूंजते वो गीत पूछें। 
बादलों की पीर बहती,
फिर नयन बन भीत पूछें।

1
उर्मियों से भाव उमड़ें, 
खिलखिलाती वेदनाएं।
आँधियों से तर्क देखा, 
और उलझी सी लटाएं।
हार मेरी लिख चुकी थी,
प्रश्न मुझसे जीत पूछें।

2 
कुछ नई सी कोपलों के, 
शाख से जब युद्ध ठहरे।
फिर कलम लड़ती रही नित, 
कौन देता दर्द गहरे।
व्यंजना का वर्ण दोहन, 
सीखने की रीत पूछें।

3
स्वर कहें बहके हुए से, 
बाँसुरी बज कर दिखादे।
हम नहीं दें साथ तेरा, 
तू तनिक अस्तित्व लादे।
दूध से जो जल चुका था,
आज उससे सीत पूछें।

4
संग छोड़े जब तिमिर ने,
शेष सम्बल लुप्त छाया।
नित्य ठुकराया गया जो, 
रिक्त है सब कुछ गँवाया।
त्याग कर खुशियाँ गई फिर, 
और दुख मिल नीत पूछें।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, March 30, 2020

नवगीत : महका गायन : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
महका गायन 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/16

चिर परिचित यौवन सा महका, 
कली पिपासित महका गायन।
व्याकुलता की बजी बाँसुरी, 
विरह भ्रमर का सुन गुंजायन।

1 
अमृत का तारुण्य कलश वो,
नख शख तक सौंदर्य मनोहर।
लिखे कल्पना कवि सौ मिलकर, 
उससे भी कुछ श्रेष्ठ धरोहर।
विश्व मोहिनी जल भर लाये, 
उर्मि वारती लाखों गौहर।
इंद्र चन्द्र भी आहें भर के, 
देख बनाना चाहें व्योहर।
कृति अनुपम सी जग सृष्टा की, 
सोच रची अद्भुत विश्वायन ........

2
रति लज्जित उस कामदेव की,
वो निज अवगुंठन जब खोले।
नेत्र कटारी से मारक हैं,
शांत चित्तमय वो कुछ बोले।
भौंह कमान चढ़ी प्रत्यंचा, 
ताकत तीर हृदय की तोले।
रतनारे अधरों के हिलते, 
रक्त धमनियाँ धीरज डोले।
तरुणाई लालित्य प्रलोभन, 
शील नदी का चाहे स्नायन ....

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : हँसता पाटल : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
हँसता पाटल 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/14


कंटक के आंचल से निकला, 
खिलता सा पाटल हँसता।
तूने क्या उपहार समेटा,
जो दो धेले सा सस्ता।

1 
फिर जीवन के इस पड़ाव में, 
एक खुशी महकाई है।
हर्ष पूर्ण यौवन सी खिलकर,  
एक कली चहकाई है।
भ्रमित हुई या भ्रमर गान पर, 
किसने वो बहकाई है।
मादक मारक खिली हुई सी, 
चिर अद्भुत तरुणाई है।
आकर्षण का केंद्र पूर्ण वो, 
क्षण क्षण उसमें है बसता .....

2
कल्पित कहूँ अप्सरा उसको, 
मनभावन सा रूप कहूँ।
खिली शरद की रात चांदनी, 
या दिनकर की धूप कहूँ।
स्वर्ण चिड़ी सी चहके जब वो, 
कोयल चहक अनूप कहूँ।
शीतल पुंज भरा भावों का, 
गहरा सुंदर कूप कहूँ।
दिखती रात तीसवीं तिथि पर, 
दीप्त दीप भीतर चसता ...

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, March 29, 2020

नवगीत : सिंदूरी साँझ : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
सिंदूरी साँझ
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~18/17


सिंदूरी  साँझ के अस्तांचल में, 
धुंधलापन क्यो गहर गया है।
चला नहीं लहरी क्षण क्यों आगे,
देख किसको फिर ठहर गया है।

1
अकुलाहट कुछ हिचकाहट  देखी,
इस क्षितिज के आँचल में रुककर। 
समय उड़ाने भर कर उड़ता था, 
मोर पंखों को खोले  झुककर।
आज अचानक वो लय क्यों टूटी,
शांत चितवन भी लहर गया था

2
कश्ती जब तट को खोज रही थी,
उर्मियाँ सागर की बोल उठी।
अवगुंठन मदमाई सी संध्या,
देख यौवन उसका खोल उठी।
जब अन्तस् में ज्वाला सी दहकी, 
टूट क्रंदन का फिर कहर गया ....

3
मांग सुसज्जित सी देख सितारे, 
और ज्यादा से जब चमक चले।
शशि की कांति अदृश्य भले दिखती, 
आस तारों की थी दमक चले। 
घर के आंगन तक हँसता आया, 
चंद्र नभ मण्डल में फहर गया।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : डरावनी रातें : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
डरावनी रातें 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/16 

डरावनी सी रातों में क्यों
दरक गया मेरा ये जीवन।
श्वेत उजाला क्यों लड़ बैठा, 
भड़क गया करके वो अनबन।

1
झंकृत वीणा से स्वर फूटे, 
अटक अटक कर तान बनी।
राग बजाये मोहक सारे, 
उच्चाटन की पहचान बनी।
अन्तस् धरणी बंजर दिखती, 
उठता सा धूम श्मशान बनी।
बहुत थूकते बहुत चबाते, 
कत्थे का मीठा पान बनी।
इन सबसे मन ऊब चुका अब, 
धड़क अटकती हैं कुछ धड़कन....

2
हृदय विदारक मौन छिपाये, 
मंथन का ही ज्ञान लिया जब।
आत्म चीख के सन्नाटों को, 
भाग्य स्वयं का मान लिया जब।
दृश्य मनोहर लिए कटारी, 
उनको अपना जान लिया जब।
अस्त्र उन्हीं ने सीधे हमपर, 
पीछे से आ तान लिया जब। 
अर्पण हृदय किया था जिसको, 
पलट मांगता वो ही गर्दन .... 

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : तड़पती लेखनी : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 
तड़पती लेखनी 

मापनी~~ 14/14 


फिर तड़पती लेखनी यूँ,
बिम्ब चमके जब अनूठे।
डूब के अम्बर निहारा, 
वो नदी के साथ रूठे।

1 
कष्ट के कारण मिले जब, 
पीठ से खंजर निकाले।
दृष्टि से ओझल हुए वो, 
दे चुके थे लाख छाले, 
दृश्य अनुपम ताल ठोके,
और मर्यादित व झूठे.....

2
जल रही हिय की करूणा, 
राख आँधी ने उड़ाई।
शब्द का डूबा समर था, 
वेदना की अंगड़ाई।
फिर नहीं अंकुर हुए वो,
भाव बिखरे देख पूठे.....

3
वर्ष भर कितने समेटे, 
कुछ महीनों के लिए जब। 
न्याय करता ये समय भी, 
बुझ गए लाखों दिए जब।
क्रूर क्षण के ठोकते से,
दे विदारक पीर मूठे .....

संजय कौशिक 'विज्ञात'