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Thursday, November 25, 2021

नवगीत : शब्दशक्ति : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
शब्दशक्ति
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~14/12

सप्त सुर में गूँजती सी
काव्य की अनुपम छटा
नौ रसों के भाव नूतन
यौवना बाँधे जटा।।

तुक वसन तन पर निखरता
कामनी सी दंग करती
बिन तुकों की धार लज्जा
ओढ़नी सिर ओढ़ मरती
शब्द से शृंगार लेकर
अर्थ की उलझी लटा।।

ले गणित का ज्ञान गहरा
श्रेष्ठ विद्योत्मा यही है
हारते काली जहाँ पर 
बात विदुषी सी कही है
छंद लेखन झट निभाये
शिल्प है ऐसा रटा।।

चित्र यूँ हितकर उकेरे
बिम्ब की अनुपालना से
दोष सारे लक्षणा के
छानती है छालना से
व्यंजना की ये तपस्या
शक्ति रखती जो सटा।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, November 24, 2021

नवगीत : पर्वतों से आह निकली : संजय कौशिक विज्ञात



नवगीत
पर्वतों से आह निकली
संजय कौशिक विज्ञात

मापनी ~ 14/14

पीर के ज्वालामुखी को
देखकर चट्टान पिघली
आँसुओं सी बह गई जब
पर्वतों से आह निकली।।

घात दे आकृति धुँए की
नेत्र भी बहने लगे फिर
दूर हट जा मत तड़प दे
बात वो कहने लगे फिर
ढूँढते ढाँढस फिरे जब 
प्राप्त होते आम इमली।।

शांत वो गरजा गगन भी
धीर बाँधे मेघ न्यारी
पीठ में अपनत्व की यूँ 
देख लंबी सी कटारी
रक्त की बहती नदी सी
हर्ष की यूँ प्यास निगली।।

फट गया धरणी ह्रदय यूँ
आस की हर डोर टूटी
और अन्तस् को व्यथित कर
जब हृदय की कोर लूटी
चंद्र तारे सौर मण्डल
मिल बुझाते आग पिछली।।

संजय कौशिक विज्ञात

नवगीत : पनघटों के गीत प्यारे : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत
पनघटों के गीत प्यारे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14
पाखियों की चहचहाहट
पनघटों के गीत प्यारे
उस रहट की तान गूँजे
तितलियों के राग न्यारे।।

कामिनी की दोघड़ों ने
धार जीवन की भरी जब
ढोल चुपके से मिला यूँ
माट ले सिर पर धरी जब
धुन बजा कर राग उत्तम
तू पुनः आना पुकारे।।

पाँव पनिहारिन धरे यूँ
देह लेकर फिर लरजती
दो घड़ों का भार तन पर 
चाल उसकी और जमती
भोर लाली वारती सी
यूँ ठहरती सी निहारे।।

हर्ष घड़ियाँ प्रिय लगी यूँ
और आकर्षण निखरता
कर चला नभ और वंदन
जब उजाला सा बिखरता
कुछ भ्रमर जब झूमते से
तब चले गा बाग द्वारे।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, November 6, 2021

नवगीत : पीर अन्तस् की उगलती : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
पीर अन्तस् की उगलती 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~14/14

पीर अन्तस् की उगलती 
काँच की चूड़ी चटक से
ये विरह का ज्वारभाटा
घोर तड़पन की खनक से।।

मेंहदी का रंग फीका
यूँ महावर खो चुका अब।
पायलें हो त्रस्त रोई
हर्ष चहुँ दिश का रुका जब।
आज गर्दन भी अकड़ के
यूँ व्यथित सी है चनक से।।

भाव गढ़ते मूर्ति बोले
वो कला भी शांत दिखती
मौन हैं छीनी हथौड़ी
धार से जो क्लांत दिखती
भीग कर आँखें ठहरती
रूप दर्शन की खटक से।।

आग ज्यूँ ज्वालामुखी की
यूँ दहकती बढ़ रही सी
वेदना की लौ भड़कती
कुछ अखरती चढ़ रही सी
हिय नहीं संतुष्टि पाये
दूर प्रिय की इक झलक से।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'