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Saturday, March 28, 2020

लघुकथा : प्रेम की परिभाषा : संजय कौशिक 'विज्ञात'


प्रेम की परिभाषा 
 संजय कौशिक 'विज्ञात'

           मयंक! मेरा रास्ता छोड़ो कहते हुए स्नेह ने दो कदम आगे बढ़ाये ही थे कि मयंक दो कदम पीछे हटते हुए बोला नहीं पहले मेरे प्यार के इस गुलाब को स्वीकार करो।
       स्नेह ने हाथ के इशारे से इंकार करते हुए कहा कि आपको यह गुलाब अपनी पत्नी को देना चाहिए उससे बड़ा आपका कोई मित्र नहीं हो सकता। मयंक बात काटते हुए हुए बोला स्नेह मैं तुमसे अथाह प्यार करता हूँ।
       पर मेरा प्यार मेरा पति है स्नेह ने कहा .... पर वो तो तुम्हारी पड़ोसन के साथ भाग गया है ना? फिर कैसा प्यार? मंयक को पुनः समझाते हुए स्नेह ने कहा कि मैं नारी हूँ, कभी किसी भी नारी पर अत्याचार नहीं करती और न ही कभी सहन ...... 
        मयंक ने कहा तो गुलाब स्वीकार न करके तुम स्वयं पर अत्याचार नहीं कर रही हो....? 
नही... बिल्कुल नहीं- स्नेह ने कहा, मैं पति के गैर जिम्मेदार होने का कष्ट अच्छे से समझती हूँ।
       तो स्नेह तुम भी समझदार हो जाओ और गुलाब स्वीकार कर लो। अपने पति के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का हिसाब बराबर कर सकती हो ....
          इस पर स्नेह ने कहा नहीं जो कष्ट और पीड़ा मैं भुगत रही हूँ, वही कष्ट और पीड़ा मैं स्वयं किसी भी महिला को कैसे दे सकती हूँ ? फिर भले ही वह तुम्हारी पत्नी ही क्यों न हो .....
        मयंक अवाक देखता रहा और स्नेह अपनी बात कहकर ऑटो में बैठ चुकी थी।

संजय कौशिक विज्ञात

Tuesday, March 24, 2020

नवगीत : कोरोना का शृंगार : संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
कोरोना का शृंगार
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी~~14/14 


देख रतनारे अधर ले, 
कामुकी सी कामिनी वो। 
भय अजब देती वहाँ पर,
जब निकट थी दामिनी वो॥  
 
1 
देख के शृंगार दर्शक, 
आह कुछ पाषाण भरते।
फिर क्रिया जितने कलापें, 
दृश्य मोहक लोग मरते।
कुछ भटकते ताकते से, 
चाँदनी थी यामिनी वो। 

2 
तीव्र श्वासें थामते से, 
हाथ हिय पे धर पुकारे।
मौन बोला फिर शहर ये, 
कौन ये परियाँ उतारे।
मारने का यंत्र लेकर, 
दौड़ती गज गामिनी वो।

3 
देख कर सौंदर्य अद्भुत, 
फेरते हैं लोग मुखड़े।
जो तड़पते खाँसते से,
हँस रहे हैं आज दुखड़े।
सोच कोरोना डरे हैं, 
दिख रही है भामिनी वो।

4
बांध कर मुख आज चलती, 
देख फूलन सी जवानी।
विष भरी बहती हवाएं, 
लिख रही हैं नव कहानी।
शव कहे क्रंदन करो कुछ, 
मौन पसरा धामिनी वो।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : चुभती खुशियाँ : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
चुभती खुशियाँ 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 


मापनी~~ 14/14 

बंद आँखें ढूंढ लायें, 
स्वप्न वो आकर जगाता।
ये खुशी किसको गई चुभ, 
हर्ष भी कितना रुलाता॥

1
आज कण्टक क्षण प्रफुल्लित, 
और पुलकित वेदनाएं।
शूल उपवन में खिले से, 
पुष्प रज-कण में समाएं।
दीप आँधी को भुलाए, 
कर प्रकाशित जग दिखाता।

2
ये विरह शीतल लगा कुछ, 
कल्पना करती मिलन जब।
क्षण ठहर हिमखण्ड जैसा, 
श्वास सी जलती अगन तब।
वो समाहित सी सुगंधित, 
भावना बन खिलखिलाता।

3
लोहबानी तन बना यूँ, 
जो अधर छूते पिघलता।
या समर्पण मोम का था, 
स्पर्श चकमक ही निगलता।
बन हिमालय आज मिलता, 
उर्मियों को जो छकाता।

4
रागिनी का राग से फिर, 
और निष्कासन हुआ जब।
फिर भ्रमर ने गीत गाया, 
गुनगुना अन्तस् छुआ जब।
धुन मधुर डूबा खुआ जब, 
प्रेम के किस्से सुनाता।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, March 23, 2020

नवगीत : विश्वास टूटा : संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
विश्वास टूटा 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी~~ 14/12 

अवरोध बन विश्वास टूटा, 
मन तड़पता रह गया।
फिर रोष से अन्तस् भरा तब, 
तन भड़कता रह गया।

1
प्रतिशोध को त्यागे हृदय क्यों,
आज यूँ उनके लिये।
अम्बर पटल से ताकता वो, 
प्रज्वलित लेकर दिये।
धरणी पुकारे नेत्र से फिर, 
छन अकड़ता रह गया।

2
नाविक किनारा छोड़ आया, 
जो भँवर फँसता चला।
षड्यंत्र ही कारण बना कुछ, 
छिद्र कश्ती का खला।
आज किस्सा याद है वो, 
कुण जकड़ता रह गया।

3
आदेश ऐसे मानता था, 
जब कही हर बात वो।
कहता अगर मैं रात को दिन, 
मानता था रात वो।
देखा उसी को आज मैंने, 
सुन कड़कता रह गया।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत :शब्द मसि का युद्ध: संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
शब्द मसि का युद्ध 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 14/14 

लेखनी थकने लगी तब
वर्ण रूठे और ज्यादा
शब्द मसि से युद्ध करते
मौन करते शोर ज्यादा

1
भाव बहके जिस गली में, 
बाग वो महका हुआ सा।
जो खटक देता रहा फिर, 
और अंतस को छुआ सा।
घुंघरू को तोड़ता अब, 
नाच कर मन मोर ज्यादा

2 
काँपती थी उँगलियाँ वो,
लेखनी जिनको थमाई।
अब उन्होंने गर्व में भर,
क्यों हमीं पर यूँ उठाई।
वो गरज कर फिर बरसते
आज बन घनघोर ज्यादा।

3
देख कर जुगनू चमकता, 
जो स्वयं शशि दूर करते।
दम्भ पूरक ज्ञान के कुछ,
देख चर्चा में निखरते।
नेत्र भीगे से कहें वो,
शुष्क हैं कुछ कोर ज्यादा।

4
खोट क्रंदन है मनों में, 
जो उगलते गीत मेरे।
मौन ही हथियार थामा, 
भाग्य की है रीत मेरे।
है अँधेरे चीरने अब, 
और पानी भोर ज्यादा।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, March 19, 2020

नवगीत : दुर्भिक्ष : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
दुर्भिक्ष 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी 14/14 

बिन बिजाई खेत में कुछ, 
मौत की फसलें खड़ी थी।
रह गया सूखा प्रलय भी, 
झाड़ पर लाशें पड़ी थी। 

1
मोरनी चिल्ला उठी कुछ, 
चीख अम्बर ने सुनी थी।
मेंढकों ने प्राण त्यागे,
कुछ यही सबकी धुनी थी।
आग की बरसात देखी,
और जलती वो घड़ी थी।
रह गया सूखा प्रलय भी, 
झाड़ पर लाशें पड़ी थी। 

2
ली नहीं कुछ भी डकारें,
चाब कर सत्तर युवा को।
अग्नि किसने फूंक दी यूँ,  
फिर बहे लू सी हवा को।
दागती वो मौत सबको, 
आस जीवन की कड़ी थी।
रह गया सूखा प्रलय भी, 
झाड़ पर लाशें पड़ी थी। 

3 
स्वेद की नदियाँ बही पर, 
ये धरा प्यासी रही फिर।
बंध टूटे उन नदी के, 
बाढ़ भी सूखी बही फिर।
चींटियाँ अंडे उठाती,
बोझ के नीचे गड़ी थी।
रह गया सूखा प्रलय भी, 
झाड़ पर लाशें पड़ी थी। 

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, March 17, 2020

नवगीत : कुठाराघात : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
कुठाराघात
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/16 

सागर की लहरों के ऊपर, 
झूल रही जीवन की नौका।
देख कुठाराघात समय का,
ढूंढ रही खुशियाँ भी मौका।

1
एकाकी का अजगर जकड़े,
है बारात भले तारों की।
मित्र तिमिर है भाग्य हमारा, 
आज परख हो सब प्यारों की।
चमक रहे खद्योत कहाँ पर, 
दूर निकट फिर उन सारों की।
झींगुर कितने गूंज रहे हैं, 
और सुनें ध्वनि उन नारों की।

नाभि चुभी सूई की पीड़ा,
श्वान कहाँ से समझे भौका।
देख कुठाराघात समय का,
ढूंढ रही खुशियाँ भी मौका।

2
दूर खड़ा वो देख गगन ध्रुव, 
आज अकेला वो भी कहता।
सत्य अटल हिय शाश्वत सच सा, 
नित्य निरन्तर देखो दहता।
झूल रहा मैं जिन पलड़ों में, 
पीड़ा शूलों जैसी सहता।
पैर नहीं टिकते धरणी पर, 
अधर- अधर ही हर क्षण रहता।

दिव्य क्षणों की बल्लेबाजी, 
मार रही जो छक्का चौका।
देख कुठाराघात समय का,
ढूंढ रही खुशियाँ भी मौका।

संजय कौशिक 'विज्ञात'