copyright

Sunday, March 15, 2026

गीतिका :- धर अधर पे ऊर्ध्व अपना / अनकही बातें बहुत सी डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’




गीतिका १

अनकही बातें बहुत सी
उन पलों की रह गई।
साँझ सिंदूरी सिसकती
स्मृति-सरस में बह गई।।
१
मंद मृदु मुस्कान मध्यम
मन–मुकुल में नाचती।
व्यंग्य साधे बाण बिन जो
मौन में वो कह गई।।
२
युग-युगों की याचना-सी
साधना में यामिनी।
याद याचक-सी युगों तक
यज्ञ-सी बन दह गई।।
३
आपदाएँ जब बिखरकर
मार्ग को दुर्गम करें।
पीर पर्वत-सी पिघलकर
चोट-सी नित सह गई।।
४
भावनाओं की तरंगें 
उठ रही शैवाल-सी।
चित्त को चट्टान करके
वो घृणा फिर ढह गई।।
५
नाद मुरली-सा खनकता
व्योम के कुछ स्वर सजाकर।
लिख रहा ‘विज्ञात’ कविता
राग बनकर यह गई।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’


======================

गीतिका २


धर अधर पे ऊर्ध्व अपना,
मौन जो होती नहीं।
स्वप्न में करती शिकायत,
जाग के सोती नहीं।।
१
ढूँढती है जो मुझे नित,
हार बैठी खीज में।
हास्य पर हँसती अदा कुछ,
व्यंजना रोती नहीं।।
२
श्वेत वर्णी ओढ़ आँचल,
झाँकती चुप नेत्र से।
यूँ छिपाए भाव अपने,
एक भी बोती नहीं।।
३
अप्सरा पानी भरे नित,
सुंदरी को देख के।
कुछ चुराकर दृष्टि मिलती,
जो हया खोती नहीं।।
४
सीखती हिमखण्ड से वह,
शैलपुत्री रूप में।
प्रेम की मूरत मृदुल सी,
सीप की मोती नहीं।।
५
जाग कर जागृति सिखाती,
मूँद बैठी जो पलक।
रीतियों की बन कसौटी,
व्यर्थ वो ढोती नहीं।।
६ 
प्रेम से ‘विज्ञात’ सीखे,
रीत का नूतन चलन।
प्रीत की कविता रचे जो,
हर कलम तोती नहीं।।

डॉ० संजय कौशिक ’विज्ञात’

Tuesday, February 17, 2026

स्पर्श तुम्हारा ... डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’

स्पर्श तुम्हारा 




डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’


स्थाई 🌿🌹🌷🥀🌾

मौन मलय मूरत मन-मंदिर,
मधुर मिलन को मीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा, 
मंद मधुर संगीत कहे।।

1अंतरा   🌹🥀🌹

नयनों में नव नील निमंत्रण,  
नीरव नभ संकेत लिए।   
कंपित कर-कमलों की कोमल  
कस्तूरी के खेत लिए।   
लाज लता-सी लिपटी देही,  
मन-मरु में मधु-रेत लिए।   
स्वप्न सलोने साँझ-साँवली   
विरह आग ने छेत लिए।।   

पूरक पंक्ति 🌿🌷🌿

कलियों ने घूँघट पट खोले
भ्रमर चहक नवगीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।

2 अंतरा 🌹🥀🌹

तन तरुवर-सा थरथर डोले
हिय ऋतुराज समीप हुआ।
मोम पिघलता सा आलिंगन 
चुम्बन लय का दीप हुआ। 
साज सजाए पल–पल सुरभित
हृदय स्वाति सा सीप हुआ। 
हर्ष मुकुल में मंथर मादक
मिलन मेंहदी लीप हुआ।। 

पूरक पंक्ति 🌿🌷🌿

मग्न पवन मकरंद-मदनमय
मधु-माधव की जीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।


3 अंतरा 🌹🥀🌹

गगन-गुहा में गूढ़ नाद से
सृष्टि-सुरों के रूप दिखे।
प्राण-पटल पर अंकित अक्षय
स्नेह-अगाध अनूप दिखे।
नभ के दृग से नित नव नूतन
तेज ध्यान की धूप दिखे।
जीवन-जप में दृढ़ संकल्पित
संबंधों के कूप दिखे।।

पूरक पंक्ति 🌿🥀🌿

चांद चाँदनी चंचल चितवन
मौन चकोरी प्रीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।


4 अंतरा 🌹🥀🌹

सांध्य सलिल दो नेत्र सरोवर
स्वप्निल हिय आभास करे। 
उर्मि अटल इन वारिधियों की 
प्रेमिल पर  विश्वास करे। 
चट्टानी अवशेष दिखे तो
निर्झर-सा उल्लास करे।
मन-मंजूषा मधु-मंत्रित हो
मुक्त मिलन अहसास करे।।

पूरक पंक्ति 🌿🥀🌿

तारों की थरथर थिरकन भी
मन वीणा को शीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।


5 अंतरा 🌹🥀🌹

चुम्बक-चेतन चितवन चंचल
चित्त मिलन की प्यास करे। 
रोम-रोम रागांगन रचता
रक्तिम रेखा रास करे। 
नभ-नयनों के नील निलय में
नूतन निशा निवास करे। 
हृदय-हरितिमा हुलसित होकर
हर्षित हर उर उल्लास करे।। 

पूरक पंक्ति 🌿🥀🌿

अधर अधीर सुर्ख अलसाए
प्रबल प्रेम कर–पीत कहे।।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।


6 अंतरा 🌹🥀🌹

उदित प्रभा नित करे अचंभित
स्मृति का मेघ ’निनाद' करे।
प्रेम पथिक जुगनू का दीपक
तम से यूँ ’संवाद’ करे।
सुप्त पड़ी कुण्डलिनी मानो
चिंता मणि अवसाद करे।
ज्योति बिंब हिय - गर्भ प्रेम के
धरणी सुधा प्रसाद करे।।

पूरक पंक्ति 🌿🥀🌿

साँसों की सरगम सिरहन सी
सरस सुगंधित रीत कहे।
स्पर्श तुम्हारा ऋतु-विप्लव सा 
मंद मधुर संगीत कहे।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’

Monday, February 16, 2026

यक्ष प्रश्न प्रतिबिंब का – डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’



यक्ष प्रश्न प्रतिबिंब का

प्रतिबिंब प्रश्न करता ये मेरा 
क्यों पैदा करने को आतुर थे।
मौन हुई अंतस की गहराई
क्षोभ हृदय के उत्कंठातुर थे ।।

वंश अंश की नींव गढ़ी थी 
पितु दादे पड़दादे ने।
सात पीढ़ियाँ करी तिरस्कृत
यक्ष प्रश्न से सादे ने ।।
जन्म विलक्षण कहते थे सब 
लाड लडाने को रोगातुर थे।।

तू है हर विद्या का ज्ञाता 
मुझमें इतना बोध न था
किंतु भाग्य के हर कोने पर
यूँ निष्ठुर अवरोध न था
पुत्र श्रवण की अभिलाषा में हम
नेत्रहीन निर्धन भावातुर थे।।

फिर भी है त्रुटि स्वीकार हमे
पर तू गलती मत करना
वंश अंश की परम्परा के 
झूठे बोझ नहीं मरना 
अपने सुत से आज्ञा ले लेना 
हम तो ढीठ मूढ़ कामातुर थे।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात‘

देख गाँव ये... डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’

शीर्षक - देख गाँव ये...

डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'

स्थाई ✍️
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)

1 अंतरा ✍️
हाँक बैलगाड़ी मै बैठूँ,
चुपके से तुम्हे निहारूँ। (नायक)
मुरली बना अधर की मुझको,
अपनी हर खुशियाँ वारूँ (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
सुन धड़कन का प्रेम तराना
महक उठे हर एक कली। दोनों।
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। नायक।।

2 अंतरा ✍️
नील गगन ज्यों मिले धरा से
ऐसा हो मिलन हमारा।(नायिका)
आकर्षक अनुबंध प्रेम का 
देखे हमको जग सारा। (नायक)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
मुझे छिपाना निज बाहों में 
देख न पाए गाँव गली। (नायिका) 
तुम्हे छिपाऊँ निज बाहों में 
देख न पाए गाँव गली। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)

3 अंतरा ✍️
साँझ ढले घर लौट चलेंगे 
चंदा जब राह दिखाए। (नायक) 
हँसी अधर की उजली किरणें 
मन का दीपक बन जाए।।(नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
हाथ थाम जीवन जी लेंगे 
ठहरी घड़ियाँ लगें भली। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)

4 अंतिम बंध ✍️
आज गाँव में भ्रमण किया तो
मेरा ये संसार मिला। (नायक)
मांग महकती सिंदूरी सी
तू सच्चा श्रृंगार मिला।। (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
धन्य हुई साँसों की सरगम 
धड़कन सुर में बैठ ढली।। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(दोनों)

डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, November 17, 2024

गीतिका : डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’



गीतिका 

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’

मापनी 
2122 2122 2122 212

रात जो बीती हुई है क्या भुलानी चाहिए।
भूल से भूली हुई क्या स्मृति मिटानी चाहिए।।

लिख दिए थे ग्रंथ इतने कौन पढ़ या सुन सका
नव्य रचना शंख से रच ध्वनि बजानी चाहिए।।

बेटियों सी बन सकेंगी कब नई दुल्हन बता...
देश को नूतन प्रथा कुछ अब चलानी चाहिए।।

काव्य इतना है रचा ये देश पर सोया रहा
एक कविता ओज की कविवर सुनानी चाहिए।।

व्यर्थ के ये तर्क देकर जो यहाँ डंका बजाते
सीख ली जो शिष्टता कुछ तो दिखानी चाहिए।।

गोलियाँ बरसी यहाँ जब संत निर्मल देह पे 
अब अलग ही आज भगवा की कहानी चाहिए।

शत मुखी ज्वाला उगलती रच रहे कविता सभी
चोर का भय मान के क्या कृति छुपानी चाहिए।। 

भागते ही भागते जो चूर होकर गिर गया
शर्त उसको फिर चलाने की लगानी चाहिए।।

वो गले सबसे मिला था कष्ट जो उसको मिले 
हर्ष की है टीस प्यासी अब बुझानी चाहिए।।

मल लिया सिंदूर तन पर मातु का सुनके कथन 
श्रेष्ठ सेवक भक्ति हनुमत सी बढ़ानी चाहिए।।

हाथ ले विज्ञात झण्डा धर्म का अब तान चल ...
नित सनातन के विजय की जय निभानी चाहिए।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’


Sunday, November 10, 2024

गीता का विधान ; भक्ति गीत। ; डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’


🙏 भक्ति गीत 🙏
📕 *गीता का विधान* 📕

मन ही मन में जपता चल तू 
गीता कहे विधान को 
*हृदय बसा हनुमान को।।*

जीवन रथ पर ध्वज हो इनका
कृष्ण सारथी बनता जिनका
रचे वही विज्ञान को।।
*हृदय बसा हनुमान को।।*

अंगराज वो महावीर था
कर्ण नाम का दानवीर था
बढ़ा हाथ ले दान को।।
*हृदय बसा हनुमान को।।*

नेत्र हीनता होती घातक
तड़पे यूँ जन ज्यूँ खग चातक
ज्ञान नहीं अनजान को।।
*हृदय बसा हनुमान को।।*

अर्जुन बन अवसर जो पाते
युद्ध विजेता वे कहलाते
कृष्ण खड़े उत्थान को।।
*हृदय बसा हनुमान को।।*

संजय कौशिक बेरी वाला
राम नाम की रटता माला
समझ चले आख्यान को।।
*हृदय बसा हनुमान को।।*

डॉ. संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, May 24, 2024

कहानी कैसे लिखें? कहानी लेखन की संक्षिप्त जानकारी – संजय कौशिक 'विज्ञात'

कहानी कैसे लिखें?

कहानी लेखन की संक्षिप्त जानकारी

– संजय कौशिक 'विज्ञात'



अच्छी कहानी लिखने के मुख्य सुझाव-
1
पात्रों का विकास करें- चरित्र विकास किसी भी अच्छी कहानी का अभिन्न अंग है। पात्रों में गहराई होनी चाहिए ताकि पाठक अथवा दर्शक उनसे जुड़ सकें। चाचा चौधरी, साबू कॉमिक्स के इतने प्रसिद्ध होने का असली कारण यह है कि युवा पाठक उन पात्रों से जुड़ सकते हैं। लेखक जब अपनी कहानी लिखे तब उस कहानी में विद्यमान पात्रों को कुछ इस तरह से विकसित करे कि पाठक वर्ग अधिक से अधिक जुड़ सके इसके लिए अपने आस-पास के लोगों का निरीक्षण करे ताकि कहानी से जुड़े संबंधित पात्र को और अधिक निखारा जा सके उसके चरित्र को स्मरणीय बनाया जा सके । 
2
घटनाओं के क्रम को ध्यान से चुनें - कहानी में घटनाओं के क्रम का बहुत महत्व होता है और कहानी के लगभग हर हिस्से पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, तीन तलाक से पीड़ित किसी महिला की कहानी है तो 2010 या 2000 से पूर्व की अवस्था पीड़िता के कष्ट की अनुभूति अलग होगी जबकि आज की कहानी उसकी कष्ट से मुक्ति की कहानी हो सकती है। इस प्रकार से कहानी अलग अलग हो जाती हैं। ऐसा इसलिए समय बदला हालात बदले और कहानी भी बदल गई। इसलिए कहानी पर घटनाक्रम का बहुत अधिक प्रभाव होता है।
3
कहानी लिखने से पूर्व  कथानक की रूपरेखा अवश्य तैयार करनी चाहिए। कहानी लिखने से पूर्व कथानक की रूपरेखा या कहानी का सार तैयार करना उत्तम कथानक के लिए सहयोगी सिद्ध होता है क्योंकि इससे कहानी में विचारों को जोड़ने में सहायता मिलती है और कहानी लिखना शुरू करने से पहले कथानक की कमियों के विषय में लेखक को स्पष्ट जानकारी मिल जाती है। 
4
कहानी में ऐसी बातचीत सम्मिलित करें जो पात्र के विचारों को प्रकट करके पात्र के व्यक्तित्व को और अधिक निखारे- पात्र के विचारों के विषय में बताने से कहानी रोचक बनती है और पाठक को पता चलता है कि पात्र को कैसे क्या और कहाँ से कार्य करने की प्रेरणा मिलती है और यह कथानक को आगे बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होता है।
5
कहानी की रूपरेखा को स्थापित करके और अधिक गतिशील बनाएं- पात्रों द्वारा सुनी गई ध्वनियों या उनके द्वारा देखे गए दृश्यों का वर्णन उन्हें उपयोगी बताते हुए, रूपरेखा को अधिक गतिशील बनाना चाहिए जिससे पाठक के लिए वह कहानी नूतन, ऊर्जावान तथा अधिक आकर्षक दिखे।
6
अपनी कहानी लिखते समय ऐसी परिस्थितियां निर्मित करें जिनसे मुख्य पात्र को अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलना पड़े - जब किसी भी कहानी में इस प्रकार की परिस्थितियों का निर्माण होता है तब वह कहानी पाठक के लिए और अधिक रोचक बन जाती है क्योंकि ये परिस्थितियां पात्र के छिपे हुए गुणों को सामने ला सकती हैं जिन्हें समझाने की अपेक्षा कथनात्मक दृश्य अथवा कथनात्मक चलचित्र के माध्यम से सरलता से व्यक्त किया जा सकता है। जैसे रामायण में राम राज्याभिषेक के समय राज्य से 14 वर्ष का वनवास और राज्य भी किसी और को दे देना। 
7
कहानी का समापन ध्यान से चुनें- कहानी के समापन को कुछ इस प्रकार चुना जाना चाहिए जिससे वह समापन की शीघ्रता या लेखक की हड़बड़ी न लगे और पाठक वर्ग के अंतः करण को झकझोर दे तथा अपनी विशेष छाप छोड़े। अधिकतर सभी आकर्षक कहानियों का समापन एक भावनात्मक प्रतिक्रिया को उकसाते हुए आह वाह के क्षण से भरा हुआ होता है। इसलिए समापन बेढंगा अथवा कहानी से पृथक नहीं होना चाहिए।



कहानी लेखन में मुख्य सावधानी इस प्रकार से अवश्य रखें ...

क) सबसे पहले व्याकरण को ध्यान में रखें।
ख) सदैव छोटे और स्पष्ट शब्दों में ही लिखें।
ग) कहानी में नाटक, घटना, कथन आकर्षक होने चाहिए। 
घ) कहानी लिखते समय कभी भी क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

कहानी ऐसी होनी चाहिए 

कुल मिलाकर स्मरण योग्य कहानी ऐसी होनी चाहिए जैसे विष्णु शर्मा की पंचतंत्र की कहानी आज भी सभी को स्मरण है। विभिन्न प्राणियों की जीवनी और दृष्टांतों के माध्यम से पंचतंत्र द्वारा बालकों को दिए जाने वाले नैतिक शिक्षा ज्ञान का अनूठा कहानी संग्रह है 
इसी क्रम में भोज का राज सिंहासन विक्रमादित्य को मिला तो 32 शापित अप्सराओं की कहानी आज भी आकर्षण का विषय हैं। जिसके मुख्य लेखक कालीदास हुए हैं। जबकि इतिहासकारों द्वारा ढूंढी गई एक और पांडुलिपि में लेखक का नाम वररुचि लिखा है। इसी पुस्तक के जैन संस्करण के रचियता सिद्धसेन दिवाकर और क्षेमंकर मुनि हुए हैं।
अकबर-बीरबल और तेनाली राम की कहानियों का उद्देश्य मानव समाज को बौद्धिक एवं वैचारिक स्तर पर नव चेतना प्रवाहित करना रहा है ऐसे में लेखकों द्वारा अपने पात्रों को समस्या देकर उसके उचित समाधान के साथ समापन किया गया है। दशकों अथवा वर्षों पूर्व पढ़ी गई ये कहानियाँ आज भी पाठक वर्ग के मस्तिष्क पटल पर अपनी ताजगी इस प्रकार से स्थापित किए हुए हैं मानों पुस्तक अभी पढ़कर चाय की चुस्कियों के लिए विश्राम लिया हो।

किशोर अवस्था तक पहुंचते- पहुंचते वास्तविकता का भान पाठक के मन को  मुंशी प्रेमचंद, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, भीष्म साहनी, सुदर्शन, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, फणीश्वरनाथ रेणु, उषा प्रियंवदा, मन्नु भंडारी, ज्ञानरंजन, उदय प्रकाश, ओमप्रकाश बाल्मिकी आदि हिंदी कहानी कारों की कहानियों से जोड़ जाता है जो उसे समाज की वास्तविकता से परिचय कराती हैं। यह संसार काल्पनिक होकर भी काल्पनिक नही लगता क्योंकि प्रत्येक चरित्र समाज के किसी ना किसी वर्ग की परछाई है। बचपन हो या बुढ़ापा मनुष्य कभी भी कहानियों से पृथक नही रह सकता शायद इस लिए क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक कहानी ही तो है जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाती है।



कहानियों के मुख्य प्रकार से परिचय
1
लोककथाओं में परीकथाएँ बहु प्रचलित रही हैं इन कहानियों के पात्र जादुई क्षमता के होते हैं जैसे परी, बौने, बौनों का टापू आदि
2
किंवदंतियाँ कहानी इनमें ऐतिहासिक घटनाएं होती हैं, जो ऐतिहासिक साक्ष्यों से दूर की कही जाती हैं इन कहानियों के सुर असुर मुख्य पात्र होते हैं जैसे समुद्र मंथन 
3
मिथक किंवदंतियाँ ये देवताओं या नायकों के विषय में होती हैं। इन कहानियों में उत्पत्ति के विषय में पता चलता है जैसे कि पर्वत कैसे बने ? वर्षा कैसे होती है ? आदि आदि। मिथक कहानी में आम तौर पर सिखाने के लिए नैतिक शिक्षा होती है। 
4
ऐतिहासिक कथा साहित्य एक प्रकार का उपन्यास है जो वास्तविक घटनाओं पर आधारित होता है
5
विज्ञान कथा उपन्यास ऐसी कहानियाँ हैं इनमें एलियंस या रोबोट शामिल हो सकते हैं, विज्ञान की कहानी निकट भविष्य को समझाने का प्रयास करती हैं।
6
जासूसी कहानियों में एक जासूस द्वारा उलझी हुई गुत्थी सुलझाई जाती है। पाठक वर्ग इस  जासूस के साथ रहस्य को सुलझाने हेतु इन कहानियों को बड़े ध्यान से मन लगा कर पढ़ता है।

– संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, December 23, 2022

गीत : युग वंदन श्री राम को : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत
युग वंदन श्री राम को
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी - 16/13

कष्ट निकंदन खलदल गंजन 
रघु नंदन श्री राम को।
कोटि कोटि यूँ नमन करे नित 
युग वंदन श्री राम को।।

भक्ति करें उर बोल-बोल के
राम नाम ही सार है।
भाव बूंद दृग द्रवित अगर हो
बने यही आधार है।
कर्म जड़ित हरसी पर घिसके 
दे चंदन श्री राम को।।

श्रेष्ठ तपस्या योग साधना 
नीलकंठ भी धारते।
पद्माकर का चक्र बताता
अजपाजप उच्चारते।
राम-नाम से अनहद महके
दे गंधन श्री राम को।।

अष्ट खण्ड यूँ दसों दिशा के
स्वामी वे हर लोक के।
उनका जम्बू द्वीप निरन्तर 
तर्क प्रमाणित ठोक के।
नित्य सनातन विश्व मानता
हिय बंधन श्री राम को।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, December 13, 2022

आदियोगी : संजय कौशिक 'विज्ञात' : मापनी ~21/21



आदियोगी
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी ~21/21

सौर मण्डल में चमकते सूर्य अगणित
उष्ण ऊर्जा दह रहे हैं आदि योगी।
चन्द्र सा शीतल किया अम्बर धरा को
धार बन कर बह रहे हैं आदि योगी।।

ज्ञान के विज्ञान का दे रूप अनुपम।
तेज उज्जवलमय तथा उत्तम निरुपम।।
अनुकरण कर सुषम्ना का श्रेष्ठ अद्भुत।
योगियों का है सनातन योग अच्युत।।
नाद अनहद ॐ बन अन्तस् समाये।
वाद्य सुर बन कह रहे हैं आदि योगी।।

केंद्र आज्ञा चक्र स्थावर और जंगम।
मौन पद्मासन हुए योगी विहंगम।।
सप्त तन के भेद करते से प्रमाणित।
एक आत्मा ही रहे कहते सदा नित।।
सृष्टि के इस कष्ट का हर काल कहता।
नित हृदय में रह रहे हैं आदि योगी।।

भाव व्याख्या सूक्ष्म विस्तृत के विचारक।
शब्द संज्ञा व्याकरण के एक कारक।।
गूढ़ से हर वेद शास्त्रों के प्रणेता।
बन विषय नित इंद्रियों को हर्ष देता।।
पंच तत्वों का स्वयं ये सार बोले।
दाह विष की सह रहे हैं आदि योगी।।

नित महामुद्रा महाबंधी हठीले।
खेचरी मुद्रा महावेधी सजीले।।
यूँ सदा हठ योगियों का योग ख़िलता।
ध्यान के अंतःकरण में नेह मिलता।।
खिलखिलाकर चित्त हँसते की तरंगें।
बोल उठती यह रहे हैं आदियोगी।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'


Thursday, December 8, 2022

नवगीत ; विरहन ; संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत
विरहन
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मुखडा - 14/9
अन्तरा - 14/14

यामिनी को मौन कुछ यूँ 
कर गई विरहन।
एक बाती सी बुझी जब
मर गई विरहन।।

उस तिमिर की आस झूठी 
सो गए खद्योत सारे
बादलों की आड़ लेकर
ओट में बैठे सितारे
मौन अवगुंठन दहकता 
भर गई विरहन।।

व्याप्त चहुँदिश सनसनाहट
वेदना की तान लहरें
वो मल्हारी नेत्र बरसे
शुष्क थी पर कोर नहरें 
पतझड़ी बहकर बयारी 
झर गई विरहन।।

द्वैत की जलती कथा का 
सार विरही उर तड़पता
आहटों का शोर गूँजे 
शांति को जो नित हड़पता
घूम कर पगडंडियों पर 
घर गई विरहन।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात' 


Friday, November 25, 2022

मेंहदी-महावर संजय कौशिक 'विज्ञात'


कविता / गीत
मेंहदी-महावर
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी ~ 16/16

मेंहदी रचाती जब सजनी
देख महावर करे प्रतीक्षा
राग विराग हृदय की तड़पन
करे परीक्षण दृष्टि तिरीक्षा।।

बिंदी की आभा विचलनमय
अंगारों सी जगी तितिक्षा 
फेरों की वे स्मृतियाँ उलझी
विस्मृति पाकर बहकी इक्षा
विरहन जैसी ज्वाला दहकी
विरह मिलन की करे समीक्षा 

करुण व्यथित सा नेत्र द्रवित कर
आहत उर की भूला रक्षा
कंगन की खनखन सूनी सी
सूनी पगडंडी ने भक्षा
व्याकुल अंतः करण प्रताड़ित 
हिय स्पंदन जब चली परीक्षा।।

नील कुरिंजी पुष्प सुगंधित 
देता सा गजरे को शिक्षा 
काल कुसुम स्थिर उर का खिलना
हर्षित क्षण की भूले भिक्षा
ठहर देखती व्याप्त वेदना
चंद्र-चकोरी प्राप्त निरीक्षा।।


©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, September 18, 2022

गीत : हिन्दी को सम्मान मिला : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
हिन्दी को सम्मान मिला
संजय कौशिक 'विज्ञात'

देवनागरी की स्तुति करके
हिन्दी को वरदान मिला
संस्कृत का कुल उत्तम वर्णित
हिन्दी को सम्मान मिला।।

स्वर व्यंजन का मेल मिला तब
शब्दों ने ली अँगड़ाई
बना व्याकरण मात्रा खिलती
भावों की यह चतुराई
मुकुट चंद्र बिंदी का धरके
वर्णों को अभिमान मिला।।

करे हलन्त वर्ण को आधा
शब्दों में उत्साह भरे
कर पग वंदन बैठ साथ में
कुछ के सिर पर राज करे
व्यर्थ नहीं है आधा भी कुछ 
उसको गौरव गान मिला।।

अनुस्वार का मार्ग नासिका
लघु भी गुरु हो जाते हैं 
यही श्वास मुख मण्डल विचरे
पृथक वर्ग कहलाते हैं
तीन मिलेंगे अंत खड़े जो 
उनको कुछ व्यवधान मिला।।

गुण विसर्ग का अनुस्वार सा
लघु गुरु हों नित संगत से
नहीं किसी को छोटा समझो
ज्ञान वर्ण दे इस रंगत से
वैज्ञानिक भी शोध करें अब 
उत्तम ये विज्ञान मिला।।

कण्ठ तालु मूर्द्धा उच्चारण 
दन्त ओष्ठ का बोल कहा
कण्ठतालु कण्ठोष्ठय फिर यूँ
दन्तोष्ठ्य भी खोल कहा
मुख मण्डल से वर्ण निकलते
योग्य इन्हें ये स्थान मिला।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, August 28, 2022

नवधा भक्ति के प्रकार, रूप, एवं उदाहरण : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवधा भक्ति के प्रकार, रूप, एवं उदाहरण

गत कई दिनों से पूछा जा रहा था नवधा भक्ति का क्या अर्थ है इसके रूप कैसे हैं और इनको करने वाले भक्तों के नाम आदि भी जिज्ञासा प्रकट रूप से मेरे समक्ष आई थी तो आज मैं नवधा भक्ति के साथ उपस्थित हुआ हूँ।
वैसे तो नवधा भक्ति को हम इस श्लोक के माध्यम से समझ सकते हैं। कुछ सरलता के उद्देश्य से मैंने कुछ दोहे कहे हैं देखिये और समझिए ये प्रयास सरलता से कहाँ तक स्पष्ट हो सका ..... 
श्लोक :-
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

दोहे :-

भक्ति मार्ग प्रत्यक्ष कब, कहते इसे परोक्ष।
ध्यान धरे साधक अगर, भक्ति भुक्ति दे मोक्ष।।

करता नवधा भक्ति जो, पा लेता है लक्ष्य।
लख चौरासी योनियाँ, तत्क्षण होती भक्ष्य।।

श्रवण भेद नवधा प्रथम, कथा भक्त की प्यास।
श्रवण परीक्षित ने किया, पूर्ण हुई फिर आस।।

कीर्तन भेद द्वितीय है, इसमें स्तुति का गान।
नाम सुना शुकदेव जी, कीर्तन की पहचान।।

रखते 'स्मरण' तृतीय पर, नित्य स्मरण कर शक्ति।
यूँ बालक प्रह्लाद के, हृदय जगी थी भक्ति।।

भक्ति पादसेवन कही, यह चतुर्थ है रूप।
जैसे लक्ष्मी ने किया, पाया स्थान अनूप।।

अर्चन पंचम भेद है, कर्म वचन मन साध।
राजा पृथु ने ज्यों किया, अर्चन नित निर्बाध।।

वंदन षष्ठम भेद है, करना नित्य प्रणाम।
सेवक बन अक्रूर ज्यूँ, नमन करे निष्काम।।

दास्य भक्ति सप्तम कही, बन स्वामी का दास।
राम भक्ति हनुमान की, करती हृदय उजास।।

सख्य भेद अष्टम कहा, समझ ईश को मित्र।
पार्थ सुदामा द्रोपदी, सख्य सुगंधित इत्र।।

आत्मनिवेदन है नवम, भक्ति भाव का रूप।
जैसे राजा बलि हुए, आत्मनिवेदित भूप।।

मीरा के प्रेमी बने, कृष्णचन्द्र घनश्याम।
साध्य कहें निज प्रेमिका, अड़े सँवारे काम।।

शबरी के आतिथ्य से, हर्षे राम प्रचण्ड।
खाये जूठे बेर ज्यूँ, वो था भाव अखण्ड।।

भक्ति कही है भाव की, भावों का उद्योग।
योग साधना है पृथक, और पृथक हठयोग।।

इस नवधा से भी पृथक, हुए करोड़ों भक्त।
जिसकी जैसी भावना, वैसे देव सशक्त।।

मुक्त हुए वसुदेव जब, सांकल ताले तोड़।
पुत्र रूप भगवान का, ये था अद्भुत जोड़।।

गंगा से पावन कही, भक्त अश्रु की बूँद।
भजता है जो भाव से, अपनी आँखें मूँद।।

सुमरण खा जीवन चले, विद्या पी विद्वान।
भक्ति में खोकर मिले, भक्तों को भगवान।।

कोमल तथा सशक्त से, रहें भक्त के भाव।
केवट चरण पखारके, पार लगाते नाव।

नवधा भक्ति से खुले, विषय मुक्ति का द्वार।
प्रभु के सुमिरन के बिना, नही जीव उद्धार।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, August 24, 2022

रुद्राक्ष के प्रकार, लाभ, सावधानी एवं मंत्र : संजय कौशिक 'विज्ञात'


*रुद्राक्ष के प्रकार, लाभ, सावधानी और मंत्र*

एक मुखी रुद्राक्ष के, देव रुद्र भगवान।
सिंह राशि ग्रह सूर्य से, मिले दिव्य वरदान।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं नम: ।।

दो मुख जिस रुद्राक्ष के, ग्रहण करो दे शांति।
करें कृपा जब शिवशिवा, कर्क चंद्र दे कांति।।
मंत्र- ।। ॐ नम: ।।

तीन मुखी रुद्राक्ष से, मंगल पीड़ा अंत।
अग्नि देव रक्षा करें, धारण करते संत।।
मंत्र- ।। ॐ क्लीं नम: ।।

चार मुखी रुद्राक्ष से, दें बुध कृपा अपार।
मिले शक्ति ब्रह्मा कहें, लिखता रचनाकार।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं नम: ।।

पाँच मुखी रुद्राक्ष नित, दे आध्यात्मिक शक्ति।
देव बृहस्पति की कृपा, जन करता गुरु भक्ति।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं नम: ।।

छह मुख का रुद्राक्ष तो, भरे बुद्धि भण्डार।
कार्तिकेय भगवान का, शुक्र तुला आधार।।
मंत्र : ।। ॐ ह्रीं हूं नम:।।

सात मुखी रुद्राक्ष से, मिटते आर्थिक दोष।
माँ लक्ष्मी की हो कृपा, शांत वक्र शनि रोष।।
मंत्र- ।। ॐ हूं नम:।।

आठ मुखी रुद्राक्ष से, हो हर बाधा दूर।
गजमुख करते हैं कृपा, राहु न देखे घूर।।
मंत्र- ।। ॐ हूं नम:।।

नौ मुख का रुद्राक्ष यूँ, करे शक्ति संचार।
माँ दुर्गा रक्षक बने, केतु करे उद्धार।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं हूं नम:।।

दस मुख का रुद्राक्ष ये, हरे वास्तु के दोष।
देव विष्णु रक्षा करें, शांत सभी ग्रह रोष।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं नम: ।।

एकादश रुद्राक्ष मुख, बढ़े आत्मविश्वास।
मंगल से हनुमान जी, करें व्याधि का ह्रास।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं हूं नम:।।

द्वादश मुख रुद्राक्ष के, करें सफल हर कार्य।
हर्षित रहते सूर्य तब, करें इसे जब धार्य।।
मंत्र- ।। ॐ रों शों नम: ऊं नम:।।

तेरह मुख रुद्राक्ष है, आकर्षण का केंद्र।
तुला वृषभ के शुक्र भी, हर्षित देव महेंद्र।।
मंत्र- ।। ॐ ह्रीं नम:।।

चौदह मुख रुद्राक्ष दे, षष्ठम इंद्री ज्ञान।
मकर कुम्भ शनि कंठ है, पहनें शिव भगवान।।
मंत्र- ।। ॐ नम:।।

ये रुद्राक्ष गणेश का, गजमुख इसका रूप।
मिटे अशुभता केतु की, धारण करते भूप।।
मंत्र- ।। ॐ श्री गणेशाय नम:।।

गौरी शंकर नाम का, पहनें जो रुद्राक्ष।
वैवाहिक बाधा सभी, हरे चंद्र चित्राक्ष।।
मंत्र- ।। ॐ गौरी शंकराय नम:।।

रुद्राक्षों में श्रेष्ठ है, श्वेत रंग रुद्राक्ष।
रंगों का भी भेद ये, सुनो उन्हीं के साक्ष।।

ताम्र रंग मध्यम कहा, मध्यम से कम पीत।
श्याम रंग कम पीत से, ये मनकों की रीत।।

माला जप रुद्राक्ष का, देता मुक्ति त्रिताप।
कंठ अगर धारण किया, हर लेता सब पाप।।

अक्षमालिका उपनिषद्, कहते शंख प्रवाल।
स्वर्ण रजत रुद्राक्ष से, मध्यम चंदन माल।।

रक्तचाप मधुमेह को, हर लेता रुद्राक्ष।
मानव तन चुम्बक दिखे, तन विद्युत दे साक्ष।।

धारण कर रुद्राक्ष को, करना मत ये कार्य।
जाना नहीं श्मशान में, कान खोल सुन आर्य।।

भोजन मत कर तामसिक, मद्यपान दे त्याग। 
अगर कंठ रुद्राक्ष है, बजा शुद्ध ही राग।।

शयन काल में मत पहन, कंठ कभी रुद्राक्ष।
स्नान ध्यान कर शुद्ध हो, पहन तभी ये आक्ष।।

पहनो मत रुद्राक्ष को, जन्मे जब नवजात।
स्थान वहाँ का त्याग दो, दिन हो चाहे रात।।

माला धारण कर विषम, एक तीन या पाँच।
सम संख्या देंगी जला, समझ भयंकर आँच।।

देना मत उपहार में, पहना जो रुद्राक्ष।
शक्ति तुहारे गात की, उपनिषदों के साक्ष।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, August 21, 2022

रुद्राक्ष : संजय कौशिक 'विज्ञात'


रुद्राक्ष 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

ग्रीवा में बत्तीस हों, गिन मनके रुद्राक्ष।
हरता रक्त विकार ये, रोग रहित ताम्राक्ष।।

मनके सत्ताईस गिन, कंठ पहन रुद्राक्ष।
हरता देह विकार यूँ, गूँजे ज्यूँ ताम्राक्ष।।

लौह तत्व रुद्राक्ष में, जाए जल में डूब।
लकड़ी तिरती है सदा, भले देखलो दूब।।

मंत्र जाप रुद्राक्ष से, देता सिद्धि अनेक।
करते जो गुरुमंत्र जप, रखे सभी की टेक।।

सच्चा है रुद्राक्ष वो, नैसर्गिक हों छिद्र।
धारण करने मात्र से, मिटता योग दरिद्र।।

माला हो या गोमुखी, शुद्ध सदा रुद्राक्ष।
धरणी पर मत गेरना, दिखे न पग चित्राक्ष।।

जपमाला रख गोमुखी, कंठ कभी मत धार।
शिव का ये वरदान है, कर हिय से सत्कार।।

शिव के आँसूं से बना, पावन फल रुद्राक्ष।
निराकार आकार ले, स्वयं दे रहे साक्ष।।

रोग मिटें रुद्राक्ष से, मृत्युञ्जय का मंत्र।
शुक्राचार्य महर्षि का, प्रतिपादित ये तंत्र।।

मन में नित शुभता भरे, सिद्ध बनें संकल्प।
पहनें जो रुद्राक्ष को, बने न चिंता अल्प।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, August 10, 2022

गीतिका : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीतिका 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी - 2122 2122 2122 2122

इन दिनों में मित्र का व्यवहार ऐसे हो रहा है।
सर्प की फुंकार सा उद्गार ऐसे हो रहा है।।

बिन तराजू तोल देते मित्र तज बंधन पुराना।
ब्याज खाते मूल बिन व्यापार ऐसे हो रहा है।।

टोपियों का खेल खेलें एक दूजे को चढ़ाकर।
मित्र ले माला पहन जयकार ऐसे हो रहा है।।

अब यहाँ पत्थर तिराकर बाँधते हैं सेतु कितने।
मित्र लुटिया दें डुबो उद्धार ऐसे हो रहा है।।

कौन वे बूंटी मँगाते प्राण रक्षा के लिए अब।
अब सखा विष दें पिला उपचार ऐसे हो रहा है।।

वो यहाँ पर कौन है जो पाँव धोकर जल पिये अब।
मित्र चुभता शूल सा परिवार ऐसे हो रहा है।।

आज यूँ विज्ञात ये पांडित्य फीका दे दिखाई।
मित्र बिन संसार का विस्तार ऐसे हो रहा है।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, July 30, 2022

नवगीत : खिल उठी रूखी कलाई : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
खिल उठी रूखी कलाई 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी 14/14 

श्रावणी की दिव्यता ले
खिल उठी रूखी कलाई
यूँ बहन की साधना पर
हर्ष फिर बाँटे बधाई।।

इन क्षणों के राग अनुपम 
रागनी उनसे निराली
ताल थिरके मिल सुरों में
वाह लूटे ढेर ताली
नेह की किरणें चमकती
थालियों ने जब सजाई।।

सूत्र का विश्वास बढ़कर
छा गया अंतःकरण में
नेह बहनों का कवच ये
सौरमण्डल के चरण में
बन सुरक्षित बंध उत्तम 
नित महक मीठी जगाई।।

एक औषध है यही वो
कष्ट की घड़ियाँ मिटाती
पारलौकिक प्रेम बंधन 
जो हृदय से नित निभाती
राखियों का रंग चहके
पर्व की शुभता बताई।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, July 29, 2022

तुकांत शब्द की परिभाषा, प्रकार एवं उदाहरण : संजय कौशिक 'विज्ञात'



तुकांत शब्द की परिभाषा, 
प्रकार एवं उदाहरण
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

छंद अथवा कविता के अंत में समान वर्णों के या शब्दों के अंत पर उच्चारित होने वाले वर्णों या शब्दों की उपस्थिति को तुकांत कहा जाता है।
ये तुकांत मुख्यतया 3 प्रकार के होते हैं 
उत्तम तुकांत 
मध्यम तुकांत 
निम्न तुकांत 
सूचना :- परंतु आजकल एक और तुकांत देखा जाता है जो अन्य भाषाओं में लिखा जाता परंतु हिंदी व्याकरण के अनुसार यह स्वीकार्य नहीं है।
4 अति निम्न तुकांत

उत्तम तुकांत- अटकते, खटकते, चटकते, पटकते, गटकते, लटकते आदि कुछ और देखें जाइए, आइए, गाइए, खाइए, पाइए इत्यादि 
जिन तुकांत में समान मात्रा भार तथा उच्चारण में समान ध्वनि हो जो श्रोता वर्ग को अपने आकर्षण पाश में बांधकर मंत्र मुग्ध करते प्रतीत होते हैं। इनका मुख्य स्वरूप समता का स्वरूप पहचान में रखें। इस प्रकार के तुकांत सदैव उत्तम तुकांत कहे जाते हैं तथा हिन्दी व्याकरण के अनुसार ये तुकांत स्वीकृत हैं। 

मध्यम तुकांत- व्यथा, कथा, प्रथा, व्यवस्था आदि मध्यम प्रकार के तुकांत है इस प्रकार के तुकांत भी हिंदी व्याकरण की स्वीकृति नहीं है परंतु कुछ विशेष स्तर पा चुके साहित्यकारों ने इन्हें हिंदी भाषा में प्रयोग करने की स्वीकृति दी है। उसके पश्चात इस प्रकार के तुकांत देखने में आने लगे हैं आँगन, सावन, तड़पन, छनछन, अनबन इत्यादि मध्यम स्तर के तुकांत हैं।
 हार प्यार मध्यम हार व्यवहार निम्न हार सार उत्तम इस प्रकार से तुकांत के प्रयोग में सावधानी रखनी होगी । 
 
निम्न तुकांत - वियोग, सुयोग, आयोग, प्रयोग, उपयोग इत्यादि इस प्रकार के तुकांत में दो वर्ण समान चलते हैं परंतु तृतीय या चतुर्थ वर्ण के उच्चारण बिल्कुल पृथक हो जाते हैं कहीं इ स्वर है कहीं अ स्वर है कहीं उ स्वर है इस प्रकार के तुकांत हिंदी व्याकरण ने कभी स्वीकृत नहीं किए हैं। 

अति निम्न तुकांत- आज धार आप नाथ सास जाप पाप सांप चाल काट छांट 
इस प्रकार के तुकांत अतिनिम्न तुकांत कहे जाते हैं जो हिंदी व्याकरण के अनुसार अतुकांत ही होते हैं 

इन सबसे हट कर एक तुकांत और प्रचनलन में देखा गया है परंतु हिंदी भाषा ने उसे स्वीकार नहीं किया है अंतिम शब्द की कवि अपनी इच्छा से मात्रा घटाए या बढ़ाए 
जैसे 
आप पाप को चौपाई के अंत में आपा पापा करना या  दोहा सृजन के समय आये गाये को आय गाय करना 
इस प्रकार के तुकांत हिंदी व्याकरण द्वारा अस्वीकृत हैं। 


तुकांत के लाभ/हानि पर मंथन 
1 उत्तम तुकांत के प्रयोग से जहाँ रचनाकर की सतर्कता परिलक्षित होती है। वहीं मध्यम या निम्न स्तर के तुकांत प्रयोग से रचनाकर ढीला ढाला सा दिखता है 
2 पाठक या श्रोता को उत्तम तुकांत आकर्षित करते हैं वहीं मध्यम या निम्न तुकांत नीरस से प्रतीत होते हैं। 
3 कई बार अच्छा तुकांत ही पंक्ति का स्मरण करवा देता है वह कंठस्थ रह जाती है जबकि मध्यम या निम्न तुकांत से ऐसा कभी नहीं हो सकता। 
4 कई बार कविता जो छंदबद्ध नहीं है परंतु उत्तम तुकांत से युक्त है तो वह अपने आकर्षण पाश में श्रोता अथवा पाठक को बांधने में सफल सिद्ध होती है जबकि मध्यम तुकांत तथा निम्न तुकांत के साथ ऐसा होने की संभावना न के बराबर होती है। 
5 उत्तम तुकांत के चयन से विचार बंधे हुए तथा जमे हुए झलकते हैं वहीं मध्यम तुकांत में भावों के बिखराव की संभावना अधिक बलवती होती है। 
6 उत्तम तुकांत उत्तम रचना की और संकेत करता है तो मध्यम तुकांत और निम्न तुकांत अपने स्तर पर ले आएगा रचना को ऐसा कहें तो यह भी तर्क संगत ही होगा।

एक मंथन आपका ..... 
अच्छा पकवान दूध और चावल के मिश्रण से शुद्ध खीर बनती है चावल दाल और पानी के मिश्रण से खिचड़ी बनती है एक बात का और ध्यान रखिए खीर पकवान कहा जाता जबकि खिचड़ी रोगियों का भोज्य पदार्थ 
आप अपना स्तर तथा अपने सृजन का स्तर अपने विवेक से स्वयं निर्धारित करें। जिसे पढ़ रहे हैं उसके साथ ऐसा भी हो सकता है कि या तो वह स्वयं रोगी है या रोगियों के लिए खिचड़ी निर्मित कर रहा हो ..... 
ऐसे में आप को क्या करना चाहिए आप स्वयं विवेकशील प्राणी हैं मंथन करने में सक्षम भी हैं।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, July 26, 2022

गीतिका लिखना सरल है : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीतिका लिखना सरल है।
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी - 2122 2122 2122 212

गीतिका में छंद वार्णिक मापनी आधार हो।
शुद्ध सार्थक से कथन का भावमय आभार हो।।

कुछ अधूरा सा कथन कहना नहीं है पंक्ति में।
जब कथन हो स्पष्ट निखरे युग्म वो स्वीकार हो।।

दीर्घ लघु के वर्ण सारे रख चलो गिन गालगा।
शिल्प की ये ही कसौटी ध्यान ये हरबार हो।।

भाव यूँ ढलता दिखे आभूषणों की ज्यूँ ढलाई।
यूँ अलंकृत रस टपकता युग्म का शृंगार हो।

व्याकरण आदेश दे अनुपालना हो शिल्प की।
पंक्ति बस दो ही दिखें पर कुछ गहनमय सार हो।।

शीघ्रता की हड़बड़ी से नित खड़ी हों गड़बड़ी।
भाव मंथन के बिना कब कथ्य का परिहार हो।।

जानते पर कर रहे साधक मिलावट शब्द की।
शुद्ध भाषा से सदा साहित्य का उद्धार हो।

गीतिका लिखना सरल है और आकर्षक दिखे।
फिर जड़ाऊ युग्म खींचे मंच से उच्चार हो।।

दे चमक तुकांत उत्तम गीतिका विज्ञात की।
मोहिनी सी काव्य धारा मोड़ ले तैयार हो।।

संजय कौशिक 'विज्ञात' 

Sunday, June 19, 2022

अग्निपथ के अग्निवीर : संजय कौशिक विज्ञात



*अग्निपथ / अग्निवीर* 
*आग या ज्वालमुखी*

लाल बहादुर आकर देखो, भारत लालम लाल हुआ।
जय जवान फिर जय किसान का, आज प्रशासन काल हुआ।।
1
नित्य जवान किसान युवा की, सत्ता पक्ष परीक्षा ले।
लोकतन्त्र मतदान दिलाता, याद नहीं अब दीक्षा ले।।
शासक मद मतवाला होकर, भूल गया सब भिक्षा ले।
आर्यव्रत की करता बातें, न्याय किया कब शिक्षा ले।।
श्रेष्ठ धर्म का रक्षक बनकर, मिथ्या एक दलाल हुआ।
जय जवान फिर जय किसान का, आज प्रशासन काल हुआ।।
2
धर्म कर्म का अंधा शासन, शोर कराना आता है।
हुआ समाज अनिश्चित अस्थिर, इन्हें बनाना आता है।।
महँगाई भी लगे निरंकुश, मूल्य बढ़ाना आता है।
सरकारी सब बेच कम्पनी, कार्य छिपाना आता है।।
सब सौगंध शपथ भूला है, देख समाज निढाल हुआ।
जय जवान फिर जय किसान का, आज प्रशासन काल हुआ।।
3
स्वप्न विश्वगुरु होगा भारत, ऊँचा सिर ये काटेगा।
जुमलेबाजी में ये शासक, थूक सदा ही चाटेगा।।
और कम्पनी राज अटल कर, दूध मलाई बाँटेगा।
मतदान समाप्त कराकर के, नूतन भारत छाँटेगा।।
चंद्र तथा मंगल का सपना, लाक्षागृह सा हाल हुआ।
जय जवान फिर जय किसान का, आज प्रशासन काल हुआ।।
4
मौन रही जो आज तूलिका, सबको ही फिर रोना है।
पाने को कुछ शेष नहीं है, पल-पल ही सब खोना है।।
भय का कट्टा भ्रम का बोरा, सिर पे धर के ढोना है।
एक अराजक पापी सत्ता, पापों को अब धोना है।।
अहम वहम से देश न चलते, बंद विकास उछाल हुआ।
जय जवान फिर जय किसान का, आज प्रशासन काल हुआ।।

5
संविधान का विजय तिलक ये, अगर योजना मोड़े तो।
कृषक योजना हार गई है, हाथ यहाँ भी जोड़े तो।।
क्षमा याचना करले बढ़कर, लज्जित होकर थोड़े तो।
अग्निवीर की स्नातक शिक्षा, जीवित इसको छोड़े तो।।
कृष्ण स्वयं वो बन बैठा है, युवा वर्ग गोपाल हुआ।

संजय कौशिक 'विज्ञात'