शीर्षक - देख गाँव ये...
डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'
स्थाई ✍️
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)
1 अंतरा ✍️
हाँक बैलगाड़ी मै बैठूँ,
चुपके से तुम्हे निहारूँ। (नायक)
मुरली बना अधर की मुझको,
अपनी हर खुशियाँ वारूँ (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
सुन धड़कन का प्रेम तराना
महक उठे हर एक कली। दोनों।
गाँव लगे जन्नत हो जैसे
तू जो मेरे साथ चली।। नायक।।
2 अंतरा ✍️
नील गगन ज्यों मिले धरा से
ऐसा हो मिलन हमारा।(नायिका)
आकर्षक अनुबंध प्रेम का
देखे हमको जग सारा। (नायक)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
मुझे छिपाना निज बाहों में
देख न पाए गाँव गली। (नायिका)
तुम्हे छिपाऊँ निज बाहों में
देख न पाए गाँव गली। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)
3 अंतरा ✍️
साँझ ढले घर लौट चलेंगे
चंदा जब राह दिखाए। (नायक)
हँसी अधर की उजली किरणें
मन का दीपक बन जाए।।(नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
हाथ थाम जीवन जी लेंगे
ठहरी घड़ियाँ लगें भली। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)
4 अंतिम बंध ✍️
आज गाँव में भ्रमण किया तो
मेरा ये संसार मिला। (नायक)
मांग महकती सिंदूरी सी
तू सच्चा श्रृंगार मिला।। (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
धन्य हुई साँसों की सरगम
धड़कन सुर में बैठ ढली।। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(दोनों)
डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'
सादर नमन गुरुदेव 🙏
ReplyDeleteबहुत ही खूबसूरत गीत। शृंगार रस में डूबी रचना ... आकर्षक कथन एवं शब्द चयन 💐
वाह बहुत सुंदर अनुकरणीय रचना
ReplyDeleteसादर नमन गुरुदेव 🙏🌹