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Sunday, March 15, 2026

गीतिका :- धर अधर पे ऊर्ध्व अपना / अनकही बातें बहुत सी डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’




गीतिका १

अनकही बातें बहुत सी
उन पलों की रह गई।
साँझ सिंदूरी सिसकती
स्मृति-सरस में बह गई।।
मंद मृदु मुस्कान मध्यम
मन–मुकुल में नाचती।
व्यंग्य साधे बाण बिन जो
मौन में वो कह गई।।
युग-युगों की याचना-सी
साधना में यामिनी।
याद याचक-सी युगों तक
यज्ञ-सी बन दह गई।।
आपदाएँ जब बिखरकर
मार्ग को दुर्गम करें।
पीर पर्वत-सी पिघलकर
चोट-सी नित सह गई।।
भावनाओं की तरंगें 
उठ रही शैवाल-सी।
चित्त को चट्टान करके
वो घृणा फिर ढह गई।।
नाद मुरली-सा खनकता
व्योम के कुछ स्वर सजाकर।
लिख रहा ‘विज्ञात’ कविता
राग बनकर यह गई।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’


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गीतिका २


धर अधर पे ऊर्ध्व अपना,
मौन जो होती नहीं।
स्वप्न में करती शिकायत,
जाग के सोती नहीं।।
ढूँढती है जो मुझे नित,
हार बैठी खीज में।
हास्य पर हँसती अदा कुछ,
व्यंजना रोती नहीं।।
श्वेत वर्णी ओढ़ आँचल,
झाँकती चुप नेत्र से।
यूँ छिपाए भाव अपने,
एक भी बोती नहीं।।
अप्सरा पानी भरे नित,
सुंदरी को देख के।
कुछ चुराकर दृष्टि मिलती,
जो हया खोती नहीं।।
सीखती हिमखण्ड से वह,
शैलपुत्री रूप में।
प्रेम की मूरत मृदुल सी,
सीप की मोती नहीं।।
जाग कर जागृति सिखाती,
मूँद बैठी जो पलक।
रीतियों की बन कसौटी,
व्यर्थ वो ढोती नहीं।।
६ 
प्रेम से ‘विज्ञात’ सीखे,
रीत का नूतन चलन।
प्रीत की कविता रचे जो,
हर कलम तोती नहीं।।

डॉ० संजय कौशिक ’विज्ञात’

5 comments:

  1. सादर नमन गुरुदेव 🙏
    बहुत ही सुंदर गीतिका 👌उत्तम सृजन की हार्दिक बधाई 💐

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  2. वाह बहुत सुंदर, अनुकरणीय रचना
    सादर नमन गुरुदेव 🙏🌹

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  3. बहुत सुंदर! अभिनव, अलंकृत सरस गीतिका आदरणीय हार्दिक बधाई 🌹

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  4. सादर नमन गुरुदेव 🙏🌹सुंदर सृजन हेतु हार्दिक बधाई🌹🌹

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