नवगीत
यूँ समर्पण झील का
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी ~14/12
सौर मण्डल भी पिपासित
यूँ समर्पण झील का
चांद आँचल से निहारे
देख दर्पण झील का।।
सूर्य की उन रश्मियों ने
सांध्य का वंदन किया
राज्य अपना वार के फिर
चंद्रमा को दे दिया
साँझ का शृंगार अद्भुत
प्रेम अर्पण झील का।।
भेंट में तारे सजाकर
थाल पूरा भर दिया
दिख रहे नक्षत्र मोहक
यूँ निशा को घर दिया
बिम्ब बन प्रतिबिम्ब महके
भाग्य सर्पण झील का।।
खोल अम्बर नेत्र देखे
दृश्य अनुपम वश्य का
शुक्लपक्षी मंत्रमुग्धी
चित्र वो परिदृश्य का
साधता है लक्ष्य अपने
दोष तर्पण झील का।।
संजय कौशिक 'विज्ञात'