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Tuesday, March 16, 2021

नवगीत : उज्ज्वल नेत्र : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
उज्ज्वल नेत्र 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14


साँवरे से नेत्र उज्ज्वल
गा रहे हैं गीत अनुपम 
उन पलक की धुन निराली 
नित बजे संगीत अनुपम।।

योग निद्राशील वीणा
लालिमा दे श्वेत अम्बर 
कुछ धूमिल से राग छेड़े
यूँ उड़ाकर रेत अम्बर 
थम पलक आलाप गुंजित
सरगमों की रीत अनुपम।।

ज्योति की लौ व्याप्त जग में
सप्त सुरमय ज्ञान बनकर
पुतलियों की छलनियों से
प्राप्त है ये गान छनकर 
इंद्र धनुषी सी छटामय
चित्र बतियाँ चीत अनुपम।।

ये नयन जल बूंद से ही 
सागरों को भी लजाते
पाश आकर्षण मयी ले
कोर को अंजन सजाते
कथ्य सम्मोहित मधुर से
सुन कहें सब जीत अनुपम।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : द्रोपदी सी व्यंजनाएँ : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
द्रोपदी सी व्यंजनाएँ
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

द्रोपदी सी व्यंजनाएँ
वर्जनाएं तोड़ सहमी
साक्ष्य मिथकों से खड़े जो
वो समर्पण जोड़ सहमी।।

केश कोमल पर्श उलझे
स्वप्न नींदों से जगाते
और वो अपनत्व लूटे
नित्य कुणबा जो लुभाते
वेदनाएं मर मिटी फिर
जो भरोसे छोड़ सहमी।।

प्राप्य दुष्कर साथ छूटे
जंगलों की खाक पाई
भूख की व्याकुल तड़पना
तब उदर ने भूख खाई
व्यंजनों को रोष ये था 
दिव्य भोजन मोड़ सहमी।

पंच रत्नों को लुटाया 
कोख रोती तिलमिलाई
जब गया अभिमन्यु प्यारा
आँख मरुथल ढूँढ लाई
भीम की सौगंध भी तो 
खप्परों को फोड़ सहमी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : ज्ञान का गुरुकुल : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
ज्ञान का गुरुकुल 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~ 14/14 

सूर्य शशि शिक्षित करें नित
दीप सबके हिय जलाकर
हर रहे अज्ञान का तम
ज्ञान का गुरुकुल बनाकर।।

सीख नूतन कर प्रसारित
नव्य सा आभास देते
संतुलित रखते धरा को
प्राणियों को वास देते
मेघ जल का शोध बनते
वाष्प से लें जल उड़ाकर।।

बन खड़ी है श्रेष्ठ शिक्षक 
ये प्रकृति दिन रात देकर 
शीलता गुण तरु प्रदाता
पत्थरों की घात लेकर 
वायु देती ज्ञान सुख-दुख
शीत लू दोनों चलाकर।।

केंद्र शिक्षा देख कर ये
पढ़ रहे हैं कौन अक्षर
गूँजते बहते चलें ये
तो कहीं पर मौन अक्षर 
और लहरों ने पढ़ाया
पढ़ रहे हैं नित सुधाकर।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : पत्थरों के पुष्प : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
पत्थरों के पुष्प 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

पुष्प बनकर पत्थरों ने
घाव पैरों को दिये हैं
रक्त सूखा पीर उगले
दाँव ही उल्टे जिये हैं।।

हर घड़ी ले सिसकियाँ अब
मोम जैसी हैं पिघलती
पाश नागिन से जकड़ कर
हर खुशी को हैं निगलती
विष नहीं तन पर चढ़ा है
पर सदा मूर्छित किये हैं।।

आंसुओं ने कष्ट रोये
पथ गले अवरुद्ध करके
वेग वो ठहरा नहीं यूँ 
बुध्दि तन को शुद्ध करके
पूर्ण थे संकल्प उसके
और ताजा भी लिये हैं।।

पुतलियों की तीव्र इच्छा
नेत्र अपने दोष पूछें
कोर किसने की प्रभावित 
और किसका रोष पूछें
आज मन को मारते से
पेय आँखों ने पिये हैं।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, November 12, 2020

नवगीत : देश की बिगड़ी दशा : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
देश की बिगड़ी दशा 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी  14/14 

व्यंजना भी रो रही है 
देश की बिगड़ी दशा पर
लेखनी फिर लिख रही है
मसि सुबकती सी कुशा पर।।

१
ये चलन कैसा हवा का 
गर्म झोंके फेंकती है
लू जलाती दिख रही है 
शाख पत्ते झोंकती है 
चांद की ये चाँदनी भी
शुष्क सी है आज ठहरी
हिय व्यथित से पीर सिसके 
टीस अन्तस् देख गहरी 
इक सुनामी दौड़ती है 
फोड़ती सी फिर दृशा पर।।

२
ये लहर कैसी उठी है
नित सुता चीत्कार गूँजी
ब्याज के लोभी सभी हैं
खो रहे अनमोल पूँजी
बेटियों को नोंचते हैं 
फेंकते है नालियों में 
निम्न पूजित सी दिखें अब
बेटियाँ नित गालियों में 
यूँ हृदय की वेदना भी 
बस सिसकती दुर्दशा पर।।

३ 
पल रहे कुत्ते घरों में 
धेनु आवारा पड़ी ये
और मैली देख गङ्गा
सोच चिंतन की घड़ी ये 
पर प्रशासन मौन धारे
मुख रहा कुछ फेर ऐसे 
जब करे मतदान जनता
फिर मरे क्यों कीट जैसे 
देख कर ये दृश्य जर्जर 
ज्योत भी रोती निशा पर।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, October 31, 2020

झांझरिया : संजय कौशिक विज्ञात

नवगीत
झांझरिया 
संजय कौशिक विज्ञात 

मापनी 16/14

शुष्क पात की झांझरिया ने 
शांत चित्त झकझोर दिया।।

उजड़े पन की टीस उठी कुछ
उपवन बहरे चिल्लाये
करुण क्रंदन करते करते
राग फूट कर घबराये

और रागनी भूली कोयल
जब सुनने का जोर दिया
शुष्क पात की झांझरिया ने 
शांत चित्त झकझोर दिया।।

शून्य समान बिता ये जीवन 
हलचल सारी भूला था
अतिक्रमण कष्टों का रहता
भूल श्वास दुख फूला था

रात अमावस की जब बीती
पूनम जैसा त्योर दिया।
शुष्क पात की झांझरिया ने 
शांत चित्त झकझोर दिया।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, October 16, 2020

भूखी शिक्षा ; संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
भूखी शिक्षा 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 8/10 

भूखी शिक्षा
बैठ गई पढ़ने।।

तख्ती सूखी
उसे याद घड़ियाँ
घड़ी कलम से
लिख बारह खड़ियाँ
खत जब नाचा
चाव लगा बढ़ने।।

उज्ज्वल शिक्षित
शिक्षा भी हर्षित
गाँव - गाँव में 
चर्चा में चर्चित
प्रथम रही है
अंक लगे चढ़ने।।

गर्व सोचता
ये क्षण हैं अपने
पूर्ण हुए सब
सच में ये सपने
देख हँसी फिर
शिक्षा निज गढ़ने।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'