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Thursday, May 26, 2022

गीतिका संजय कौशिक विज्ञात



*गीतिका*
मापनी - 21221 21222

पीर भी गीत फिर सुनाती है।
जब सिसक ताल सुर लगाती है।।

रात का घाव है अँधेरा ये
चाँदनी लेप से मिटाती है।।

शूल की नोंक रक्त से भीगी
पाँव की चोट को छिपाती है।।

नेत्र की धार यूँ बहे झरना
तोड़ के स्वप्न सा रुलाती है।।

चैन की चोट यूँ करे क्रंदन
चीख हरबार ये बढ़ाती है।।

ये व्यथित झूल यूँ पड़ी सूनी
याद की गोद फिर झुलाती है।।

कष्ट की मोच त्रस्त यूँ करती
पाँव को तोड़ जो चलाती है।।

टीस की रीस क्यों करे कौशिक
देख दिन रात जब जगाती है।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, May 18, 2022

हास्य रस. : गीतिका : संजय कौशिक 'विज्ञात'


हास्य रस
गीतिका 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

212 1222 212 1222

बात बात पे इटली रोज वो घुमाती है।
इक जहाज पानी का स्वप्न में उड़ाती है।।

एक रेल गाड़ी को देख कर मुझे बोली
मार मार सीटी ये क्यों मुझे बुलाती है।।

गाँव में बुलाया मैं फोन पे रिझाया मैं 
बैठ एक झोटे पे सैर वो कराती है।।

प्यार फेसबुक वाला पड़ गया मुझे भारी
डायना बनी डायन बस नकद उड़ाती है।।

चैट फेसबुक वाली जब पढ़ी जरा सी ही 
मार-मार के बेलन पीठ को सुजाती है।।

कर रही बहाने है माँगती नहीं इमली
और वो कहे बाबू फिर मुझे नचाती है।।

खेत में चलो कौशिक झट निकाल के नैनो
भागती चली बुग्गी गाल से चलाती है।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, May 14, 2022

हिन्दी गजल : सनातन चाय : संजय कौशिक 'विज्ञात'



हिन्दी गजल 
सनातन चाय 
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी 28/28


चाय का आनंद चुस्की मौन तो पानी भला है।
फिर अगर है मौन पीना पीर पी जिसने छला है।।

चाय पत्ती कष्ट वाली कुछ घृणा मीठा समझले
चुस्कियों पर चुस्कियाँ ले रोग ये भूलो बला है।।

क्रोध उबले जब निकलता दूध डालो शांति वाला
फिर उबाले पर उबाले नेह की ये भी कला है।।

देख ईर्ष्या मान छलनी छानती जो अवगुणों को
छान देती रस गुणी वो स्वाद बन अदरक चला है।।

मोह मोहक बन सुगंधित लौंग का ये फूल घुलकर 
जो द्विषा लालच बिखेरे सोच ये किनसे टला है।।

लोभ प्याली एक कुनबा टूट कर बिखरे कभी क्यों 
चाय पीते सब रहें बस लो पकौड़ा भी तला है।।

चुस्कियाँ विज्ञात लेता कर सनातन चाय निर्मित
द्वंद्व अन्तस् का विजेता इस जगत में नित फला है।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, March 3, 2022

गीत : लौट कर परदेस का सच : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
लौट कर परदेस का सच
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 14/14

लौट कर परदेस का सच 
यूँ तिरंगा बोलता है
प्राण का रक्षक प्रमाणित
भेद मुख हिय खोलता है।।

मर्म अधरों से खुला ये
एक संजीवन तिरंगा
वैद्य विद्यार्थी कहें अब
सार शिक्षा ज्ञान गंगा
विश्व गुरु भारत बिना अब
केंद्र धरणी डोलता है।।

शत्रुता के भाव मृत से
कर रहा ध्वज नेक छाया 
विश्व को कुनबा बनाकर
ध्वज दिखाता श्रेष्ठ माया 
शूल पथ के ये हटाकर 
नित पयोधर छोलता है।।

खंड विक्षत सा हृदय अब 
चाहता है लौट आये
और वंदे मातरम् के 
गीत फिर से गुनगुनाये 
पाक भारत में समाकर 
इक नया युग तोलता है।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, February 24, 2022

नवगीत : मीठा राग मल्हार : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
मीठा राग मल्हार 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी 
स्थाई/पूरक पंक्ति 12/11
अंतरा 12/12 

फाल्गुनी गाती फिरे 
मीठा राग मल्हार
यूँ अबीरी साँझ का
गूंजे आज प्रचार।।

पंखुड़ी भी पुष्प की
ठोकती है तालियाँ 
प्रीत की गाथा यही
बोलती हैं बालियाँ
यूँ बयारी नृत्य का
देखा नव्य प्रकार।।

मस्त नाचे ये धरा 
गीत के आभार पे 
अम्बरों ने पुष्प से 
बात बोली सार पे 
भीगते से गात में 
दौड़ा प्रेम प्रसार।।

रंग की बातें नई 
यूँ वधू के मध्य में 
हास्य गूँजे मोहिनी 
पाश बाँधे वृध्य में 
कौन ऐसे रोक ले
मारे देख प्रहार।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, January 25, 2022

गीत : अपना ये गणतंत्र पुकारे : संजय कौशिक 'विज्ञात'



गीत 
अपना ये गणतंत्र पुकारे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 16/14 

अपना ये गणतंत्र पुकारे
राष्ट्र सुरक्षित रखना है
नित्य खिले केसर क्यारी सा
सुगठित पुलकित रखना है।।

माली अपने मुखिया अपने
सेवक बन प्रण लेते हैं
निर्भय रखते जन-मन को जो
निर्भयता नित देते हैं 
पुष्प लदे ये प्रान्त सरीखे
बाग सुगंधित रखना है।।

बाँट चुके पंद्रह टुकड़े से
टुकड़े करना बंद करो
रोग मिटा कर अब मजहब का
शांत स्वभावी भाव भरो 
नेह बने बूटी संजीवन
इसको चर्चित रखना है।।

सोचो ये गणतंत्र सफल हो 
एक अमिट लिख दे गाथा
विश्व हुआ नतमस्तक टेके 
इसके चरणों में माथा 
श्रेष्ठ बना सब देखें भारत 
जग को विस्मित रखना है।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, January 2, 2022

नवगीत : मुस्कुराते गीत मेरे : संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत 
मुस्कुराते गीत मेरे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

पंक्तियों से छंद झरते 
मुस्कुराते गीत मेरे 
एक बासंती लहर बन
नित थिरकते मीत मेरे।।

इक कमल दल से हृदय को
जब विरह यूँ तोड़ बैठे
तब सुगंधित पल बिखरते
स्मृति उसी की जोड़ बैठे
कुछ मचलते गुनगुनाते 
ये अधर नवनीत मेरे।।

सप्त वारों ने सुनाए 
कष्ट नव रस के उमड़ते
ऋतु छहों से व्यंजना के 
भाव कुछ जम के उखड़ते
फाल्गुनी से कुछ सँवरते
स्वप्न पकते पीत मेरे।।

गूढ़ शब्दों सी कथा ने
वर्ण पाठन क्लिष्ट पहने
शुद्ध उच्चारण हठीले
नव्यता ने स्पष्ट पहने
कंठ में अटके भटकते
सुर करें भयभीत मेरे।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'