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Friday, March 6, 2020

नवगीत होली हास्य संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
होली हास्य 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी~~ 16/14 

आज लगे ब्रह्मांड घूमता, 
इतनी पी लो भंग सभी।
होली मिलती नित्य रहे फिर, 
ऐसे रँगलो रंग सभी। 

1
रंग बिरंगी कुतिया देखी, 
कुत्तों पर होली छाई।
खूब पिटा जब कुत्ता ऐसे, 
तब बासन्ती मुस्काई।
मस्त पुरातन नारी का लठ, 
खाकर कुतिया चिल्लाई।
बूढ़े का सिर फोड़ दिया था, 
बिन चश्मे वह मस्ताई।

गोद लदा फिर वो गोरी के,
सीख यही लो ढंग सभी।
आज लगे ब्रह्मांड घूमता, 
इतनी पी लो भंग सभी।

2 
आज अचानक भांग पकौड़े, 
थाली से दिखते उड़ते।
धूल धँसे कुछ प्रेमी नाचें, 
चटनी कीचड़ सी पड़ते।
साफ चमकती नाली ऐसी, 
अभियान स्वच्छ में जड़ते।
वृद्ध प्रेमिका ने लठ मारा, 
जबड़े हरबार उखड़ते।

नारी का सुन शौर्य यही था, 
देख जिसे हैं दंग सभी।
आज लगे ब्रह्मांड घूमता, 
इतनी पी लो भंग सभी।

3
होली का उद्देश्य समझ लो, 
आज कहे ये कवि प्यारा।
रंगों के स्वर गीत मधुर से, 
गाये धुन ये जग सारा। 
रंग बिरंगे पंख खुलें जब, 
मन मयूर झूमे न्यारा।
रंग अबीरी से मिल जायें, 
रंग बहे बनके धारा।

आप गुलाल बहे सरिता में, 
स्नान करें इस गंग सभी।
आज लगे ब्रह्मांड घूमता, 
इतनी पी लो भंग सभी।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, March 5, 2020

नवगीत होली के चुभते रंग संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत 
होली के चुभते रंग 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/14 

आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।
आज अचानक दर्पण देखे, 
द्रवित नेत्र से अंग सभी। 

1
हुड़दंगी सी आहट सुनके, 
कर्ण डगर से पीर उठी।
कोलाहल की ध्वनि अन्तस् मन,
दर्द अचानक चीर उठी।
सँभली सी कुछ निर्ममता की,
बिखरी सी वह धीर उठी।
परिवर्तन स्वाभाविक दिखता, 
आह हृदय के तीर उठी।

और बहकते हालातों में, 
फीके मादक भंग सभी।
आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।

2
पूछ रही कुछ प्रश्न चूड़ियाँ, 
हाथों से जो दूर पड़ी।
देख सुगंधित गजरा पूछे, 
सूख गई जो आज लड़ी। 
गरजी भी है बरसी भी है,
विधि विधना की देख कड़ी।
रंग बिरंगी बिंदी रोई, 
रहती थी जो भाल जड़ी।

होली का यह शोर अनोखा,
और अनोखे ढंग सभी। 
आँखों में चुभते से दिखते, 
होली के क्यों रंग सभी।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, March 4, 2020

होली हास्य गीत सा रा रा रा संजय कौशिक 'विज्ञात'





होली हास्य गीत
सा रा रा रा
संजय कौशिक 'विज्ञात' 


1
रंग अबीरी जब उड़ा, करता खूब धमाल। 
छत पे जीजा देख कर, साली करे बबाल।।
चढ़ा बीबी का पारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

2
होली का उपहार ले, जीजा करता प्यार।
वक्र दृष्टि बीबी पड़ी, साली संग फरार।
लिया जब रंग सहारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

3
भर पिचकारी छोड़ता, बूढ़ा रंग अपार।
देख पुरातन यौवना, हँसती सोच विचार।
दिखे यौवन का मारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

4
मस्त फाल्गुनी की लहर, आकर्षण का केंद्र।
देख गुलाबो की महक, चहके खूब  महेंद्र।
हवा की बहकी धारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

5
हँसती खिलती ये धरा, देख दिशा चहुँ ओर।
फाल्गुन पर यौवन चमक, दिखते वृद्ध किशोर।
युवा मौसम ये प्यारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

6
हरियाणे की गौरियाँ, होली के ये काज। 
मारे सबको कोलड़े, बचके रहना आज। 
धड़ाधड़ सबको मारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

7
देवर हाथ अबीर ले, ढूंढे भाभी गाल।
बोला भाभी कोलड़ा, और बिगाड़ी चाल।
माजरा समझो न्यारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

8
देवर पिचकारी लिये, दौड़ा भाभी ओर। 
दाँव लगा भाभी गई, जाऊ करती शोर।
पिटा बीबी से हारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

9 
होली खेलो आप जब, रखना इतना ध्यान।
प्रीत भरा ये खेल हो, बिगड़े कभी न मान।
लगे जो सबको प्यारा।
जोगीरा सा रा रा रा।

10 
उत्तम होली पर्व का, सार्थक ये संदेश।
रंगों से मिल-जुल रहो, सुंदर हो परिवेश। 
यही संदेश हमारा।
जोगीरा सा रा रा।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, March 3, 2020

नवगीत कलम के महारथी (व्यंग्य गीत) संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत 
कलम के महारथी (व्यंग्य गीत)
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/16 

सिद्ध हुई है कलम उन्हीं को,
लिखते जो बिन सोच विचारे।
कानी सी साहित्य धरोहर,
आँख दबाई बंद इशारे।

1 
सिद्ध विवेकी मूढ़ कलम के, 
घूम रहे गलियों में बढ़के।
बिकती कविता स्वाद पकौड़ी, 
शब्दों की चटनी सी चढ़के।
चाय समोसे जैसी रचना,
छंद जले हैं इनसे न्यारे।

2
शिल्प विधान समास संधि से, 
रचना सिर से मुंडित पाली।
कविगण श्रेष्ठ गुणी अब उत्तम, 
क्या तुलसी, रस, करते काली।
वाह कहो इनको ये भूखे, 
लालच रूपी कीड़े सारे।

3 
दिव्य दृष्टि उल्लू सी लेकर,
गिद्ध बने कुछ अद्भुत ज्ञानी।
एक कहें दो गीत पढ़ें जब, 
गणित हुआ है पानी-पानी।
साक्ष्य समीक्षक बगला कुल के, 
निम्न सभी जो लक्षण हारे।

4
ज्ञान उसे दो संजय कौशिक, 
पार्थ बने जो आज्ञा लहते।
कवि गुरुओं की ज्ञान नदी में, 
सबगुण अपना कर वो बहते।
जब विपरीत बहाव बहे तो,
आलोचक कुछ तुच्छ पधारे।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, March 2, 2020

नवगीत लाचारी संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत
लाचारी
संजय कौशिक 'विज्ञात'


मापनी~16/14


चिड़िया आग दहकती में क्यों
आज स्वयं को झोंक रही।
जलते दिखते वृक्ष घौंसले,
कितनी कुतिया भौंक रही।

1
तिनके चुगती मस्त रहे जब,
कितना क्रंदन काग करें।
कोयल के चंगुल फँसते फिर,
शर्मसार हो आह भरें।
यह विधि की विधना है कैसी,
बड़े डराते सभी डरें।
एक समय जब दाँव लगे तो,
हाथी चींटी मौत मरें।

राजनीति की दाल गले कब,
कौन यहाँ पर छौंक रही।
जलते दिखते वृक्ष घौंसले,
कितनी कुतिया भौंक रही।

2
जिस तरुवर पर धागे बांधे,
वट सावित्री के नारी।
चिड़िया इसको मान सुरक्षित,
नीड़ बना बैठी प्यारी।
क्षोभ अग्नि से शहर जला क्यों?
किसने फूंकी फुलवारी।
अपना सब कुछ जलता देखा,
दाह करे वो बेचारी।

शायद कुछ भी शेष नहीं था,
जिन्हें नेह से धौंक रही।
जलते दिखते वृक्ष घौंसले,
कितनी कुतिया भौंक रही।

3
सर्प बहुत से बाहर निकले,
अजगर की देखी जकड़न।
दावानल का शोर मचा था,
अपनों की सिसकी तड़पन।
बेबस सी लाचार रही वो,
एक नहीं थी बस अड़चन।
व्याकुल मन से अंतिम निर्णय,
जोड़े - तोड़े सब बन्धन।

श्वेत वर्ण कुछ बुगली आई,
गिद्ध अश्रु भर चौंक रही।
जलते दिखते वृक्ष घौंसले,
कितनी कुतिया भौंक रही।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत रंग विहीन होली संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत 
रंग विहीन होली 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मुखड़ा/पूरक पंक्ति ~~16/16
अंतरा ~~16/16


जल बिन नदिया का क्या बहना
रंग बिना अपनी यूं होली।
तड़प मीन सी आह भरे वो,
दर्पण में सूरत कुछ भोली।

1
रंग बदलती गिरगिट रोई,
मोती नेत्रों से टपकाये।
रंग स्वयं के भूल गई जो, 
कौन उसे फिर क्यों अपनाये।
कैसे? क्यों बढ़ती सी खाई
आज मनों से पाट न पाये।
चिंतन करती दृग भरती सी, 
रंग विरक्त हृदय की डोली।
तड़प मीन सी आह भरे वो,
दर्पण में सूरत कुछ भोली।

2 
कुछ रंग मयूर चुरा करके, 
स्वप्न अनेक सजाकर लाती।
साजन की बांहों के झूले,
अम्बर तक जो छूकर आती।
विरह वेदना हिय ले व्याकुल,
द्रवित हृदय किसको बतलाती।
रंग पटल स्मृति को महकाते,
चित्र भरी पुस्तक जब खोली।
तड़प मीन सी आह भरे वो,
दर्पण में सूरत कुछ भोली।

3
इंद्रधनुष के रंग चुभें कुछ, 
आंखों में लावा सा बहता। 
एक रंग के जीवन में जब,
वो भी उड़कर हल्का रहता।
रंग रंग को चुभता दिखता,
और यातना सी सब सहता।
एक यही कारण है शायद, 
फीकी रंगों की ये बोली।
तड़प मीन सी आह भरे वो,
दर्पण में सूरत कुछ भोली।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, March 1, 2020

गीत होली संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
होली 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 


मत रँगना रंग गुलाल मुझे 
छोड़ो मुझको सांवरिया।

1
कर पिचकारी जब डोली।
भीगे तन-मन संग चोली।
जूही कुछ बड़बड़ बोली।
कुछ कहती चम्पा भोली।
घर मैया देगी गाल मुझे, 
छोड़ो मुझको साँवरिया।

2
कोयल से स्वर में गाती। 
जो मस्त हिलोर उठाती।
कान्हा से दृष्टि बचाती। 
गोपी वृंदावन आती।
कहती मत फांसो जाल मुझे,
छोड़ो मुझको साँवरिया।

3जब राधा दी न दिखाई ।
कान्हा ने मुरली उठाई।
वो दौड़ी दौड़ी आई।
सुन ऐसी तान बजाई।
फिर रोक प्रेम की झाल मुझे,
छोड़ो मुझको साँवरिया।

4 
चित्रण निखरे रंगों का।
मधुबन साथी संगों का।
राधा के उन दंगों का। 
उड़ते अबीर ढंगों का।
संजय कौशिक दो ढाल मुझे, 
छोड़ो मुझको साँवरिया।

संजय कौशिक 'विज्ञात'