नवगीत
चट्टानों के गीत अधूरे
संजय कौशिक 'विज्ञात'
मापनी- 16/10
चट्टानों के गीत अधूरे
नदिया गाती है
बहती मंद समीर तभी ये
मचली जाती है।।
लहरें ले आलाप तभी ये
सरगम चहकी सी
झंकृत वीणा तार बजी ज्यूँ
पीकर बहकी सी
दहकी सी फिर शीतल सी वो
यूँ बतियाती है।।
पाषाणी रँगरेज कहे जो
धारण रंग करे
श्याम हरित फिर अम्बर जैसा
तन को आप वरे
बिम्ब खरे ये कुंदन से कुछ
हिय अपनाती है।।
शृंगारित कर देह जड़ित फिर
अनुपम सी बनकर
श्रेष्ठ विशाल गठित नव यौवन
चलती सी तनकर
छनकर चंद्रप्रभा चांदी सी
नित्य बिछाती है।।
©संजय कौशिक 'विज्ञात'