नवगीत
चाँद के पार
संजय कौशिक 'विज्ञात'
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मापनी- 14/10
मुखड़ा ..…..
क्या चलोगे साथ मेरे,
चाँद के उस पार।
प्रश्न इकतारा करे ये
कर मधुर झंकार॥
1
अंतरा ......
आज सहसा बोलता है,
सरगमी आलाप।
मौन धारे ऋषि खड़ा है,
कर रहा वो जाप।
पूरक पंक्ति ......
चाँद-सूरज सम अडिग ये,
नाद है ओंकार।
क्या चलोगे साथ मेरे,
चाँद के उस पार।
2
कर रहे गुंजार भौंरे,
बन रहे स्वर राग।
रागिनी शृंगार प्रेमिल,
है मधुर अनुराग।
उड़ रहीं मधुमक्खियाँ,
लेकर शहद का भार।
क्या चलोगे साथ मेरे,
चाँद के उस पार।
3
चारु अंतरिक्ष किन्तु,
तेज हिय की आस।
देखता विचलित खड़ा है,
बन रहा विश्वास।
अर्द्ध रात्री में हुई है,
उल्लुओं की हार।
क्या चलोगे साथ मेरे,
चाँद के उस पार।
4
प्रेम की अनुरक्ति करती,
लक्ष्य का संधान।
हंस बैठे हैं ठिकाने,
मिट गए व्यवधान।
विजय श्री पद चूमती है,
जीतते संसार।
क्या चलोगे साथ मेरे,
चाँद के उस पार।
संजय कौशिक 'विज्ञात'
@vigyatkikalam