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Saturday, June 12, 2021

मदिरा सवैया : शिल्प विधान : संजय कौशिक 'विज्ञात'

मदिरा सवैया
संजय कौशिक 'विज्ञात'

शिल्प विधान 

मदिरा सवैया में 7 भगण (ऽ।।) + गुरु से यह छन्द बनता है, 10, 12 वर्णों पर यति होती है।
मापनी ~~ 
211 211 211 2, 11 211 211 211 2



उदाहरण-1

रूप शशांक कलंक दिखा, पर शीतल तो वह नित्य दिखा।
और प्रभा बिखरी जग में, इस कारण ही यह पक्ष लिखा॥
खूब कला बढ़ती रहती, तब जीत गई फिर चंद्र शिखा।
आँचल में सिमटी उसके, तब विस्मित देख रही परिखा॥ 

संजय कौशिक 'विज्ञात' 





उदाहरण-2

बाल विवाह कलंक हटे, तब एक समाज सुधारक से।
नेक सुता अधिकार मिले, फिर क्रंदन बंद उबारक से।
आज उड़ें नित अम्बर में, जय घोष हुए उस कारक से।
मोहन राय कहें जिनको, सब उत्तम वे नृप तारक से।।

 संजय कौशिक 'विज्ञात'




उदाहरण-3

क्रंदन पुष्प करे छल से, जब शूल चुभे उर आकर के।
और विलाप करे बहके, अपनत्व गुलाब हटाकर के।
कष्ट सदा वह ले हिय में, हँसता रहता नित गाकर के।
बाग उजाड़ दिये बिलखे, दृग मौन प्रचण्ड बहाकर के।

संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण 4

वृक्ष उखाड़ उजाड़ दिये, फिर बंदर शोर पुकार रहा।
और दशानन काँप गया, मुख वानर और हुँकार कहा।।
हास्य यहाँ पर कौन करे, यह सागर दे नग और बहा।
मच्छर सा वह वानर या, कर एक वहाँ छल दैत्य फहा।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'



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उदाहरण-5

मात पिता प्रभु तुल्य रहें, अब इष्ट यही सुन देव भले।
कार्य कठोर बनें दिखते, हिय हर्ष पदार्थ समस्त पले।
वंचित जो जन हैं रहते, वह कष्ट प्रताड़ित हाथ मले।
सेवक पुत्र सदा बनते, घर स्वर्ग वही फिर कौन छले।

संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-6

पाटल कण्टक युद्ध हुआ, वह पाटल जीत गया तब से।
अश्रु प्रवाहित कण्टक के, फिर बाग उजाड़ बना जब से।
युद्ध भला कब ये कहता, सुन क्रंदन आज कहे सब से।
नेह सुवासित ये बगिया, महके सबके घर में अब से।

संजय कौशिक 'विज्ञात'




उदाहरण-7 

मुक्त हुए जन हैं भय से, यह वीर दया जब भी करते।
धर्म करें कुछ दान करें, लड़ युद्ध धरा गति पे मरते।
शौर्य दिखा बन रक्षक ये, धरणी नित निर्भयता वरते।
वीर पराक्रम सैनिक के, भुज श्रेष्ठ सदा हिय में भरते।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-8

बारहवीं परिणाम मिला, वह बालक बोल पिता कहता।
औषधि का अब ज्ञान मुझे, यह अर्जित है करना रहता।
क्रोधित देख पिता उस पे, मति मूढ़ विषाणु तुझे दहता।
कारण सोच उतीर्ण हुआ, फिर द्रोह उसी पर क्यों ढहता।


संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-9

घूँघट खोल कली हँसती, दिखती यह एक परी सम है।
उज्ज्वल सा तन श्वेत दिखे, तब देख कहाँ रति से कम है।
रक्तिम रूप धरे नित ही, पर चंचल यौवन में दम है।
आज नहीं भँवरा दिखता, इस कारण आँख हुई नम है।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-10

क्रोध जला कर भस्म करे, विकराल निशा पर रंग चढ़ा।
राख पुकार कहे उड़ती, तम का अपना अधिपत्य बढ़ा।
कालिख रौद्र बनी जबसे, यह रूप भयंकर देख मढ़ा।
वाद विवाद नहीं मिटता, तब वीर प्रकाश प्रमाद गढ़ा।

संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-11

दीप जले जब बिम्ब उठे, भयभीत करे भ्रम एक वहाँ।
काल्पिक आड़ प्रकाश करे, वह देख भला कब सत्य कहाँ।
व्याकुल सा हिय यूँ डरता, यह कौन चले अब संग यहाँ।
कम्पित सा जन हाँफ रहा, तम देख रहा जिस स्थान जहाँ।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-12

काग उड़े फिर चील वहाँ, नभ में मँडराकर शोर करें। 
और घृणा बढ़ती दिखती, यह नाक चढ़े सब देख डरें।
माँस पड़ा यह रक्त बहे, तब गंध बुरी उठ के उभरें।
क्षोभ बढ़े फिर व्याकुलता, द्रव नेत्र विदारक नित्य झरें।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'


उदाहरण-13 

नृत्य करें नटराज जहाँ, तब हर्ष अपार उमा खिलता।
दाँत तले वह ले उँगली, हिय उत्सुकतामय सा मिलता।
और अहा कह देख उन्हें, वह दृश्य मनोरम सा झिलता।
पुष्प करे फिर वर्षित वो, जब दिव्य दिखें ध्रुव भी हिलता।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-14


तत्व परे यह ज्ञान मिला, अब हर्ष विषाद उदास खड़े।
शांत हुई मति चित्त तभी, यह टूट विकार गए जबड़े।
ये क्षणभंगुर जीवन है, अनुशीलन वेद पढ़े रगड़े।
हर्ष विबोध कहे तब ही, मिटते सब काल बली झगड़े।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'



उदाहरण-15

मोहित चंचल पुत्र करे, जब वत्सल प्रेम वहाँ निकले।
डाँट कहे फिर मातृ सुने, तब हास्य कहीं पर क्रोध मिले। 
चुम्बन मात करे हँसती, तुतलाहट पे ममता फिसले।
मुग्ध पिता कुछ उत्सुक से, हिय हर्ष मनोहर दृश्य खिले।

संजय कौशिक 'विज्ञात'




मत्तगयंद सवैया : शिल्प विधान : संजय कौशिक 'विज्ञात'

मत्तगयंद सवैया
संजय कौशिक 'विज्ञात'

शिल्प विधान

मत्तगयन्द सवैया 23 वर्णों का छन्द है, जिसमें सात भगण (ऽ।।) और दो गुरुओं का योग होता है। नरोत्तमदास, तुलसी, केशव, भूषण, मतिराम, घनानन्द, भारतेन्दु, हितैषी, सनेही, अनूप आदि ने इसका प्रयोग किया है।
विधान- मत्तगयंद सवैया
भगण ×7+2गुरु, 12-11 वर्ण पर यति चार चरण समतुकान्त।
मापनी ~~
211 211 211 211, 211 211 211 22


उदाहरण-1

कंकर-कंकर को कहते सब, शंकर देव समान हमारे।
नर्मद से निकले जितने जब, पूजन के अधिकार विचारे॥
भाव बिना भगवान कहाँ यह, सत्य कहूँ सब तथ्य पुकारे।
साफ रखो हिय प्रेम दिखे फिर, ये सुख सागर नाथ सहारे॥

संजय कौशिक "विज्ञात"



उदाहरण-2

एक प्रभावित ज्ञान बड़ा यह, पाँच रहे सच तत्व निराले।
भुक्ति मिले फिर मुक्ति सधे तब, मोक्ष करे वह श्रेष्ठ उजाले।
साधन धाम बने दर आकर, भक्ति विधान पदार्थ कमाले।
संचित हो हरि ध्यान किया धन, चोर भला वह कौन चुराले।।

संजय कौशिक "विज्ञात"




उदाहरण-3

देख दिवाकर यूँ तपता जब, आज धरा यह टेर पुकारे।
मेघ सदा दुख यूँ हरता सब, ताप हरे फिर कष्ट निवारे।
मौन रहा अब और गया छुप, स्वप्न रहे वह आज उधारे।
साँझ ढले जब पूर्व मिले तब, हर्ष बढ़े हिय कार्य विचारे

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, June 11, 2021

इस रचना के रस और अलंकार पहचानिये ... संजय कौशिक 'विज्ञात'


इस रचना के रस और अलंकार पहचानिये ... 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

कुण्डलियाँ

महकी रजनी नाचती, चन्द्र नाचते साथ।
यमुना के तट हर्ष से, मिला हाथ में हाथ।।
मिला हाथ में हाथ, तिमिर कुछ राग बजाता।
नेह प्रमाणित आज, विरह सा जलता गाता।।
कह कौशिक कविराय, रागिनी आती दहकी।
आलिंगन अनुबंध, किया जब रजनी महकी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'


उल्लाला छंद
लीला रचते काले सदा, नित ज्योत्स्ना के साथ में।
यमुना तट पर लिपटे लता, फिर तरुवर के हाथ में।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : खण्डित आभा : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
खण्डित आभा 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~~ 16/14

टुकड़े टुकड़े चंद्र समेटे
खण्डित आभा मौन खड़ी
दीप्त प्रभा में उलझे तारे
चंद्रकला की दृष्टि पड़ी।।

रूप निखरता काल रात्रि का
श्रेष्ठ विधानी सा बनकर
ओस बहे ज्यूँ देख द्रुमों से
आती है फिर छन-छनकर
दर्पण विस्मित चिंतित देखे
कैसी ये खद्योत झड़ी।।

देख रजत जल झरना देता 
और मयंक हुआ पागल
धरणी अम्बर मध्य खड़े ये
रूपा से दमके बादल
एक बयार चली कड़वी सी
मेघ गिराए मार छड़ी।।

और तिमिर का दम्भ हरण कर
ज्योत्स्ना भावुक नेत्र करे
देख उमंग भरे ज्यूँ गङ्गा
लावे का भी ताप हरे
उजियारी सी चमक चाँदनी
सौम्य बनी बिन बात लड़ी।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, June 9, 2021

गीत : वट सावित्री की पीर : संजय कौशिक 'विज्ञात'


गीत 
वट सावित्री की पीर 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~~14/14

इस महामारी जळी से
आज बाणा रो रहा है
पर्व सावित्री रुलाता 
कष्ट उजमण ने कहा है।।

स्पर्श कर जिनके चरण को
माँगती वरदान ढेरों
आज वे दिखते नहीं हैं
बन चुके बैकुण्ठ डेरों 
रिक्तपन अन्तस् कचोटे
स्मृति पटल से दृग बहा है।।

प्रीत का आँचल सिकुड़कर
तंग हिय को नित्य करता
और दिखता ही नहीं है
प्रेम का वो राग भरता
उस भ्रमर का गान झूठा
जो नहीं जाता सहा है।।

श्वास डोरी आस टूटी 
सास काँधों पर चढ़ी है
और दीपक जो जला था
लौ अचानक वो बढ़ी है
नींव का अवशेष मिटकर
दुर्ग पत्तों सा ढहा है।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Tuesday, June 8, 2021

नवगीत : एक दहकी पीड़ : संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
एक दहकी पीड़ 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी~~ 14/14

एक दहकी पीड़ अन्तस्
मौन की धारा बहाई
रोग की नदिया उफनकर
रोगियों की बाढ़ लाई।।

एक ज्वाला सी धधकती
प्राण स्वाहा कर लपेटे
माँ बहन भाई पिता अब
चढ़ गए हैं मृत्यु पेटे
देख फेटे बिन गए सब 
रो रही वो आज दाई।।

पांत टूटी खाट उलटी
अब घरों में नित बिलखती
देहरी जब चीख मारे
चूळ की छाती धड़कती
यातना ये सांकळों की
हूक हिय में दब न पाई।।

देख कुल दीपक बुझाती
ये नदी कितनी मचलती
लाज मारे चील को भी
जो शवों से आज टलती
और दुर्गन्धित धरा पर
मात्र शव की दृश्य काई।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, June 2, 2021

नवगीत : ईष्म की ज्वाला धधकती : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत 
ईष्म की ज्वाला धधकती
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/12 

ईष्म की ज्वाला धधकती
त्राण रखना चाहिए
यूँ भ्रमर की दृष्टि पर भी
बाण रखना चाहिए।।

क्यों कली आहत हुई सी
फूट कर रोती दिखे
ढेड जो दो कौड़ियों के
भाग्य में यूँ दुख लिखे
कुछ कली की पंखुड़ी को
ठाण रखना चाहिए।।

यूँ जलेबी सी सरल हो
गर्म हो कुछ तार की
चाशनी में हो इमरती
शोध के आकार की
फूँक दे जो झंझटों को
घाण रखना चाहिए।।

ये लता महकी लरजती
पुष्प के ही भार से
और आकर्षक लुभावन
हिय मनोहर धार से 
दें चुभो कुछ शूल ऐसे
ताण रखना चाहिए।।

शब्दार्थ :- 
ईष्म - कामदेव, त्राण - बचाव, ठाण - ठान, घाण - एक बार कडाही से पकाने के उद्देश्य से डाली गई सामग्री, ताण - साहस, ढेड - एक गाली

संजय कौशिक 'विज्ञात'