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Saturday, April 11, 2020

नवगीत ; पाषाणी मन : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
पाषाणी मन
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 16/14 

सारंगी सी गूंज स्वरों में
मौन कहे पाषाणी मन।
अन्तस् में लावा सा धधका 
और बहाये पाणी मन।

1
शान्त स्वरों ने पीर सुनाई
मचल रागिनी कुछ बोली।
लहराई टूटी सी सरगम
गूंज गई रिसती खोली।
भेज रही घाटी आवाजें
कह चीत्कार प्रमाणी मन।।

2
रुला रहे हैं राग हृदय को
अधरों पर छाया स्पंदन।
धार अश्रु की बहती सूखी 
और लहर करती क्रंदन।
कंठ पिपासित द्रवित रुद्ध सा
बोल कहे निर्वाणी मन।।

3
एक हँसी का टपका आँसू
देता हिय को घात बड़ी।
समय चक्र के गीत चीखते
कलियाँ व्याकुल देख खड़ी।
मुखड़ा पूरक पर आते ही
सहता कष्ट कृपाणी मन।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, April 9, 2020

नवगीत : आक्रोशित हिय : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
आक्रोशित हिय 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी 16/14

देकर पाषाणों सी ठोकर 
प्रेम कहाँ पर ले आया। 
ढलती साँझे साँसे फूली
आक्रोशित हिय घबराया।।

1
स्पर्श एक से चरखा चलता
बात हवा सी बतियाता।
ताकू जैसे मुख से उगले
स्नेह प्रभावी दिखलाता।
धुरी प्रेम सी टूट गई जब
सृष्टि चक्र सा थम जाता।
तड़प उठा जब बहक हवा ने
अंग छुवन सा सहलाया।।

2
खण्डित दर्पण करता क्रंदन
रूप शतक लेकर अंदर।
लहरें करती ताण्डव नर्तन
शांत हृदय की ये कंदर।
और पीर का बुझता दीपक
हाँफ रहा जैसे बन्दर।
कष्ट अडिग चट्टानों जैसे 
इन्हें व्यर्थ ही समझाया।।

3
कच्चा घर दीवारें कच्ची
पूछ उठी हैं बात वही।
बोल रहे हैं कच्चे रिश्ते
टूट गये क्या खाक सही।
आहत कब करती दीवारें
पक्की सी यूँ बात कही।
सुनकर उनकी बात अचानक
हृदय द्रवित सा चिल्लाया।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, April 8, 2020

नवगीत : बरसा जब विश्वास : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
बरसा जब विश्वास 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी 13/11

उमड़ घुमड़ छाता रहा, 
हृदय प्रीत मधुमास।
पर्व हर्ष का फिर मना,
बरसा जब विश्वास।

1
बौर आम्र पर अब लदे
कोयल पंचम गान
बैठ पपीहे सुन रहे 
प्रेम मगन कुछ तान
यौवन चहुँ दिश छा गया
लगी सभी को आस।

2
दर्पण गोरी देखती 
नख शख रही निहार 
दृष्टि चित्त खुश कर रही 
भृकुटि मंत्र उच्चार 
सोलह से शृंगार कर 
पिया मिलन के खास 

3
इत्र छिड़क महकी दिखे 
जैसे बगिया आज
भँवरे सब पगला गये
थे पागल के काज
होश सभी बिसरा रहे 
हुआ खड़ा ही नास 

4
दोष पूछ मधुमास से
शायद कहदे भेद
गौरव पावन पूण्य सा
उच्चारित कह वेद 
दग्ध विरह करती दिखे
प्रेम दीप दे चास

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, April 5, 2020

नवगीत : दर्पण : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
दर्पण 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~16/14 


दर्पण रिश्ते चटक टूटते 
एक जरा सी आहट से।
तड़प रहे हैं सब सर्दी से 
बुत बन खड़े सजावट से।

1 
डूब रहे हैं नदी किनारे 
शुष्क रेत में जलकर के।
भीतर तक जो तैर चुके हैं 
बाहर निकले चलकर के।
देख रहा कश्ती का चप्पू 
बिना किसी घबराहट से।।

2 
लहरों से भी खेल चुकी हैं 
स्मृति अनुपम हिरदे घाती।
आती जाती साँसे लायी
कोना फटी हुई पाती।
शेष नहीं था बचा हुआ कुछ 
वाचा बिना दिखावट से।।

3 
लावा सा बहकर फूटे जब 
अन्तस् मन की ज्वाला का।
मनका- मनका बिखर गया फिर
हृदय पुष्प की माला का। 
और पीठ के पीछे चुगली 
जब सुने सुगबुगाहट से।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : गीत चीखता : संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत 
गीत चीखता
संजय कौशिक 'विज्ञात' 


मापनी 16/14

गीत चीखता अर्ध लिखा सा 
रूठे अक्षर तोड़ गया।
और व्यंजना अन्तस् चुभती 
भाव हिलोरी मोड़ गया।।

1
शब्द सृजक बन पुष्प महकते 
भाव शूल का काज कहें।
अर्थ समझ में आ भी जाता 
वर्ण अभाषी गाज कहें।
अंचल की सुंदरता सिमटी
बिन ममता के आज कहें।
दीन हीन सा चरण गीत का 
यति गति को फिर फोड़ गया।।

2 
निखरा सा पद बिम्ब समेटे 
और नकल थी दर्पण की।
साथ रहा वो कुछ क्षण मिलकर 
चढ़ता भेंट समर्पण की।
तिल लेकर फिर भरी अंजुली 
बात करे कुछ तर्पण की।
ठहर अंतरा देख विचारे
भाव मरम के छोड़ गया।।

3
द्रवित पृष्ठ मसि सुष्क चमकती 
चली लेखनी अटक अटक।
बोल लिखे पुष्पों से चुभते 
शूल गये थे भाल खटक।
धुन जब सारंगी से निकली 
खड़ी हुई वो वहीं लटक।
तबले से जब ताल बजी तो
लगा अचानक ओड़ गया।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, April 1, 2020

नवगीत : मधुमासी अभिनंदन : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
मधुमासी अभिनंदन 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 16/14 

पतझड़ से अन्तस् कानन में,
मधुमासी सा अभिनंदन।
दृष्टि पटल से पलक उठी जब, 
गिरती सी करती वंदन।

1
सूखी खुशियाँ खिली दिखी जब, 
महकी कलियाँ मुस्काई।
देख हँसी तो अन्तस् मन में, 
सरसों सी थी तरुणाई।
मस्त तरंग प्रकम्पन कहते,
हृदय स्पर्श कर मदमाई।
लटक रही थी ब्याल जहाँ पर, 
महक रहे वो सब चन्दन ...

2
यौवन धार गुरुत्वाकर्षण, 
आकर्षक सा अवलंबन।
कंटीली सी पीर समय की,
मिटती सब बिना विलंबन।
पवमान लिए उपहार खड़ा, 
और जड़ा अधरों चुम्बन। 
लाखों झोंके करते देखे,
बहुत कलह सा फिर क्रंदन।

3
कलकल गूंजे बहते झरने, 
रक्त धमनियाँ दौड़ रही। 
सांय सांय की आवाजें थी, 
समझ नासिका छोड़ रही।
नेत्र विचारक बन कर बैठे,
आस उन्हें कुछ जोड़ रही।
प्राणायाम हृदय तक उतरा,
बाहर काबू से स्पंदन ... 

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत : मोहिनी :संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
मोहिनी 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~~ 13/13

भावन अप्सरा कोई, 
मादक मोहिनी आई।
तीर कमान वो छोड़ें,
भौंह निशान सी पाई।

1 
नेत्र बड़े मनोहारी, 
और सधे प्रहारों से।
रूप परी दिखाये तो, 
आह भरें विचारों से।
अक्षर वर्ण सम्भाले,
आकर गीतिका गाई ....

2
वो मिलती निशा ऐसी,
आकर चांदनी बोले।
शीतल सी व्यहारी थी, 
घातक सा पयो घोले।
मंडल कांति तारों की, 
गूंज विराट सी छाई।

3
पीपल कोकिला कूकी, 
अन्तस्  प्रेम सा फूटा।
और तरंग छोटी थी, 
देख प्रभाव जो लूटा।
ओझल सी हुई देखी,
नाम पुकार मुस्काई।

संजय कौशिक 'विज्ञात'