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Tuesday, January 25, 2022

गीत : अपना ये गणतंत्र पुकारे : संजय कौशिक 'विज्ञात'



गीत 
अपना ये गणतंत्र पुकारे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 16/14 

अपना ये गणतंत्र पुकारे
राष्ट्र सुरक्षित रखना है
नित्य खिले केसर क्यारी सा
सुगठित पुलकित रखना है।।

माली अपने मुखिया अपने
सेवक बन प्रण लेते हैं
निर्भय रखते जन-मन को जो
निर्भयता नित देते हैं 
पुष्प लदे ये प्रान्त सरीखे
बाग सुगंधित रखना है।।

बाँट चुके पंद्रह टुकड़े से
टुकड़े करना बंद करो
रोग मिटा कर अब मजहब का
शांत स्वभावी भाव भरो 
नेह बने बूटी संजीवन
इसको चर्चित रखना है।।

सोचो ये गणतंत्र सफल हो 
एक अमिट लिख दे गाथा
विश्व हुआ नतमस्तक टेके 
इसके चरणों में माथा 
श्रेष्ठ बना सब देखें भारत 
जग को विस्मित रखना है।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, January 2, 2022

नवगीत : मुस्कुराते गीत मेरे : संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत 
मुस्कुराते गीत मेरे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

पंक्तियों से छंद झरते 
मुस्कुराते गीत मेरे 
एक बासंती लहर बन
नित थिरकते मीत मेरे।।

इक कमल दल से हृदय को
जब विरह यूँ तोड़ बैठे
तब सुगंधित पल बिखरते
स्मृति उसी की जोड़ बैठे
कुछ मचलते गुनगुनाते 
ये अधर नवनीत मेरे।।

सप्त वारों ने सुनाए 
कष्ट नव रस के उमड़ते
ऋतु छहों से व्यंजना के 
भाव कुछ जम के उखड़ते
फाल्गुनी से कुछ सँवरते
स्वप्न पकते पीत मेरे।।

गूढ़ शब्दों सी कथा ने
वर्ण पाठन क्लिष्ट पहने
शुद्ध उच्चारण हठीले
नव्यता ने स्पष्ट पहने
कंठ में अटके भटकते
सुर करें भयभीत मेरे।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, December 29, 2021

तुकांत क्या है ? विस्तृत जानकारी उदाहरण सहित : संजय कौशिक 'विज्ञात'

तुकान्त क्या है ? 


किसी भी रचना के अंत में प्रयोग किये जाने वाली तुकबंदी को तुकांत कहते हैं। तुकांत प्रायः तीन प्रकार का कहा जाता है 
1 उत्तम तुकांत 
2 मध्यम तुकांत 
3 निम्न तुकांत 
इन तीनों श्रेणी से जिस पंक्ति का अंत नहीं मिलता वह पंक्तियाँ 'अतुकांत' कहलाती हैं

उत्तम तुकांत - 
उदाहरण 1
किसी पाषाण से मूरत प्रकट यूँ एक हो जाती।
तभी छेनी हथौड़ी पर विजय के गीत वो गाती।
कलम यूँ पृष्ठ पर चलती हुआ निर्माण ये बोले।
मुझे निर्मित करे कविता सदा सम्मान ये पाती।।
©संजय कौशिक 'विज्ञात'

उदाहरण - 2 
कहीं हीरे कहीं मोती बहुत से रत्न चमकीले।
परखते जौहरी देखें खिले जो लाल थे ढीले।
कहे विज्ञात आभारी करे आभार यूँ सबका।
हुआ साहित्य सम्मानित हुए दृग हर्ष से गीले।।
©संजय कौशिक 'विज्ञात'

गाना आना जाना माना ( नीले पीले चमकीले गीले) और (जाती आती गाती पाती) जिनके उच्चारण में प्रवाह समान दिखें स्वर व्यंजन का भार समान हो और जो कविता की तुकबंदी को मधुर सरस तथा आकर्षण युक्त बनाते हैं। जैसे :- 
उदाहरण -3 
लज्जित करता है कागों को, कोयल का स्वर में गाना।
रूप समान मिला था किंतु, उसने अपना गुण जाना।।
कैद नही होती पिंजरे में, और न सहती तानों को।
हर्षित करता है हर मन को, उसका द्वारे पर आना।।
©नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

मध्यम तुकांत - 
'मिलना उबलना निखरना मटकना' इस प्रकार की तुकबंदी में स्वर और व्यंजन का भार समान प्रवाह में नहीं होता। यहाँ पर केवल 'ना' की 
मिलना-खिलना, उबलना-उछलना, निखरना-बिखरना, मटकना-झटकना, अब प्रारम्भ के तुकांत हम किसी रचना में देखेंगे तो निःसन्देह इन तुकांत में वो प्रवाह नहीं है जो उत्तम तुकांत में होता है। अब मस्तिष्क में प्रश्न पुनः उठता है कि मध्यम तुकांत और उत्तम तुकांत में अंतर क्या है और इसे कैसे समझें तो मैंने उत्तम तुकांत के योजक चिह्न के साथ युग्ल बनाने का प्रयास किया है इनके उच्चारण से स्पष्ट हो जाएगा कि मध्यम तुकांत और उत्तम तुकांत में क्या अंतर है समान प्रवाह जहाँ होगा वही उत्तम तुकांत कहा जायेगा। जैसे :- 
उदाहरण - 
झूठे मद ने सिखलाया था, बिना बात के नित्य उछलना।
खुशियों की थी आस मगर, निश्चित था दुख का गिरि पड़ना।।
कब मिलता है जो माँगे मन, हाथ पसारे अब विधिना से।
कर्मों की ज्वाला में तप कर, तय है यश का रूप निखरना।।
©नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

इन रचना में 3 पंक्तियों में तुकांत निभाये गए हैं तीनों पंक्तियों के तुकांत देखो और समझो 
उछलना ... 
पड़ना ... 
निखरना ... इन तुकांत का प्रयोग रचना की दृष्टि से लय में गूंथा हुआ है अब स्वतंत्र रूप से इनका उच्चारण करके देखेंगे तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि इनमें अअना तो कहीं अअअना का उच्चारण है और उच्चारण के आकर्षण की दृष्टि से देखें तो भी इनमें प्रयोग होने वाले ना से पूर्व के व्यंजन कुछ अखर रहे हैं तो इस अखरन को आप समझ सकते हैं जिस कारण इस प्रकार के तुकांत को मध्यम तुकांत की श्रेणी में रखा गया है। 

अब जो इन दो तुकांत की श्रेणी से पृथक कोई तुकांत दिखे तो वह निम्न तुकांत होता है। 

उदाहरण - 
चार युगों की गाथा प्यारी।
वेद शास्त्र के मुख से उकरी।।
भक्ति भाव गंगा में डूबी।
मीरा जी हो गई बावरी।।
©संजय कौशिक 'विज्ञात'

अब इन सबसे पृथक 
अतुकांत को देखते और समझते हैं 

अतुकांत कविता 

अतुकांत कविता के अंतिम शब्दों की तुकबंदी पंक्तियों को क्रमानुसार ऊपर से नीचे देखेंगे तो ये पंक्तियाँ बिना तुक के होती हैं। अतुकांत शब्दों से निर्मित कविता में ध्वनियाँ परवर्तित होती रहती है। कविता लयबद्ध नहीं होती है। परन्तु ध्यान रहे बिम्ब या प्रतीक बदलते ही पंक्ति बदल जाती है। देखें इस उदाहरण को जो समझने में सहयोग करता है अतुकांत कविता को ... 
"अतुकांत कविता सीधी सरल अभिव्यक्ति है जो एक भाव प्रवाह में बहती हुई पूर्णत्व को प्राप्त करती है बिना किसी नियमावली में बँधे।"

पाषाण 

हाँ मैं 
पाषाण हूँ 
छेनी की धार 
मार हथौड़ी की 
प्रहार असंख्य सहता हूँ 
खंड खण्डित 
नित्य होकर
अपने ही तन से 
अनगिनत टुकड़ों में 
बँट जाता हूँ 
जब मेरी पाषाणी चमड़ी 
छिली जाती है 
कितनी पीड़ा 
मुझी में से 
धूल के आँसू बन कर 
उड़ती है
कौन समझता है 
मेरा कष्ट ?
आकृति मूर्ति देखकर 
तुम कहते हो 
भगवान
हाँ मैं 
पाषाण हूँ

©संजय कौशिक 'विज्ञात'



तुकांत का महत्व:- 

घेर रही है बिषय वासना 
अब मैं यदि इस पंक्ति पर 4 तुकांत ढूँढना चाहूँ तो मुझे सार्थक तुकांत समझ नहीं आ रहा फाँसना एक सार्थक तुकांत है पर यह उत्तम नहीं बनता कारण अनुनासिका का प्रयोग मेरी पहली पंक्ति में नहीं है फिर मैंने घास ना पास ना आदि पर विचार किया उच्चारण की दृष्टि से पर लेखन में ये संयुक्त नहीं हैं तो मेरी रचना जिसे मैं उत्तम कृति के रुप में प्रस्तुत करना चाहता था उसमें इस प्रकार के तुकांत उत्तम नहीं हैं तो मुझे ये मध्य स्तर के दिखाई दिए।  फिर मैंने थोड़ा सा बुद्धि पर और दबाव डाला तो मुझे कुछ सार्थक तुकांत दिखाई दिए डासना, ग्रासना, उपासना चासना, खासना पर इनसे भी मेरे कथन को कुछ नव्यता मिल सके और ये तुकांत सभी सार्थक तथा उत्तम लगें इसमें संदेह दिखाई दिया फिर शब्द कोष का सहारा लेना उचित समझा तो मैंने पाया कि ग्रासना उपासना तथा भासना कुछ सार्थक दिखे तो अब मैं आगे बढ़ने का निर्णय ले सकता हूँ 
घेर रही है विषम वासना
लालच चाहे जिसे ग्रासना
खड़ी प्रतीक्षा में है भविता
करे कर्म की नित उपासना 

अब इन मध्यम तुकांत के माध्यम पंक्तियाँ पृष्ठ पर उतर गई हैं मैंने मध्यम तुकांत क्यों कहा कारण यही है शिल्प की दृष्टि से मात्रा भार भले तीनों तुकांत सही प्रयोग हो गए हैं परंतु केवल तुकांत का प्रवाह देखें तो एक में आधा ग् तथा दूसरे में उ का होना प्रवाह में परिवर्तन कर रहा है। इस प्रकार से आप समझ सकते हैं कि रचना लिखने से पूर्व ही हमें तुकांत के विषय में मंथन कर लेना कितना आवश्यक है। इसके महत्व के विषय में आप स्वयं विवेक से निर्णय ले सकते हैं कि तुकांत उत्तम मध्यम या निम्न स्तर के प्रयोग करने हैं। "उत्तम रचना सदैव उत्तम तुकांत की अपेक्षा रखती है। जिसके प्रयोग से रचना के पाठन प्रवाह में विशेष आकर्षण प्राप्त होता है।" 



तुकांत का मंथन करें सावधानी के साथ :- 

अधिकांशतः देखा जाता है कि देश विदेश स्वदेश तुकांत लिख दिए रचना में और रचना पूरी परंतु ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे यह निम्न स्तर का तुकांत है इसमें तुकांत दोष है कारण सभी तुकांत में देश शब्द प्रयोग हुआ है अब इसे पूर्व का वर्ण पृथक नहीं है स्व वि - जबकि देश में आगे कोई वर्ण है ही नहीं तो इस प्रकार के तुकांत निम्न श्रेणी के तुकांत होते हैं। 

अब हमें आवश्यकता है देश जैसे शब्द के तुकांत ले रहे हैं तो द बदला जाए जैसे परिवेश 
अब ध्यान रहे कि भेष शेष जैसे तुकांत भी यहाँ निम्न तुकांत ही कहलाएंगे। 
इस प्रकार रचना रचने से पूर्व ही हमें अपने तुकांत पर मंथन कर लेना अत्यंत आवश्यक है। 




तुकांत कैसे निर्धारित करें तथा खोजें :- 

लगभग तो मैं बता चुका हूँ कि तुकांत क्या है इसका महत्व क्या है मंथन क्यों अनिवार्य है सावधानी कैसे रखें इतना सब करलेने से जो तुकांत निकल कर आएंगे यही तुकांत की खोज का एक मात्र उत्तम मार्ग कहलाता है तुकांत की खोज का... भावों के कथन के अनुसार जो तुकांत आपकी रचना में सटीक बैठते हैं उसका निर्णय आपके द्वारा चयनित प्रतीक स्वयं कर देते हैं कि यह तुकांत मुझे चाहिये और मैं एक नूतन बिम्ब बना दूँगा।

Tuesday, December 28, 2021

बिम्ब और प्रतीक की विस्तृत जानकारी परिभाषा, भेद और उदाहरण : संजय कौशिक 'विज्ञात'

संजय कौशिक 'विज्ञात' 
काव्य में बिम्ब क्या होते हैं ? 
बिम्ब शब्द का अर्थ  "मूर्त रूप प्रदान करना" साधारण शब्दों में जहाँ तक मैनें बिम्ब को समझा है उसके अनुसार बिम्ब की व्याख्या इस प्रकार से है- '"काव्य में सटीक बिम्ब के प्रयोग से रचना में अलंकार अनायास ही प्रकट होते चले जाते हैं जिससे काव्य की मूर्ति का शृंगार अत्यंत ही अनुपम सा दिखने लगता है।" नवगीत विधा सहित काव्य की समस्त विधाओं में लेखन से मूर्तीकरण के लिए सटीक बिम्ब योजना होती है।
जबकि डाॅ. देवीशरण रस्तोगी के अनुसार "बिम्ब प्रायः अलंकारों की सहायता लेते और इसी प्रकार अलंकार अन्ततः बिम्ब को ही लक्ष्य करते हैं।"
 बिम्ब एक ऐसे शब्द चित्र को कहा जाता है जो कल्पना के माध्यम से ऐन्द्रिय अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है।
बिम्ब- विधान हिन्दी साहित्य में कविता की एक पद्धति है। हिन्दी कविता में जैसे ही विषय बदले, वस्तु बदली और कवि की जीवन को जीने की कला के प्रति दृष्टि बदली वैसे ही शिल्प के क्षेत्र में रूप-विधान के नये आयाम भी विकसित होते आये हैं।
डाॅ. केदारनाथ सिंह के मतानुसार बिम्ब की परिभाषा कुछ इस प्रकार बनके प्रकट होती है  ’बिम्ब यथार्थ का एक सार्थक टुकङा होता है। वह अपनी ध्वनियों और संकेतों से भाषा को अधिक संवेदनशील और पारदर्शी बनाता है। वह अभिधा की अपेक्षा लक्षणा और व्यंजना पर आधारित होता है।"

बिम्ब का प्रयोग साहित्य में प्रारम्भ से होता आ रहा है। प्रतीकों के विपरीत बिम्ब इन्द्रिय-संवेद्य होते हैं। अर्थात् उनकी अनुभूति आँख, कान, नाक तथा जिह्वा आदि किसी न किसी इन्द्रिय से जुड़ी रहती है। इसीलिए साहित्य में हमें दृश्य-बिम्ब के साथ-साथ श्रव्य, घ्राण और स्पर्श-बिम्ब का प्रयोग भी मिलता है। विश्व के परिवेश से रचनाकार कुछ दृश्य, कुछ ध्वनियाँ, कुछ स्थितियाँ उठाता है और अपनी कल्पना, संवेदना, विचार तथा भावना के योग से उन्हें तराश कर बिम्ब का रूप देता है। अपने कथ्य को संक्षेप, सघन रूप में प्रस्तुत करने के लिए, अपनी बात का प्रभाव बढ़ाने के लिए और किसी स्थिति को जीवन्त कर पाठक के सामने रख देने के लिए रचनाकार बिम्बों का प्रयोग करता है।
प्रश्न यह है कि कविता में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग क्यों आवश्यक है? वस्तुतः बिम्ब और प्रतीक हमें अपनी बात सरलता से और चिर परिचित ढंग से कहने में सहायक होते हैं । यह कविता को अनावश्यक वर्णनात्मकता से बचाते हैं। पाठक पूर्व से ही उस बिम्ब के आंतरिक गुण से परिचित होते हैं इसलिए वे उन बिम्बों के मध्य से कही गयी बात को सरलता से आत्मसात कर लेते हैं । बिम्ब काव्यात्मकता का विशेष गुण है। इसके अभाव में कविता नीरस गद्य की तरह प्रतीत हो सकती है । इसके अलावा बिम्ब कविता को सजीव बनाते हैं, जीवन के विभिन्न आयामों को हम बिम्बों के मध्य से सटीक ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं। साहित्य की भाषा में बिम्ब अनेक प्रकार के बताये गए हैं जिनमे दृश्य, श्रव्य, स्वाद, घ्राण, स्पर्श आदि प्रमुख है, ऐंद्रिकता इनका केन्द्रीय भाव है। 

सी.डी. लेविस के मत से बिम्ब की परिभाषा अलंकृत रूप में कुछ इस प्रकार प्रकट होती है  "काव्य बिम्ब एक ऐसा भावात्मक चित्र है जो रूपक आदि का आधार ग्रहण कर भावनाओं को तीव्र करता हुआ काव्यानुभूति को सादृश्य तक पहुँचाने में समर्थ है।"

वस्तुतः बिम्बों का महत्त्व कवि सदा से स्वीकार करते हैं।  
बिम्ब को पदचित्र, शब्दचित्र और 'मूर्त विधान' भी कहा जाता है। हिंदी के छायावादी कवि परिवार बिम्ब इतने आकर्षक और लुभावने थे कि समस्त विश्व के कवि बिम्ब के मोहिनी पाश के बंधन में बंधते दिखाई देने लगे। छायावाद ही बिम्ब शैली का निर्माण कर्त्ता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पाश्चात्य देशों ने भी बिम्ब को 'इमैजियम' नाम से अपनी कविता में प्रयोग किया। फिर तो यह एक आन्दोलन के रूप में चल पड़ा था। प्रायः बिम्ब प्रयोग के तीन प्रमुख तत्व माने जाते हैं-
1 काव्य में वस्तु के संप्रेषण के लिए 
2  ऐसे शब्दों का सर्वथा परिहार जो काव्य को अर्थवान बनाने में योग नहीं देते। 
3 काव्य निर्माण में संगीतात्मक नियम का निर्वाह, अर्थात् उसकी लय को घड़ी के लोलक के नियम से न बाँधना।
प्रेषणगत इन लक्ष्यों के अतिरिक्त काव्य में बिंब ग्रहण की दो मुख्य उपयोगिताएँ होती हैं-

1 इंद्रियगत अनुभव (sensual experience)
2 अलंकृति।
पहले के अंतर्गत पाठक कविता के विविध रूपों से इंद्रियगत अनुभव करता है। यानी आँख, कान, स्पर्श आदि से इंद्रिय बोध करता है। दूसरे के अन्तर्गत बिंब से काव्य सौंदर्य बढ़ता है। इसमें संक्षिप्तता, व्यंजकता और भास्वरता आदि शामिल है। दोनों का लक्ष्य संप्रेषणीयता को बढ़ाना ही है। इसके लिए कवि विशेष भाषा का प्रयोग करता है। शब्दों की जोड़ से बिंब का निर्माण करके वस्तु संप्रेषण करता है।

डाॅ. नगेन्द्र बिम्ब की परिभाषा कुछ इस प्रकार से प्रेषित करते है। जिसने बिम्ब की गुत्थी को और भी सरल कर दिया है 
"काव्य बिम्ब शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी मानस छवि है जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।"

बिम्ब ग्रहण सरल कार्य भी है और संश्लिष्ट कार्य भी। इसमें कवि की प्रतिभा की अग्नि परीक्षा होती है। संश्लिष्ट होने पर बिंब दुरूह भी हो सकता है। वह भी भाषा प्रयोग का ही परिणाम है।



काव्य में प्रतीक क्या होता है ? 

प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव, विचार या अगोचर तत्त्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है।जिसका शाब्दिक अर्थ चिह्न कहा जाता है। प्रतीक अप्रस्तुत विषय का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रस्तुत विषय को कहा जाता है। पढ़ते अथवा सुनते ही मन में किसी न किसी भावना को जाग्रत कर देने वाले विषय को प्रतीक कहते हैं।
कवि नगेन्द्र के अनुसार ’’उपमान जब किसी पदार्थ विशेष के लिए रुढ़ हो जाता है तब प्रतीक बन जाता है।’’
मेरी एक रचना उल्लाला छंद में देखें काले कृष्ण का प्रतीक है तथा ज्योत्स्ना राधा का प्रतीक है वहीं द्वितीय पद में लता राधा का प्रतीक तो तरुवर कृष्ण का प्रतीक स्पष्ट  होता है पढ़ें इस रचना को और समझने का प्रयास करें ...
*उल्लाला छंद*
लीला रचते काले सदा, नित ज्योत्स्ना के साथ में।
यमुना तट पर लिपटे लता, फिर तरुवर के हाथ में।।
संजय कौशिक 'विज्ञात'

"छंद वर्ण के आँगन गूँजे" संजय कौशिक 'विज्ञात'- आँगन शब्द तथा शिल्प का प्रतीक है और गूँजे लेखन का प्रतीक है। कवयित्री नीतू ठाकुर विदुषी के नवगीत "विदुषी व्यंजना" विदुषी कविता तथा व्यंजना उसमें निहित कथन शक्ति है। कवयित्री अनिता सुधीर आख्या का नवगीत "देहरी फिर गाने लगी" इसमें देहरी के गीत शादी से संबंधित हैं जो उत्सव का प्रतीक है। कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' का नवगीत "मन की वीणा" में वीणा मधुर संगीत का प्रतीक है और मनसे जुड़ा है तो हर्ष का प्रतीक है। कवयित्री अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' का नवगीत "द्वार पर दस्तक" यह स्पष्ट रूप से हृदय के द्वार पर उमड़ती भावनाओं का प्रतीक है। कवि परमजीत सिंह कोविद कहलूरी का नवगीत "कोविद गीतांजलि" कोविद अर्थ ज्ञानी और उसके अंजुली भर गीतों की भेंट समर्पण का प्रतीक है। कवयित्री पूनम दुबे 'वीणा' का नवगीत "वीणा के खनकते गीत" में वीणा सुर तथा खनकते गीत लय बद्ध प्रस्तुति का प्रतीक है।

भारतीय साहित्यिक दृष्टिकोण से प्रतीक शब्द शक्ति लक्षणा के विकसित रूप में स्वीकार किया गया है। तथा कुछ विद्वान इसका आविर्भाव  अन्योक्ति अलंकार के रूप में करते हैं। जबकि  आचार्य शुक्ल ने इसे चित्रभाषावाद ही माना है।

प्रतीक के भेद कितने होते है ? 
आइए ये भी जानते है 

प्रतीकों के भेद –


1. भावोत्प्रेरक प्रतीक – पाटल, कमल, सूर्य, चन्द्र, कुमुदिनी, रात की रानी, 

उदाहरण- 

कंटक के आंचल से निकला, 
खिलता सा पाटल हँसता।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

2. विचारोत्पादक प्रतीक – कैकेई, मंथरा, द्रोपदी, शिखण्डी, परशुराम, भीष्म 

उदाहरण- 

आज जीने के लिये 
इक शिखण्डी चाहिये
मातृ नारी शक्ति का
रूप चण्डी चाहिये

©संजय कौशिक 'विज्ञात'


3 वैयक्तिक प्रतीक – किसी विशेष के संदर्भ को उजागर करते हुए वैयक्तिक प्रतीक कहलाते हैं। जैसे  नलिनी, माली, सैनिक
फूलि-फूलि चुनि लिए, काल हमारी बार।

उदाहरण- 

पीठ टाँग ले बस्ता सैनिक
संबल बन जाएगा मित्र

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

4. परम्परागत प्रतीक –  परंपरागत प्रतीक मुहावरेदार सशक्त कथन में प्रयोग होते दिखाई देते हैं जो परम्परा का निर्वहन करते हैं जिनका दृश्य तर्क संगत तो होता ही है साथ ही वह अपने प्रयोग से अपनी उपास्थिति को श्रेष्ठ बनाता है। 

उदाहरण- 

खाट की फिर पांत रोई 
टूट कर उल्टी पड़ी
दे गया है मेढ़ घर का
कष्ट क्रंदन की घड़ी।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

दीवारों ने कान दे
सुनी सखी की बात।

©अनिता सुधीर 'आख्या'

5. परम्परामुक्त प्रतीक – सर्प, मधुमय बसन्त
 जिन प्रतीकों को नियमित परम्परा से मुक्त पाया जाता है उन्हें परम्परामुक्त प्रतीक कहा जाता है ... कल्पना के माध्यम से परंपराओं का खण्डन करने वाले प्रतीक इस श्रेणी में आते हैं  जैसे सर्प के पंख, दुष्ट साधु जो शब्द परम्परा से हटकर चिह्न बनाता दिखाई दे।

उदाहरण- 

डाल चंदन की पिपासित 
रोटियाँ जलने लगी हैं

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

राख से तम  साफ करके 
इक नई आभा दिखेगी l

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

पात्र  छलनी हाथ में दे 
क्रूर विधना लूटती सी।

©कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

6. भावपरक प्रतीक – छायावादी प्रतीक

दुष्ट दुशासन हरता अम्बर, 
देख द्रोपदी बिलखे अम्बर।।

कष्ट तड़पता यूँ दम तोड़े।
खण्डित श्वासें भी मुख मोड़े।।
रक्तिम अभिमन्यु पड़ा धरणी 
कालबली के पड़ते कोड़े।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

तिलमिलाता कष्ट से मन
कँपकँपाते हैं अधर।

©इन्द्राणी साहू 'साँची'

व्याख्यात्मक प्रतीक – जो प्रतीक अपने भीतर रहस्य समाहित किए हुए हों और व्याख्या से समझ आ सकें ऊपर से साधारण दिखने वाले प्रतीक अपने भीतर मर्म समेटे इस श्रेणी में आते हैं जैसे - इंद्रधनुष, गिरगिट, शेर, गीदड़ 

उदाहरण- 

गीदड़ भभकी शत्रु की, 
लगे सर्प फुंकार।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'


प्रतीकपरक प्रतीक – कमल, चाँदनी 

 
डाॅ. रामस्वरूप चतुर्वेदी की इन पांक्तियों के माध्यम से गागर में सागर का परिवेश झलकता है "कविता के लिए शाब्दिक प्रतीक होना एक आधारभूत शर्त है पर हर शाब्दिक प्रतीक कविता नहीं होता।" इसे सदैव स्मरण रखना चाहिए। 

प्रतीक विषय को जितना और जिस प्रकार से मैंने समझा आप सभी के समक्ष सरलता से रख दिया है । विश्वास है आप अब प्रतीक के विषय में अपने ज्ञान को और विस्तृत कर लेंगे।

विषय के आधार पर प्रतीकों के निम्नलिखित भेद हैं-

1 प्राकृतिक प्रतीक
2 पौराणिक प्रतीक
3  पौराणिक प्रतीकों का आधुनिकीकरण
4  रूढ़ प्रतीक
5  नवीन प्रतीक

1 प्राकृतिक प्रतीक-

पंचतत्वों से निर्मित मानव का प्रकृति अभिन्न भाग है। इनका संबंध इतना गहन है की एक दूसरे बिना जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। यही कारण है कि प्रकृति का प्रत्येक दुख साहित्यकार को स्वयं का दुख लगता है और बड़ी ही सरलता से प्रकृति से अपने प्रतीक चुनकर सहज ही अपने भावों को अभिव्यक्त कर देता है. प्रकृति से चुने हुए साहित्य में प्रयुक्त प्रतीक ही प्राकृतिक प्रतीक कहलाते हैं जैसे आकाश, सूर्य, धरती, वृक्ष, आदि.

उदाहरण-

लड़ रही नभ के तिमिर से
ये अकेली रात काली

उपर्युक्त पंक्तियों में रात ऐसे स्त्री का प्रतीक है, जो निरंतर परिस्थितियों से संघर्ष करती जा रही है जैसा यहाँ मूर्त के लिये मूर्त प्रतीक का प्रयोग किया गया है.

2 पौराणिक प्रतीक-

पौराणिक प्रतीकों से अभिप्राय ऐसे प्रतीकों से है जो चिरप्रचलित रामायण, महाभारत के पौराणिक आख्यानों को आधार बनाकर साहित्य में प्रयुक्त होते हैं.

उदाहरण-

द्रोपदी की सिसकियों सी 
वेदना है आज की।।

उपर्युक्त पंक्तियों में द्रोपदी के पौराणिक प्रसंग को प्रतीक बनाकर वेदना की तीव्रता को दर्शाने का प्रयास किया गया है। द्रोपदी ने अपने जीवन में जिन परिस्थितियों को देखा और अपमान भरी यातनाओं को सहन किया उसे दुख की पराकाष्ठा कह सकते हैं इसी लिए यहाँ पर उसका प्रयोग कम शब्दों में अपनी बात कहने के लिए उपयुक्त है।

भक्ति का उत्तम उदाहरण
दिख रहा हनुमान जैसा।।  

 उपर्युक्त पंक्तियों भक्ति के उत्कृष्ट उदाहरण हनुमान जी का उल्लेख कर अमूर्त भावों को मूर्त रूप दिया गया है। यह नाम पर्याप्त है किसी भी भक्त की निष्ठा और समर्पण को प्रमाणित करने के लिए।

3 पौराणिक प्रतीकों का आधुनिकीकरण-

आधुनिक साहित्य में पौराणिक प्रतीकों की आधुनिक संदर्भ में नई व्याख्या भी की गयी है।

उदाहरण-

एक ब्रह्मास्त्र बनकर
नित्य कोरोना निगलता।। 

उपर्युक्त पंक्तियों में महाशक्तिशाली ब्रह्मास्त्र का आधुनिकीकरण भीषण रोग कोरोना के रूप में किया गया है। जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र का एक प्रहार समस्त सृष्टि का विनाश कर सकता है उसी प्रकार समूचा विश्व इस महामारी के प्रकोप से पीड़ित है जो असंख्य प्राणों की बली ले चुका है।

दैत्य ओमिक्रोन ऐसा 
एक भस्मासुर भयंकर।।

उपर्युक्त पंक्तियों में भस्मासुर का आधुनीकीकरण किया गया है अर्थात् जैसे भस्मासुर के स्पर्श मात्र से व्यक्ति राख में परिवर्तित हो जाता था उसी प्रकार ओमिक्रोन दैत्य सा रूप धारण कर समस्त मानव जाति को राख बनाने का प्रयास कर रहा है।

4 रूढ़ प्रतीक-

कुछ प्रतीक ऐसे हैं जो किसी विशेष अर्थ के लिये रूढ़ हो गये हैं, ऐसे प्रतीक रूढ़ प्रतीक कहलाते हैं.

उदाहरण-

यूँ अदालत गूँजती हैं
इक शपथ बन झूठ गीता।।

गीता ज्ञान, सत्य और धर्म का रूढ़ प्रतीक मानी जाती है जिसका दुरुपयोग आज समाज में दिख रहा है जो समाज की मिटती नैतिकता और संवेदना का प्रतीक है। 

यूँ घरों में गूँजती है
फिर महाभारत पुरानी।।

महाभारत यह शब्द गृह-युद्ध के लिये रूढ़ प्रतीक बन गया है, उपर्युक्त पंक्तियों में इसी रूढ़ प्रतीक का प्रयोग कर के कलह की तीव्रता को दर्शाया गया है।

चीरहरण भी नित्य बिलखते
याद द्रोपदी को करके।। 

महाभारत के बहुचर्चित प्रसंग चीरहरण जो एक रूढ़ प्रतीक माना जाता है उसके माध्यम से समाज में महिलाओं  के साथ घटित हो रहे अपराध के शोक को दर्शा रहा है। जिस प्रकार द्रोपदी ने अपना प्रतिशोध लिया उसी प्रतिशोध की अपेक्षा प्रत्येक चीरहरण को है जो न्याय की आस में बिलख रहा है।


5 नवीन प्रतीक-

नवीन प्रतीक ऐसे प्रतीक हैं, जिनका प्रयोग आधुनिक साहित्य से पहले नहीं हुआ है.

उदाहरण-

काठ की गाड़ी खड़ी
भाव के आभार तक।
ले महक इस मार्ग से
चंद्र के आगार तक।।

उपर्युक्त पंक्तियाँ नूतन प्रतीक कहे जाएंगे क्योंकि इनका प्रयोग आधुनकि साहित्य से पहले नही हुआ है। मानव जीवन को सुखमय बनाने के लिए  नित्य नूतन साधनों की निर्मिति होती रहती है उन्हें भी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में स्थान देकर उनकी महत्ता को बढ़ाया है। साधारण सुई से लेकर वैक्सीन तक कुछ भी साहित्य से अछूता नही रहा और उन्हें उपयुक्त स्थान पर प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया।



प्रतीक एवं बिम्ब में क्या अंतर है ?

प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव या अगोचर तत्त्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि बिम्ब किसी पदार्थ की प्रतिकृति या प्रतिच्छवि के लिए प्रयुक्त होता है।


प्रतीक से तुरन्त मन में कोई भावना जाग्रत होती है किन्तु बिम्ब से मस्तिष्क में किसी सादृश्य का चित्र उभरता है।

व्यक्तित्व उपमान जब रूढ़ हो जाते हैं तो वे प्रतीक बन जाते हैं जबकि बिम्ब में नवीनता व ताजगी होती है।

प्रतीक कल्पना द्वारा किसी भावना को जाग्रत करते हैं, जबकि सटीक बिम्ब विधान से प्रमाता को तुरन्त ऐन्द्रिक साक्षात्कार होता है।

प्रतीक में किसी भावना को साकार होने की कल्पना की जाती है जबकि बिम्ब में कार्य का मूर्तिकरण होता है।

प्रतीक में भावना को उत्पन्न या जाग्रत करने की शक्ति होती है जबकि बिम्ब विधान में भावनाओं की उत्तेजित करने की शक्ति होती है।

प्रतीक पर युग, देश, संस्कृति, मान्यताओं की छाप रहती है।



प्रतीक के संदर्भ में कुछ रोचक जानकारी और है  जिसे जान लेना भी अत्यंत आवश्यक है .... 

प्रतीकपूजा का अर्थ
सं-स्त्री. - प्रतीकों की पूजा; लिंगपूजा; मूर्तिपूजा; आध्यात्मिक आस्था के कारण प्रकृति के किसी उपादान की पूजा।

प्रतीकवाद का अर्थ
सं-पु. - अभिव्यंजना की वह विशिष्ट प्रणाली या उससे संबंधित मूल तथा स्थूल सिद्धांत जिसके अनुसार प्रतीकों के आधार पर भावों, वस्तुओं आदि का बोध कराया जाता है; (सिंबलिज़म)।

प्रतीकवादी का अर्थ
वि. - 
1 प्रतीकवाद से संबंधित; प्रतीकवाद का 
2 प्रतीकवाद का अनुयायी, पोषक या समर्थक (व्यक्ति, कलाकार)।

प्रतीकात्मक का अर्थ 
वि. - 
1 जो प्रतीक या प्रतीकों से संबद्ध हो 
2 (साहित्यिक रचना) जिसमें प्रतीकों की सहायता से भावों, वस्तुओं, विषयों आदि का बोध कराया गया हो 
3 नाममात्र का।

प्रतीकात्मकता का अर्थ
सं-स्त्री. - प्रतीकात्मक होने की अवस्था या भाव।

प्रतीकार्थ का अर्थ
सं-पु. - 1 प्रतीक के आधार पर प्राप्त अर्थ 
2 सांकेतिकता 
3 प्रतीकात्मकता। वि. जिसका प्रयोग प्रतीक के रूप में हुआ हो।

प्रतीकोपासन का अर्थ
सं-स्त्री.- 1 देवता का कोई प्रतीक बनाकर उसकी पूजा करना 
2 किसी के प्रतीक की की जाने वाली उपासना 
3 मूर्तिपूजन।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, December 22, 2021

नवगीत : नव यौवन की तरूणाई : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
नव यौवन की तरूणाई
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 16/14

ढोल थिरकते उर के भीतर 
और गूँजती शहनाई 
हाथों में जयमाल सुगंधित
स्वप्नों ने ली अँगड़ाई।।

भव्य सुसज्जित मण्डप झूमे 
दिव्य चमक ले परकोटे
विद्युत सी उपकरण हँसी ने
मेट दिए दिन के टोटे 
रात्रि चाँदनी लज्जित देखे 
देख धरा भी मुस्काई।।

लोक परी आश्चर्य चकित सा
आकर्षण पर सम्मोहित
कांति चमकती नव्य यौवना
अतिक्रमणमय आरोहित
सुंदरता भी पुंज समेटे 
आज यहीं दिखने आई।।

दिव्य प्रभामय आज अचंभित
श्रेष्ठ लिए आकार खड़ी
मूर्ति ब्रह्म निर्माण कला की
हस्त धार कर हार खड़ी
ओस बूंद से भी उत्तम सी
नव यौवन की तरुणाई।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Monday, December 20, 2021

नवगीत : इक अधूरा गीत उसका : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत
इक अधूरा गीत उसका
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14

तोड़ कर अनुबंध जीवन
पूर्ण करके श्वास लेटा
इक अधूरा गीत उसका
कोयलों ने यूँ लपेटा।।

क्रूर फंदे काल लेकर
नित्य ही भरमा रहा है
एक अजगर बन डराता 
पाश क्रीड़ा ने कहा है
रिक्त गुब्बारा हवा का 
भर चुका है आज पेटा।।

मृत्यु की ये ओढ़नी भी
पारदर्शी दिख रही है
ओढ़ लेटी देह कबकी 
मौन श्वासों ने कही है
इस धरा की गोद को फिर
व्यंजनाओं ने चपेटा।।

अंत दर्शन चीखता सा
नभ पखेरू छोड़ रोये 
प्रिय मनोहर मीत क्रंदन 
रक्त व्याकुल नेत्र खोये 
देख कर घुट-घुट मरा है
प्राण ने आतंक मेटा।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, December 19, 2021

निबन्ध कैसे लिखें ? संजय कौशिक 'विज्ञात'



निबन्ध कैसे लिखें ?
संजय कौशिक 'विज्ञात'

निबंध लिखते समय हमारे समक्ष सबसे पहला प्रश्न यही आता है निबंध विधा को लिखते समय हमें किन-किन बातों का ध्यान रखना होता है। आइये जानते हैं निबंध लेखन की सावधानी के मुख्य पक्ष कौन कौन से हैं।  कला पक्ष तथा भाव पक्ष निबंध लेखन के 2 महत्वपूर्ण पक्ष हैं पहले हम जानेंगे कि निबंध के कला पक्ष के विषय में इसमें क्या क्या लिया जाएगा ? 
कला पक्ष - कला पक्ष को सावधानी से लिखते हुए जिन बातों का ध्यान रखना होगा वे इस प्रकार से हैं ... 
1 विषय को बाँधती शब्दावली - शब्दावली विषयानुसार ही प्रयोग होनी चाहिए। 
2 सरल वाक्य - वाक्य की संरचना पर ध्यान देना होगा जो वाक्य जितने सरल होंगे उतने ही प्रभावकारी भी होंगे। 
3 भाषा शैली भावानुकूल- भावों से विपरीत दिशा में प्रयोग की जाने वाली भाषा लेखन को  प्रभावहीन दर्शाएगी अतः जो भावों के अनुकूल हो भावों को शक्ति प्रदान करती हो और भावों को निखारती हो स्पष्ट करती हो निबंध लेखन में इस प्रकार की भाषा शैली ही उत्तम तथा अनुकूल रहती है।
4 विचारों के क्रम तथा क्रमबद्धता - निबंध लेखन में ये सावधानी भी अवश्य रखनी पड़ेगी कि सम्यक विचार प्रवाह क्रमानुसार होना चाहिए उनके क्रमों में बिखराव आया तो निबंध का आकर्षण भी भावों के क्रम के बिखराव के चलते बिखर जाएगा अतः क्रम का हमें विशेष ध्यान रखना पड़ेगा।
5 निबंध की सरलता तथा सजीवता - निबंध लेखन को क्लिष्टता से बचाकर सरल तथा प्रभावी बनाना चाहिए साथ ही इसमें समाहित तथ्य इस प्रकार से स्थापित हों जो इसे सजीव बना कर दर्शाने के लिए पर्याप्त हों अर्थात बोलता हुआ निबंध अपना प्रभाव अलग ही दर्शाता है। 
6 विषयान्तर का त्याग - निबंध लेखन में मुख्य केंद्र बिंदु पर ध्यान केंद्रित रखना आवश्यक है पास पड़ोस के विषय सदैव वर्जित रखने चाहिए। 
7 पुनरावृत्ति का बहिष्कार - किसी पंक्ति में कोई एक कथन अच्छा आ गया है तो उसे बार-बार कहने से बचना चाहिए। पुनरावृत्ति दोष मुक्त लेखन ही प्रभावी लेखन कहा जाता है। 
निबंध लेखन की ये बातें तो हुई कला पक्ष की  

भाव पक्ष - आइये अब जानते हैं निबंध लेखन के द्वितीय पक्ष भाव पक्ष के विषय में ....
1 नूतन विचार - पहले कही हुई बातों को ही दोबारा कहना नव्यता नहीं हो सकती अतः निबंध में जितने नूतन विचार होंगे निबंध उतना ही आकर्षक तथा प्रभावी होगा। 
2 व्यक्तित्व का ठप्पा - निबंध में व्यक्तित्व का ठप्पा अलग से दिखना चाहिए। यह नियम विषय और लेखक दोनों पर ही लागू होता है 
3 मौलिकता - निबंध लेख लेखक का मौलिक लेख होना चाहिए। 
4 प्रभावोत्पादक - निबंध लेख प्रभावोत्पादक बनाने के भी अन्य भाग हो सकते हैं । सच पूछो तो कला और भाव पक्ष भी प्रभावोत्पादक के ही उप शीर्षक हो सकते हैं और इनसे पृथक भी इस विशेष गुण के लिए ही आज इस विशेष विषय का चयन किया गया है। 
5 कल्पना प्रवणता - यथार्थ के साथ-साथ कल्पित भावों की प्रकृति के मिश्रण से ही निबंध असरकारक दिखाई देता है।

निबंध लेख के दोनों पक्षों को हमने जितनी सरलता से समझा है आइये अब उतनी ही सरलता इसके मुख्य चार अंगों को भी समझते हैं 
निबंध के मुख्य चार अंग शीर्षक, प्रस्तावना, विस्तार, उपसंहार आदि निश्चित किए गए हैं। सबसे पहले जानते हैं शीर्षक के विषय में ... 
1 शीर्षक - निबंध का शीर्षक कुछ इस प्रकार से आकर्षक होना चाहिए जिससे पाठक वर्ग में निबंध लेख को पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न हो जाए। 
2 प्रस्तावना - जिस प्रकार से किसी भी भवन का निर्माण कार्य उसकी नींव से प्रारम्भ होता है ठीक उसी प्रकार निबंध लेखन का प्रारम्भ भी प्रस्तावना से ही होता है यही प्रस्तावना भूमिका भी कहलाती है। भूमिका  अत्यंत रोचक और आकर्षक होनी चाहिए परन्तु यह बहुत लम्बी नहीं होनी चाहिए। भूमिका का सार कुछ इस प्रकार की होना चाहिए जो विषयवस्तु की झलक प्रस्तुत करे। 
3 विस्तार - निबंध लेखन के इस अंग को महत्वपूर्ण अंग कहा जाता है जहाँ विचारों का विकास होता है। यह निबंध का सर्व प्रमुख अंश है। इस अंग का संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि इसी अंग में निबंध लेखक विषय के प्रति अपना विशेष दृष्टिकोण प्रकट करता है। 
4 उपसंहार - निबंध की समाप्ति को ही उपसंहार कहा जाता है यह समापन एक निश्चित क्रम तथा आकृति के साथ होता है। इस अंतिम अंग में निबंध लेखक अपना जो भी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है उसे उपदेश, दूसरे के विचारों को उद्घृत कर या कविता की पंक्ति के माध्यम से निबंध समाप्त कर सकता है।

निबंध क्या है ?
निबंध का अर्थ है विचारपूर्ण लेख। संस्कृत भाषा का यह शब्द जिसका शाब्दिक अर्थ 'संवार कर सीना' ऐसे भी लिया जाता है। जानकारों के हिसाब से प्राचीन काल में हस्तलिखित ग्रंथों को संवार कर लिखा जाता था और इस प्रक्रिया को निबंध कहते थे कालांतर के बाद इसका प्रयोग उन ग्रंथों के लिए होने लगा जिनमें विचारों को बांधा जाता था। निबंध मात्र साहित्यकारों के मन में उठने वाले विचारों की अभिव्यक्ति नही अपितु लेखक के व्यक्तित्व को प्रकाशित करने वाली ललित गद्य-रचना है। निबंध को अंग्रेजी में 'एस्से' कहा जाता है। परंतु इसका रूप इतना विस्तृत है कि उसकी सटीक परिभाषा करना अत्यंत कठिन है। 

बाबू गुलाब राय के अनुसार - "निबंध सीमित आकर वाली वह रचना है जिसमें विषय का प्रतिपादन, निजीपन, स्वच्छता, सौष्ठव, सजीवता एवं आवश्यक संगति तथा संबद्धता के साथ किया जाता है। इन विशेषताओं के अतिरिक्त निबंध में बुद्धि और हॄदय के योग को भी आवश्यक माना गया है।

अच्छे निबंध में निहित महत्वपूर्ण विशेष गुण सर्वविदित हैं जो इस प्रकार से हैं एक अच्छे निबंध में कसावट, प्रभावशाली भाषा, विषयानुकूलता, निबंध में विचार और भाषा दोनों में ही कसावट का गुण होना चाहिए। उद्धरणों की भाषा कभी भी बदलनी नहीं चाहिए। 
निबंध का अर्थ ही है भली भांति बंघा हुआ या कसा हुआ। विराम चिन्हों का समुचित प्रयोग आवश्यक है। विचार बिखरे न हों। चयनित विषय पर चिंतन मनन का लेख ही निबंध है। विचारों में एक शृंखला हो जो क्रमबद्ध हो। विचारों में संतुलन हो अर्थात् प्रमुख बातों पर अधिक महत्व एवं गौण बातों को कम महत्व देना चाहिए। निबंध स्पष्ट होना चाहिए। निबंध में बदलती हुई विषय-सामग्री के अनुसार पैरे बदलने चाहिए। 

निबंध कितने प्रकार के होते हैं ?
आइये अब जानते हैं सबसे अहम बात कि निबंध कितने प्रकार के होते हैं निबंध के प्रकार के हैं- 
वर्णनात्मक निबंध, विवरणात्मक निबंध, भावात्मक निबंध, साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध 
1 वर्णनात्मक निबंध - इन निबन्धों में निरूपण अथवा व्याख्या की प्रधानता रहती है। विभिन्न प्रकार के दृश्यों, घटनाओं तथा स्थलों का आकर्षक वर्णन करना ही इन निबन्धों का कलेवर - विषयवस्तु होता है। इन निबन्धों की अन्य विशेषता यह है कि- यहाँ प्राय: प्रत्येक निबंधकार अपने निबंध में एक सजीव-चित्र उपस्थित करता है। तीर्थ, यात्रा, नगर, दृश्य-वर्णन, पर्व-त्यौहार, मेले-तमाशे, दर्शनीय-स्थल आदि का मनोरम एवं संश्लिष्ट वर्णन करना ही निबंधकार का प्रमुख उद्देश्य होता है। इनमें लेखक प्रकृति और मानव-जगत् में से किसी से भी विषय चयन कर सर्वसाधारण के लिए निबंध-रचना करता है। 
2 विवरणात्मक निबंध - विवरणात्मक निबन्धों में कल्पना एवं अनुभव की प्रधानता होती है। साथ ही इस वर्ग के निबन्धों में वर्णन के साथ-साथ विवरण की प्रवृत्ति भी विद्यमान रहती है। इन्हें कथात्मक अथवा आख्यानात्मक निबंध भी कहा जाता है। विवरणात्मक-निबन्धों की विषयवस्तु मुख्यत: जीवनी, कथाएँ, घटनाएँ, पुरातत्त्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधृत होती है। ये निबंध ‘व्यास-शैली’ में लिखे जाते हैं। 
3 भावात्मक निबंध - भावात्मक-निबन्धों में बुद्धि की अपेक्षा रागवृत्ति की प्रधानता रहती है। इनका सीधा सम्बन्ध ‘हृदय’ से होता है। अनुभूति, मनोवेग अथवा भावों की अतिशय अभिव्यंजना इन निबन्धों में द्रष्टव्य है। इन निबन्धों में निबंधकार सहृदयता, ममता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त व्यवहार को प्रकट करता है।
4 साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध - किसी साहित्यकार, साहित्यिक विधा या साहित्यिक प्रवृत्ति पर लिखा गया निबंध साहित्यिक या आलोचनात्मक निबंध कहलाता है, जैसे मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिन्दी कविता, छायावाद हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग आदि। इसमें ललित निबंध भी आते हैं। इनकी भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है। ऐसे निबंध शोध पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।

हिंदी निंबध साहित्य को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जाता है -
भारतेंदुयुगीन निबंध, द्विवेदीयुगीन निबंध, शुक्लयुगीन निबंध, शुक्लयुगोत्तर निबंध एवं, सामयिक निबंध-1940 से अब तक जो निबंध लिखे जा रहे हैं ललित निबंध के विषय में रमेशचंद्र शाह ने कहा है कि "ललित निबंध वस्तुतः आत्मनिबंध हैं" वहीं निबंध का इतिहास खोजने का प्रयास किया जाता है तब हमारे समक्ष "हिंदी के प्रथम निबंध के रूप में राजा भोज का सपना (1839 ई.) का उल्लेख मिलता है।" लगभग 180 वर्ष पुराना इतिहास मिला है। "सदासुखलाल के ’सुरासुरनिर्णय’ के आधार पर इन्हें हिंदी का प्रथम निबंधकार माना जाता है।" निबंध का एक और रूप "प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों के रूप में प्रकट होता है जिनमें हास्य, व्यंग्य, चुहलबाजी, चुटकी, आक्षेप, हार्दिकता का अद्भुत पुट विद्यमान है। प्रतापनारायण मिश्र के निबंध फक्कङपन एवं हास-परिहास से परिपूर्ण है।" निबंध विधा को देखते हुए जब और आगे बढ़ते हैं तब हम देख और समझ पाते हैं कि "बालमुकुन्द गुप्त भारतेन्दु और द्विवेदी युग के बीच की महत्त्वपूर्ण कङी है, जिनके पत्रात्मक-शैली के निबंधों में व्यंग्य की मार है। शिवशंभु के चिट्ठे ’भारतमित्र’ में 1904-05 ई. में प्रकाशित हुए थे, जो लार्ड कर्जन को लेकर लिखे गये थे।"
"चंद्रधर शर्मा ’गुलेरी’ ने इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व, भाषा इत्यादि पर गवेषणात्मक निबंध लिखे हैं।" जबकि एक और दृष्टिकोण से हम पाते हैं कि "भारतेन्दु-युग के बहुचर्चित निबंधों में कालिदास की सभा (बालकृष्ण भट्ट), स्वर्ग की विचार सभा (भारतेन्दु), यमलोक की यात्रा (स्वप्न-शैली में राधाचरण गोस्वामी द्वारा रचित), भारतखंड की समृद्धि (लाला श्रीनिवास ) इत्यादि है।" 

क्या निबंध में तत्व भी होते हैं?
जी हाँ जिस प्रकार से मानव जीवन के लिए आवश्यक पाँच तत्व हैं ठीक उसी प्रकार निबंध के लिए भी इसके तत्व आवश्यक हैं एक निबंध में मुख्य रूप से 3 तत्व होते हैं जो इस प्रकार के बताए गए हैं 
1 लेखक का व्यक्तित्व - निबंध विधा में निबंध लेखक की विचारधारा और उसके व्यक्तित्व की झलक का दर्पण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 
2 वैचारिक और भावनात्मक आधार - निबंध विचारों और भावों के समूह का वह वर्ग है जो अपने भीतर से शीर्षक से संबंधित विचारों और भावों का शीतल मनोहारी झरना सा बहा कर उसमें स्नान करने वाले पाठक की आत्मा तक आहट दे सके। 
3 भाषा शैली - सरल सरस प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। जिससे पाठक को पढ़ने में आनंद प्राप्त हो वह मध्य में छोड़ कर अगले निबंध पर जब तक न जाये जब तक उपसंहार से परिचित न हो जाये।
इन तीनों की परिभाषा भिन्न - भिन्न हो सकती है परंतु उद्देश्य स्पष्ट है कि निबंध विधा को साहित्यिक दृष्टिकोण से शुद्ध लिखा जा सके ...

संजय कौशिक 'विज्ञात'