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Saturday, February 29, 2020

नवगीत वेदना अपनो की संजय कौशिक ' विज्ञात



नवगीत
वेदना अपनो की
संजय कौशिक ' विज्ञात

मापनी ~~ 16/14

लता लता को खाना चाहे,
कहीं कली को निगले।
संस्कृति के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों से निकले।

1
तपती धरणी के कण व्याकुल,
सभी कणों को तपा रहे।
तने शाख से त्रस्त हुए हैं,
वृक्ष दर्द कुछ बोल कहे।
देख कहाँ फल संभावित हैं,
बीज घुणों का त्रास सहे।

ऐसे कीट लगे हैं कितने,
तले देख नूतन उपले।
संस्कृति के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों से निकले।

2
ग्रास बने हैं नेक यहाँ पर,
चन्द्र सूर्य भी कहाँ बचे।
नभ मण्डल में सब लालायित,
चमक दमक जो खास रचे।
किरण किरण पर भारी देखी,
तिमिर तिमिर के उदर पचे।

लोहे को लोहा काटे जब,
चीत्कारें कितनी उगले
संस्कृति के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों से निकले।


संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत समर्पण संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
समर्पण 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

मापनी ~~ 14/14 

फिर समर्पण के बिना भी, 
प्रीत पूरी कौन कहता।
देख कलियों में भ्रमर के, 
गान गुंजन स्नेह महता।

1
प्रीत का यह रूप पावन,
जो बहुत ऊँचा बताया।
कृष्ण धारे मुरलिया को, 
भाव राधा ने दिखाया।
फिर छिटक नभ से धरा पर, 
लहलहाई चांदनी जब
चातकी कुछ बोलती है, 
चांद देखो मौन रहता।

स्वाति की अनुपम कथा सुन, 
सीप में मोती चमकता।
बादलों से प्रीत निभती, 
मूसलाधारी बरसता।
नेह गरजे मोर नाचे, 
इंद्रधनुषी बन निखरता।
सीख लेता सागरों से,
धड़कनों के साथ बहता।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Friday, February 28, 2020

नवगीत इक शिखण्डी चाहिये संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
इक शिखण्डी चाहिये
संजय कौशिक 'विज्ञात' 


मापनी 12/12 

आज जीने के लिये 
इक शिखण्डी चाहिये
मातृ नारी शक्ति का
रूप चण्डी चाहिये

1 
आधुनिक शिक्षा मिले, 
कार्य हों सरकार के।
नौकरी पद प्राप्त हों, 
योग्यता आधार के। 
छीन ले अधिकार से, 
बस घमण्डी चाहिये।
मातृ नारी शक्ति का,
रूप चण्डी चाहिये।

2
भावना दृढ़ ले हृदय, 
कष्ट से दे मुक्ति है।
रुद्र को जो मानती, 
हिय शिवा की युक्ति है।
और लहरे वायु में, 
हाथ झण्डी चाहिये।
मातृ नारी शक्ति का,
रूप चण्डी चाहिये।

3 
राम सीता से चरित,
कल्पना साक्षात हों।
मुक्त हो पाषाण से, 
आज नारी व्याप्त हों।
फिर सुना दे जो कथा, 
खग भुशुण्डी चाहिये।
मातृ नारी शक्ति का,
रूप चण्डी चाहिये।

4
यातनाएँ झेलती, 
आज चिंतन कुछ करो। 
अम्ल की वर्षा सहे, 
दुख सुता के मिल हरो।
नाद घर-घर गूंजती, 
फिर त्रिखण्डी चाहिये।
मातृ नारी शक्ति का,
रूप चण्डी चाहिये।

5 
कुप्रथाएँ भीष्म सी, 
मुक्त होंगे फिर सभी।
कर नहीं वो अस्त्र ले, 
शस्त्र बनके खुद अभी।
और फिर प्रतिशोध ले, 
लौ अखण्डी चाहिये।
मातृ नारी शक्ति का,
रूप चण्डी चाहिये।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Thursday, February 27, 2020

नवगीत वैमनस्य संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत 
वैमनस्य 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मुखड़ा/पूरक पंक्ति ~~ 16/15 
अंतरा ~~ 16/15 

वैमनस्य का कारण ढूंढो, 
झांक जरा भीतर की ओर।
रूप भले है देख सिपाही, 
अन्तस् बैठा उसके चोर।

1 
रौंद रहे हैं पैर करों को, 
दृश्य बनाकर सेवा भाव।
इसकी टोपी उसके सिर पर, 
लोग उछालें करके चाव।
तैर रही सागर में नौका, 
देख नदी में डूबे नाव।
अन्य (गैर) बने हैं औषध सबके, 
अपने देते रिसते घाव।

पाखण्ड करें षड्यंत्र रचें, 
चहुँ दिश देखो उनका शोर।
वैमनस्य का कारण ढूंढो, 
झांक जरा भीतर की ओर। 

2
हाथ बढ़े जब हाथ कटे तब, 
लोग निराली चलते चाल।
अपनेपन में भूखों मरते, 
देख कहाँ है रोटी दाल।
ये विपरीत बयार दिशा से,
बहती है नित बहता काल।
मीन फँसी भी ले बह जाये, 
मछुआरों का फैला जाल।

फिर प्रतिशोध कहाँ पर किससे, 
किसकी बाजू में ये जोर।
वैमनस्य का कारण ढूंढो, 
झांक जरा भीतर की ओर। 

3
सेठ दबाये पाँव जहाँ पर,
ऐसे ठाठ करे मजदूरी। 
बाल श्रमिक ने फोड़े पर्वत, 
कौन कहे उनकी मजबूरी।
पेट कराये नर क्या करले, 
चंदा की है कितनी दूरी।
एक समाज नही शोषक का,
झूठी गाथा शोषण पूरी।

रक्त नयन से कौन बहा दे, 
कौन सके आत्मा झकझोर।
वैमनस्य का कारण ढूंढो, 
झांक जरा भीतर की ओर। 

संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत चीर तिमिर की छाती / अवलंब संजय कौशिक 'विज्ञात'




नवगीत 
चीर तिमिर की छाती / अवलंब
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 16/14 

चीर तिमिर की छाती को अब 
सूरज उगने वाला है। 
रात व्यथा की बीत गई सुन 
निश्चित भोर उजाला है।

कुम्भकार का चाक चले यूँ, 
काल चक्र का फेरा है।
लगे थपेड़े मिट्टी पर जब,
घट बन पाता तेरा है।
कर्मवीर से जीत सका कब 
बन्द भाग्य का ताला है।
चीर तिमिर की छाती को अब 
सूरज उगने वाला है।

पवन पराक्रम नित्य दिखाये, 
ऐसे ही बढ़ जाना है।
सूर्य अर्चि कर ग्रहण प्रेरणा, 
जग को यूँ चमकाना है।
शीत पूर्णिमा सी औषध बन, 
हरना हिय का छाला है। 
चीर तिमिर की छाती को अब 
सूरज उगने वाला है। 

मर्यादित रह सागर जैसे, 
भले क्रोध जब आ जाये।
अडिग हिमालय सा गुण लेना, 
गुंजित घाटी समझाये।
चुभन नहीं भूलो शूलों की,
जिन टीसों ने पाला है।
चीर तिमिर की छाती को अब 
सूरज उगने वाला है। 

संजय कौशिक 'विज्ञात'

@vigyatkikalam

Monday, February 24, 2020

नवगीत टूटे पंख संजय कौशिक 'विज्ञात'





नवगीत
टूटे पंख 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी 16/16

टूटे पंखों से लिखदूँ मैं, 
बना लेखनी वो कविता।
भावों में तो श्रेष्ठ बनेगी, 
पृष्ठ बहेगी मसि सरिता॥ 

1
स्वर व्यंजन की बगिया से कुछ,
शब्द सुगंधित फूटेंगे। 
पुष्प बनेंगे सभी अंतरे,
भाव भ्रमर बन टूटेंगे। 
और चमत्कृत अलंकार से, 
अलि केसर रस लूटेंगे। 
सुनकर गुंजन गान बाग में, 
कोयल से स्वर छूटेंगे।

नेह बयार प्रवाहित होगी,
रश्मि खिलेगी बन सविता।
टूटे पंखों से लिखदूँ मैं, 
बना लेखनी वो कविता।

2
भेड़चाल के मार्ग मिटाकर, 
नई डगर सब पालेंगे।
दिवस सूर्य तो रात चन्द्र से, 
राह पथिक अपनालेंगे।
राग मेघ से सीख मल्हारी, 
बाजे सुर में गालेंगे।
और समय की ताल कहरवा, 
दादर सभी बजालेंगे।

ये अनुपम संगीत साधना, 
अंतःकरण बने क्षमिता।
टूटे पंखों से लिखदूँ मैं, 
बना लेखनी वो कविता।

3
नवधा रस से रहे प्रभावित, 
कलम सदा ही गीतों में।
सौहार्द प्रेम की ज्योत जले, 
हृदयंगम सी रीतों में।
प्रस्फुटित हुये संबंध खिलें, 
लिख स्वर्णाक्षर भीतों में। 
और प्रमोद खिले बन क्यारी, 
हारे कंटक जीतों में।

श्री गणेश करने को आतुर, 
चूंट चुका पावन हरिता।
टूटे पंखों से लिखदूँ मैं, 
बना लेखनी वो कविता।

संजय कौशिक 'विज्ञात' 

@vigyatkikalam

सवैया विधान और उदाहरण संजय कौशिक 'विज्ञात'


सवैया 
संजय कौशिक 'विज्ञात' 

सवैया एक वर्णिक छंद है। जिसे मुख्यतया गणों के माध्यम से लिखा जाता है। आइये समझते हैं जिन सवैया को मैंने लिखा उनके गण भी समझेंगे 


1
सुमुखि सवैया


विधान
सुमुखि सवैया सात जगण और लघु-गुरु से निर्मित होता है। इस छंद में 11, 12 वर्णों पर यति रखी जाती है। मदिरा सवैया छंद के आदि में एक लघु वर्ण जोड़ने से इस छंद का शिल्प विधान कहा जाता है।

उदाहरण-
अनेक प्रकार विवेक कहे, कहते-सुनते यह ज्ञान मिले।
कुमित्र कहाँ पर दे डुबवा, फिर नाव मिले न निशान मिले॥ 
सुमित्र यहाँ पर हैं कम ही, जिनसे अपनापन मान मिले।
न बात कहो सुनले मन की, फिर मान बढ़े पहचान मिले॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
2
मत्तगयन्द सवैया

विधान 
मत्तगयन्द सवैया 23 वर्णों का छन्द है, जिसमें सात भगण (ऽ।।) और दो गुरुओं का योग होता है। नरोत्तमदास, तुलसी, केशव, भूषण, मतिराम, घनानन्द, भारतेन्दु, हितैषी, सनेही, अनूप आदि ने इसका प्रयोग किया है।
विधान- *मत्तगयंद सवैया*
भगण ×7+2गुरु, 12-11 वर्ण पर यति चार चरण समतुकान्त।

उदाहरण-
कंकर-कंकर को कहते सब, शंकर देव समान हमारे।
नर्मद से निकले जितने जब, पूजन के अधिकार विचारे॥ 
भाव बिना भगवान कहाँ यह, सत्य कहूँ सब तथ्य पुकारे।
साफ रखो हिय प्रेम दिखे फिर, ये सुख सागर नाथ सहारे॥

संजय कौशिक "विज्ञात"
3
दुर्मिल सवैया
विधान
दुर्मिल सवैया छंद 24 वर्णों में आठ सगणों (।।ऽ) से सुसज्जित होता है। जिसमें 12, 12 वर्णों पर यति का प्रयोग किया जाता है। अन्त सम तुकान्त ललितान्त्यानुप्रास कहा जाता है। इस छन्द को तोटक वृत्त का दुगुना कहा जाता है। प्रायः इस छंद का लेखन  केशव, तुलसी से लेकर रीतिकाल तथा आधुनिक कवियों द्वारा बहुत ही सुंदरता से किया जाता है ।

उदाहरण-
प्रतिबिम्ब खड़ा दिखता मुखड़ा, सरदार पुरातन आन खड़ा।
यह सम्मुख मानव नेक दिखा, नव देश सशक्त विशेष घड़ा॥
अनुशासन और प्रशासन का, अनुपालक एक विधान कड़ा।
यह भारत रत्न प्रमाणिक है, तब भारत ने निज भाल जड़ा॥ 

संजय कौशिक 'विज्ञात'
4
किरीट सवैया

विधान
किरीट सवैया नामक छंद आठ भगणों से बनता है। तुलसी, केशव, देव और दास ने इस छन्द का प्रयोग किया है। इसमें 12, 12 वर्णों पर यती होती है।

उदाहरण-
जीवन कोजल धार कहें सब, काम करो कुछ तो मन भावन।
देख अपुष्पक पादप ये अब, जो ठहरे कह हो वह पावन॥ 
सीख मिले कुछ उत्तम ही जब, और निरंतर हो बस सावन।
आज बना चल चित्र मनोहर, लोग कहें बस देख सुहावन॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
5
गंगोदक सवैया

विधान
गंगोदक सवैया को लक्षी सवैया भी कहा जाता है। गंगोदक या लक्षी सवैया आठ रगणों से छन्द बनता है। केशव, दास, द्विजदत्त द्विजेन्द्र ने इसका प्रयोग किया है। दास ने इसका नाम 'लक्षी' दिया है, 'केशव' ने 'मत्तमातंगलीलाकर'।

उदाहरण-
देखके वो भिखारी खड़ा आज है, और वो पात्र भिक्षा न ही खोलता। 
आज निश्चेष्ट देखा उसे द्वार पे, जो मरा सा पड़ा है न ही डोलता।
आँख आँसू भरी देह घावों लिये, कृष्ण का नाम बोले लगे तोलता।
द्वारिका धीश है मित्र मेरा कहे, नाम पूछा सुदामा यही बोलता।

संजय कौशिक 'विज्ञात'
6 
मुक्तहरा सवैया

विधान
मुक्तहरा सवैया में 8 जगण होते हैं। मत्तगयन्द आदि - अन्त में एक-एक लघुवर्ण जोड़ने से यह छन्द बनता है; 11, 13 वर्णों पर यती होती है। देव, दास तथा सत्यनारायण ने इसका प्रयोग किया है।

उदाहरण-
कहाँ मकरंद बता मधु है, भँवरा यह पूछ रहा सब आज।
कली सुन शोर तभी खिलती, सब देख रहा यह सभ्य समाज। 
पधार रहे अब कौन यहाँ, बगिया महके किसके कह काज।
तभी कवि देख कहे कविता, उमड़े बन प्रेम कली रस राज॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
7
वाम सवैया

विधान
वाम सवैया के मंजरी, माधवी या मकरन्द अन्य नाम हैं। यह 24 वर्णों का छन्द है, जो सात जगणों और एक यगण के योग से बनता है। मत्तगयन्द के आदि में लघु वर्ण जोड़ने से यह छन्द बन जाता है। केशव और दारा ने इसका प्रयोग किया है। केशव ने मकरन्द, देव ने माधवी, दास ने मंजरी और भानु ने वाम नाम दिया है।

उदाहरण-
प्रसंग विधान अनेक प्रकार, प्रचारित ये सरकार करे है।
विशाल समाज सुधार सुमार्ग, प्रसारित ये हर बार करे है॥
उमंग तरंग तिरंग प्रमाण, प्रभासित नित्य पुकार करे है। 
सुशासित राज प्रशासित कार्य, प्रधान सदा उपकार करे है॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
8
अरसात सवैया

विधान
अरसात सवैया 24 वर्णों का छन्द 7 भगणों और रगण के योग से बनता है। देव और दास ने इस छन्द का प्रयोग किया है।

उदाहरण-
कावड़ लेकर शंकर की जय, आज कतार दिखें चहुँ ओर है।
ये करते बम जै बम गाकर, और उमा जय आत्म विभोर है॥ 
मस्त रहें सब भाव बनाकर, वृद्ध विशेष प्रभाव किशोर है।
बालक कावड़ ले महिला सब, भावन चातक भक्त चकोर है॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
9
सुंदरी सवैया 

विधान
सुन्दरी सवैया छन्द 25 वर्णों का है। इसमें आठ सगणों और गुरु का योग होता है। इसका दूसरा नाम माधवी है। केशव ने इसे 'सुन्दरी' और दास ने 'माधवी' नाम दिया है। केशव[1], तुलसी [2], अनूप[3], दिनकर[4] ने इस छन्द का प्रयोग किया है।

उदाहरण-
स्वर का तुझको जब ज्ञान नहीं, फिर व्यर्थ कहाँ मुख खोल रहा तू।
यह गायन दुर्लभ है सुनले, श्रम के बिन क्यों अब बोल रहा तू। 
पहले करले कुछ कर्म जरा, बिन कर्म कहाँ सब तोल रहा तू। 
स्वर कोयल बाग सुने सब ही, रस काग कहाँ यह घोल रहा तू।

संजय कौशिक 'विज्ञात'
10
अरविन्द सवैया 
विधान
अरविन्द सवैया आठ सगण और लघु के योग से छन्द बनता है। 12, 13 वर्णों पर यति होती है और चारों चरणों में ललितान्त्यानुप्रास होता है।

उदाहरण-
भँवरा फिर पाटल से पलटा, करती तितली कुछ सोच विचार
भर पेट चला मकरंद कहाँ, वह टोक रही तब बोल पुकार
बदले कितने कह आज तुम्ही, यह शोभित लोक कहाँ व्यवहार 
कुछ बात करो अपनी कहके, सुन मैं कह दूँ  हिय चाह अपार

संजय कौशिक 'विज्ञात'
11
मानिनी सवैया 

विधान
मानिनी सवैया 23 वर्णों का छन्द है। 7 जगणों और लघु गुरु के योग से यह छन्द बनता है। वाम सवैया का अन्तिम वर्ण न्यून करने से या दुर्मिल का प्रथम लघु वर्ण न्यून करने से यह छन्द बनता है। तुलसी और दास ने इसका प्रयोग किया है।

उदाहरण-
दहाड़ रहे बढ़ते फिर से, यह सैनिक सिंह समान सभी। 
पड़े जब कानन गर्जन तो, फिर राह मिले उस काल तभी॥ 
प्रसिद्ध रहे बल शौर्य जहाँ, सदियों पहले सुन बात कभी। 
पुरातन वो दिखता बढ़ता, वह शौर्य यहाँ हर हाल अभी॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
12
महाभुजंगप्रयात सवैया

विधान
महाभुजंगप्रयात सवैया 24 वर्णों का छन्द कहा जाता है, यह छंद आठ यगणों (122) के द्वारा लिखा जाता है। इसे भुजंगप्रयात छंद का दुगुना छन्द कहा जाता है तभी इसका नाम महाभुजंगप्रयात छंद पड़ा है। इस छंद में 12, 12 वर्णों पर यति रखी जाती है।

उदाहरण-
जहाँ आज दीवार देखी घरों में, मुझे लाज आई व आँखें झुकी हैं।
वहाँ शेष आशा निराशा दिखी है, नहीं खास बातें सभी जा चुकी हैं॥
जवानी करे जुल्म ऐसे यहाँ पे, बुढापा रहा देख सांसें रुकी हैं।
मरे मौत सौ सौ मरे भी नहीं हैं, बताएं सभी दोष ये कामुकी हैं॥ 

संजय कौशिक 'विज्ञात'
13 
*सुखी सवैया*


विधान
सुखी सवैया नवीन सवैया 8 सगण+लघु लघु से बनता है; 11, 14 वर्णों पर यति होती है। सुखी सवैया 8स+2ल के लिखने से यह छन्द बनता है।

उदाहरण-
अपमान करें कुछ लोग जहाँ, तब देख विकार विचार किया कर।
चुप क्यों रहना हर बार वहाँ, फिर उत्तर भी सब आप दिया कर॥
जब आहत वे करते तुमको, उनसे बदला हर एक लिया कर। 
फिर त्याग सदा मन से उनको, मनभावन जीवन शेष जिया कर॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'
14
*मदिरा सवैया*

विधान 
मदिरा सवैया में 7 भगण (ऽ।।) + गुरु से यह छन्द बनता है, 10, 12 वर्णों पर यति होती है।

उदाहरण-
रूप शशांक कलंक दिखा, पर शीतल तो वह नित्य दिखा।
और प्रभा बिखरी जग में, इस कारण ही यह पक्ष लिखा॥ 
खूब कला बढ़ती रहती, तब जीत गई फिर चंद्र शिखा।
आँचल में सिमटी उसके, तब विस्मित देख रही परिखा॥

संजय कौशिक 'विज्ञात'