योग दिवस
संजय कौशिक 'विज्ञात'
अनन्द छंद
विधान~[ जगण रगण जगण रगण+लघु गुरु]
(121 212 121 212 12)
14 वर्ण,4 चरण, दो-दो चरण समतुकांत]
करें प्रयोग योग जो रहें निरोग हैं ।
सहे वियोग लोग भोग संग रोग हैं ।।
न धारणा बिना शरीर साधना रहे ।
सुयोग ब्रह्मचर्य तेज ये बना रहे ।।
प्रसार खींच कीजिये न प्राण वायु का ।
विशेष तथ्य प्राण वायु सार आयु का ।।
प्रभात में प्रणाम सूर्य नित्य कीजिये ।
हँसें सदैव जोर से उमंग लीजिये ।।
शरीर स्वस्थ जो रहे सहस्र काम हों
प्रमेह रक्त चाप और क्यों जुकाम हों
दिखो जवान हृष्ट पुष्ट वृद्धता न हो ।
लगे निखार आपके ललाट पे अहो!
अनंत चेतना सुझाव आत्म गूढ़ से ।
पढ़े लिखे न मानते जवाब रूढ़ से ।।
विशुद्ध योग मूल लक्ष्य ज्ञान मान लो ।
प्रभाव ध्यान से बढ़े बहाव जान लो ।।
संजय कौशिक 'विज्ञात'


