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Thursday, December 9, 2021

नवगीत : नव्यता नवगीत पनपे : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत 
नव्यता नवगीत पनपे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी - 14/14

नव्यता नवगीत पनपे
लेखनी फिर झूम नाचे
छंद नूतन अर्थ गहरे
मापनी भी खूब माचे।।

तेग नंगी चाल दुष्कर 
और ठहरी ये दुधारी
छंद लिखना कब सहज है
भाव काटे एक आरी
शिल्प मर्यादा कठिन कुछ
मेटते ये शब्द खाचे।।

ये मनोरम बिम्ब चमके
बोलते से नित कथाएँ
व्यंजना की ढाल लेकर 
यूँ व्यथित हैं सब व्यथाएँ
तथ्य ले संकेत निखरे
काटते हैं देख काचे।।

लय मधुर मनभावनी सी
गेयता के राग पाती
सुप्त से अंतःकरण में
झनझनाहट सी जगाती
ताल सुर संगीत लेकर
नव्यता नवगीत बाचे।।

खाचे - कीचड़
बाचे - पढ़ कर बोलना 
काचे - आनंद 
माचे - प्रफुल्लित होना 
नाचे - नाचना 

#संजयकौशिक'विज्ञात'

Thursday, November 25, 2021

नवगीत : शब्दशक्ति : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
शब्दशक्ति
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~14/12

सप्त सुर में गूँजती सी
काव्य की अनुपम छटा
नौ रसों के भाव नूतन
यौवना बाँधे जटा।।

तुक वसन तन पर निखरता
कामनी सी दंग करती
बिन तुकों की धार लज्जा
ओढ़नी सिर ओढ़ मरती
शब्द से शृंगार लेकर
अर्थ की उलझी लटा।।

ले गणित का ज्ञान गहरा
श्रेष्ठ विद्योत्मा यही है
हारते काली जहाँ पर 
बात विदुषी सी कही है
छंद लेखन झट निभाये
शिल्प है ऐसा रटा।।

चित्र यूँ हितकर उकेरे
बिम्ब की अनुपालना से
दोष सारे लक्षणा के
छानती है छालना से
व्यंजना की ये तपस्या
शक्ति रखती जो सटा।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, November 24, 2021

नवगीत : पर्वतों से आह निकली : संजय कौशिक विज्ञात



नवगीत
पर्वतों से आह निकली
संजय कौशिक विज्ञात

मापनी ~ 14/14

पीर के ज्वालामुखी को
देखकर चट्टान पिघली
आँसुओं सी बह गई जब
पर्वतों से आह निकली।।

घात दे आकृति धुँए की
नेत्र भी बहने लगे फिर
दूर हट जा मत तड़प दे
बात वो कहने लगे फिर
ढूँढते ढाँढस फिरे जब 
प्राप्त होते आम इमली।।

शांत वो गरजा गगन भी
धीर बाँधे मेघ न्यारी
पीठ में अपनत्व की यूँ 
देख लंबी सी कटारी
रक्त की बहती नदी सी
हर्ष की यूँ प्यास निगली।।

फट गया धरणी ह्रदय यूँ
आस की हर डोर टूटी
और अन्तस् को व्यथित कर
जब हृदय की कोर लूटी
चंद्र तारे सौर मण्डल
मिल बुझाते आग पिछली।।

संजय कौशिक विज्ञात

नवगीत : पनघटों के गीत प्यारे : संजय कौशिक 'विज्ञात'



नवगीत
पनघटों के गीत प्यारे
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~ 14/14
पाखियों की चहचहाहट
पनघटों के गीत प्यारे
उस रहट की तान गूँजे
तितलियों के राग न्यारे।।

कामिनी की दोघड़ों ने
धार जीवन की भरी जब
ढोल चुपके से मिला यूँ
माट ले सिर पर धरी जब
धुन बजा कर राग उत्तम
तू पुनः आना पुकारे।।

पाँव पनिहारिन धरे यूँ
देह लेकर फिर लरजती
दो घड़ों का भार तन पर 
चाल उसकी और जमती
भोर लाली वारती सी
यूँ ठहरती सी निहारे।।

हर्ष घड़ियाँ प्रिय लगी यूँ
और आकर्षण निखरता
कर चला नभ और वंदन
जब उजाला सा बिखरता
कुछ भ्रमर जब झूमते से
तब चले गा बाग द्वारे।।

संजय कौशिक 'विज्ञात'

Saturday, November 6, 2021

नवगीत : पीर अन्तस् की उगलती : संजय कौशिक 'विज्ञात'


नवगीत
पीर अन्तस् की उगलती 
संजय कौशिक 'विज्ञात'

मापनी ~14/14

पीर अन्तस् की उगलती 
काँच की चूड़ी चटक से
ये विरह का ज्वारभाटा
घोर तड़पन की खनक से।।

मेंहदी का रंग फीका
यूँ महावर खो चुका अब।
पायलें हो त्रस्त रोई
हर्ष चहुँ दिश का रुका जब।
आज गर्दन भी अकड़ के
यूँ व्यथित सी है चनक से।।

भाव गढ़ते मूर्ति बोले
वो कला भी शांत दिखती
मौन हैं छीनी हथौड़ी
धार से जो क्लांत दिखती
भीग कर आँखें ठहरती
रूप दर्शन की खटक से।।

आग ज्यूँ ज्वालामुखी की
यूँ दहकती बढ़ रही सी
वेदना की लौ भड़कती
कुछ अखरती चढ़ रही सी
हिय नहीं संतुष्टि पाये
दूर प्रिय की इक झलक से।।


संजय कौशिक 'विज्ञात'

Sunday, October 24, 2021

नवगीत : समरसता संदेश : संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवगीत
समरसता संदेश
संजय कौशिक 'विज्ञात'


मापनी~ 16/14

समरसता संदेश तिरंगा
लेकर तन पर चलता है
भारत का अनुपम यह चोला
अनुपमता पर खिलता है।।

शेर हिरण जब एक घाट पर
रह कर के जल पीते हैं
रामराज्य के स्वप्न फलित हो 
दृश्य रूप में जीते हैं
पल-पल के ये बिम्ब निखरते
दर्पण दिखते रीते हैं
इंद्रधनुष के आकर्षण को
रूप हमारा छलता है।।

धन निर्धन की गहरी खाई
भामाशाहों ने पाटी
राज्य लुटा कर अपना स्वर्णिम
खाक गली की नित चाटी
अंग राज ने कुंडल देकर 
फिर निज छाती भी काटी
समरस बनकर रक्त नसों में
गंगा सा बन पलता है।।

सीख पुराणों से नित लेकर
समरसता को पढ़ना है
श्रेष्ठ प्रकृति है मार्ग प्रदर्शक
पग-पग हिम पर चढ़ना है
लालच और विकार सभी से
बचकर आगे बढ़ना है
गढ़ना है हर तालमेल यूँ 
समरस में जो ढलता है।।

धर्म हाट के बाजारों को
मिलकर बंद कराना है
सुप्त विवेक जगा कर अपना
हमको आगे आना है 
एक सूत्र का श्रेष्ठ तिरंगा
धार हृदय में गाना है
जलने दो रिपुओं को धुन से
समरस पर जो जलता है।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'

Wednesday, October 13, 2021

नवरात्रि पर नवदुर्गा विशेष कुण्डलियाँ : संजय कौशिक 'विज्ञात'

नवरात्रि पर नवदुर्गा विशेष कुण्डलियाँ
संजय कौशिक 'विज्ञात'



शैलपुत्री



मैया को सादर नमन, करता जन-जन आज।
मातृ शैलपुत्री सदा, करती मंगल काज।।
करती मंगल काज, भक्ति भक्तों की बनकर।
शक्ति प्रथम यह आदि, खड़ी ममता सी तनकर।।
कह कौशिक कविराय, नहीं डूबेगी नैया।
रक्षक जग की देख, बने केवट भी मैया।।



ब्रह्मचारिणी



देती उत्तम युक्ति की, हितकारी माँ राह।
ब्रह्मचारिणी सब कहें, करती नेह अथाह।।
करती नेह अथाह, शक्ति संयम गुण भरती।
निर्भय कर संतुष्टि, भक्त को मैया वरती।
कह कौशिक कविराय, तमोगुण माँ हर लेती।
ब्रह्मचारिणी रूप, बना उत्तमता देती।।


चंद्रघंटा


पूरी हो हर कामना, चल मैया के द्वार।
मात चंद्रघंटा करे, निज भक्तों से प्यार।।
निज भक्तों से प्यार, हरे वो बाधा सारी।
मिटते ग्रह के दोष, कुंडली चमके न्यारी।।
कह कौशिक कविराय, बुरी लत से रख दूरी।
साधक बनके पूज, सभी इच्छा हों पूरी।।




कुष्मांडा



धारण कर अमरित कलश, रूप स्वर्ण सा पीत।
कुष्मांडा ब्रह्माण्ड की, नवल सृजन की रीत।।
नवल सृजन की रीत, सभी शस्त्रों से शोभित।
यश बल दे ऐश्वर्य, करे भक्तों का माँ हित।।
कह 'कौशिक' कविराय, चराचर जग के कारण।
आदि शक्ति का रूप, सदा करती माँ धारण।।



स्कंदमाता



होकर शेर सवार माँ, हर लेती जो ताप।
देख स्कंदमाता यही, सदा मिटाती पाप।।
सदा मिटाती पाप, मोक्ष माँ उनको देती।
साधक साधें योग, प्रभा बन चमके रेती।।
कह कौशिक कविराय, कालिमा हिय की धोकर।
धर मैया का ध्यान, दास चरणों का होकर।।




कात्यायनी



दानव का मर्दन किया, महिषासुर का अंत।
ये वो माँ कात्यायनी, भजते योगी संत।।
भजते योगी संत, उबारे जग सारे को।
छू सकता है कौन, भला ऐसे पारे को।।
कह कौशिक कविराय, सुनो हे कलि के मानव।
रक्षक माँ है शक्ति, डरें जिनसे हर दानव।।



कालरात्री


खोले इस दिन नेत्र माँ, दृष्टिपात का रूप।
श्रेष्ठ कालरात्री लगे, सुंदर दृश्य अनूप।।
सुंदर दृश्य अनूप, नष्ट रिपुओं को करती।
मन इच्छित वरदान, सदा साधक को वरती।।
कह कौशिक कविराय, उपासक जै जै बोले।
निर्भय सब संतुष्ट, भाग्य के ताले खोले।।



उत्तम माँ की भक्ति है, उत्तम माँ की शक्ति।
देख कालरात्री खड़ी, धारे काल विरक्ति।।
धारे काल विरक्ति, तामसिक बाधा घटती।
तन की व्याधि अनेक, शुभंकारी से हटती।।
कह कौशिक कविराय, रूप रहता ये सप्तम।
अग्नि जंतु जल शत्रु, भागते डर के उत्तम।।



महागौरी




ममता रूप अनूप है, भुक्ति-मुक्ति का गीत।
दिव्य महागौरी यही, उज्ज्वलता की रीत।।
उज्ज्वलता की रीत, चमकता है मुख मण्डल।
अभय सदा दे हाथ, नेह का भरा कमण्डल।।
कह कौशिक कविराय, मंगला देती समता।
हरती भव भय ताप, लुटाकर अपनी ममता।।



सिद्धिदात्री


वेदों ने महिमा कही, कहते सभी पुराण।
श्रेष्ठ सिद्धिदात्री यही, मिलते उचित प्रमाण।।
मिलते उचित प्रमाण, भक्ति करनी सिखलाते।
माँ के गौरव गान, हृदय में नित बस जाते।।
सुन कौशिक कविराय, सुनाये नौ भेदों ने।
मैया के नौ रूप, बताए इन वेदों ने।।

©संजय कौशिक 'विज्ञात'