गीतिका १
अनकही बातें बहुत सी
उन पलों की रह गई।
साँझ सिंदूरी सिसकती
स्मृति-सरस में बह गई।।
१
मंद मृदु मुस्कान मध्यम
मन–मुकुल में नाचती।
व्यंग्य साधे बाण बिन जो
मौन में वो कह गई।।
२
युग-युगों की याचना-सी
साधना में यामिनी।
याद याचक-सी युगों तक
यज्ञ-सी बन दह गई।।
३
आपदाएँ जब बिखरकर
मार्ग को दुर्गम करें।
पीर पर्वत-सी पिघलकर
चोट-सी नित सह गई।।
४
भावनाओं की तरंगें
उठ रही शैवाल-सी।
चित्त को चट्टान करके
वो घृणा फिर ढह गई।।
५
नाद मुरली-सा खनकता
व्योम के कुछ स्वर सजाकर।
लिख रहा ‘विज्ञात’ कविता
राग बनकर यह गई।।
डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’
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गीतिका २
धर अधर पे ऊर्ध्व अपना,
मौन जो होती नहीं।
स्वप्न में करती शिकायत,
जाग के सोती नहीं।।
१
ढूँढती है जो मुझे नित,
हार बैठी खीज में।
हास्य पर हँसती अदा कुछ,
व्यंजना रोती नहीं।।
२
श्वेत वर्णी ओढ़ आँचल,
झाँकती चुप नेत्र से।
यूँ छिपाए भाव अपने,
एक भी बोती नहीं।।
३
अप्सरा पानी भरे नित,
सुंदरी को देख के।
कुछ चुराकर दृष्टि मिलती,
जो हया खोती नहीं।।
४
सीखती हिमखण्ड से वह,
शैलपुत्री रूप में।
प्रेम की मूरत मृदुल सी,
सीप की मोती नहीं।।
५
जाग कर जागृति सिखाती,
मूँद बैठी जो पलक।
रीतियों की बन कसौटी,
व्यर्थ वो ढोती नहीं।।
६
प्रेम से ‘विज्ञात’ सीखे,
रीत का नूतन चलन।
प्रीत की कविता रचे जो,
हर कलम तोती नहीं।।
डॉ० संजय कौशिक ’विज्ञात’