Monday, February 16, 2026

यक्ष प्रश्न प्रतिबिंब का – डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’



यक्ष प्रश्न प्रतिबिंब का

प्रतिबिंब प्रश्न करता ये मेरा 
क्यों पैदा करने को आतुर थे।
मौन हुई अंतस की गहराई
क्षोभ हृदय के उत्कंठातुर थे ।।

वंश अंश की नींव गढ़ी थी 
पितु दादे पड़दादे ने।
सात पीढ़ियाँ करी तिरस्कृत
यक्ष प्रश्न से सादे ने ।।
जन्म विलक्षण कहते थे सब 
लाड लडाने को रोगातुर थे।।

तू है हर विद्या का ज्ञाता 
मुझमें इतना बोध न था
किंतु भाग्य के हर कोने पर
यूँ निष्ठुर अवरोध न था
पुत्र श्रवण की अभिलाषा में हम
नेत्रहीन निर्धन भावातुर थे।।

फिर भी है त्रुटि स्वीकार हमे
पर तू गलती मत करना
वंश अंश की परम्परा के 
झूठे बोझ नहीं मरना 
अपने सुत से आज्ञा ले लेना 
हम तो ढीठ मूढ़ कामातुर थे।।

डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात‘

देख गाँव ये... डॉ. संजय कौशिक ’विज्ञात’

शीर्षक - देख गाँव ये...

डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'

स्थाई ✍️
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)

1 अंतरा ✍️
हाँक बैलगाड़ी मै बैठूँ,
चुपके से तुम्हे निहारूँ। (नायक)
मुरली बना अधर की मुझको,
अपनी हर खुशियाँ वारूँ (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
सुन धड़कन का प्रेम तराना
महक उठे हर एक कली। दोनों।
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। नायक।।

2 अंतरा ✍️
नील गगन ज्यों मिले धरा से
ऐसा हो मिलन हमारा।(नायिका)
आकर्षक अनुबंध प्रेम का 
देखे हमको जग सारा। (नायक)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
मुझे छिपाना निज बाहों में 
देख न पाए गाँव गली। (नायिका) 
तुम्हे छिपाऊँ निज बाहों में 
देख न पाए गाँव गली। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(नायिका)

3 अंतरा ✍️
साँझ ढले घर लौट चलेंगे 
चंदा जब राह दिखाए। (नायक) 
हँसी अधर की उजली किरणें 
मन का दीपक बन जाए।।(नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
हाथ थाम जीवन जी लेंगे 
ठहरी घड़ियाँ लगें भली। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)

4 अंतिम बंध ✍️
आज गाँव में भ्रमण किया तो
मेरा ये संसार मिला। (नायक)
मांग महकती सिंदूरी सी
तू सच्चा श्रृंगार मिला।। (नायिका)
(पूरक पंक्ति) 🌿🌿🌿
धन्य हुई साँसों की सरगम 
धड़कन सुर में बैठ ढली।। (दोनों)
गाँव लगे जन्नत हो जैसे 
तू जो मेरे साथ चली।। (नायक)
देख गाँव ये, डगर नाचती।
दिखे जहाँ हर खुशी पली।(दोनों)

डॉ संजय कौशिक 'विज्ञात'